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स्वामी विवेकानन्द की 110 वीं पुण्यतिथि पर विशेष



Published by: Aniruddh Chaturvedi
Published on: Wed, 04 Jul 2012 at 14:03 IST
नई दिल्ली| 4 जुलाई के साथ महापुरुष स्वामी विवेकानंद का नाम जुड़ा हुआ है| आज के ही दिन वर्ष 1902 में विवेकानंद का निधन हुआ था| इस वर्ष हम उनकी 110वीं पुण्यतिथि मना रहे हैं| गुलाम भारत के युवाओं को आजाद भारत का सपना दिखने वाले विवेकानन्द के जीवन से जुडी तमाम कहानियां विद्यालयों के पाठ्यक्रमों में आज भी पढाई जातीं है| इसके बावजूद हम भारतीय संस्कृति को वैश्विक पटल पर पहचान दिलाने वाले इस गुरुभक्त महापुरुष की पुण्यतिथि और जयंती (12 जनवरी) को भूल जाते हैं|

12 जनवरी 1863 को जन्मे स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था | एक धनाड्य परिवार में जन्म लेने के बाद उच्च शिक्षा हासिल करने वाले नरेन्द्र ने अपने जीवन को देश सेवा और भारतीय संस्कृति के प्रसार में समर्पित कर दिया| वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु विवेकानंद ने सन् 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का वेदान्त अमेरिका और यूरोप के हर एक देश पहुँचाने का श्रेय स्वामी विवेकानन्द को ही जाता है|

रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य विवेकानन्द ने अपने गुरु के नाम पर रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी देश के कोने कोने में अपना काम कर रहा है।

कहा जाता है कि पिता विश्वनाथ दत्त के पाश्चात्य सभ्यता प्रेम के बावजूद विवेकानंद ने अँग्रेजी शिक्षा ग्रहण करके भी पाश्चात्य सभ्यता को अपनाने से इनकार कर दिया। पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने 25 वर्ष की अवस्था में ही गेरुआ वस्त्र धारण कर स्वामी रामकृष्ण परमहंस का पूर्ण संदिध्य ले लिया| अपने गुरु की मृत्यु के बाद विवेकानन्द ने पूरे भारतवर्ष की पद यात्रा की। इस पद यात्रा के दौरान विवेकानंद ने भारत के लाखों युवाओं में देश और संस्कृति प्रेम की इसी अलख जलाई कि युवाओं ने क्रन्तिकारी चोले धारण कर लिए|

मान्यता है कि स्वामी विवेकानन्द के संपर्क में आने के बाद ही नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिंद फ़ौज खड़ी की थी, तो सरदार बल्लभ भाई पटेल का व्यक्तिगत जीवन भी स्वामी जी से प्रेरित था| स्वामी जी द्वारा लिखे गए लेख व पुस्तकें आज भी दुनिया भर में पढ़ी जातीं है क्योंकि उनकी शैली में मौजूद भाव आज भी जोश भर देने वाला है|

भारतीय संस्कृति को मजबूत बनाने के लिए और युवाओं को अपनी मूल सभ्यता से जोड़े रखने के लिए हर देशवासी को अपने वार्षिक कैलेंडर के कुछ दिन और उनसे जुड़े महत्व को याद रखने की जरुरत है| ताकि हम अपने भविष्य को एक ऐसे सपना देकर जाएँ जिसकी नींव में हमारी संस्कृति और महापुरुषों के आदर्शों की मजबूती मौजूद हो|
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