अनिल यादव 11 साल रहे जिलाबदर फिर भी बना दिए गए यूपीपीएससी के अध्यक्ष

इलाहाबाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन के चेयरमैन अनिल यादव के अपॉइंटमेंट को अवैध करार दिया है। अनिल यादव की अपॉइंटमेंट के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान कई हैरान करने वाले तथ्य सामने आए। अनिल यादव के चयन की प्रक्रिया से साफ जाहिर होता है कि सरकार पहले से ही मन बना चुकी थी कि उन्हें लोक सेवा आयोग का चेयरमैन बनाना है। न सिर्फ उन पर लगे आपराधिक मुकदमों को नजरअंदाज किया गया, बल्कि यह भी दरकिनार कर दिया गया था कि उनपर गुंडा एक्ट लगा दिया गया है और उन्हें 11 साल के लिए जिलाबदर कर दिया गया था|

सूत्रों की माने तो आगरा शहर में अनिल यादव का पूरा आपराधिक इतिहास रहा है। उनके खिलाफ न्यू आगरा में वर्ष 1990 से पहले करीब 17 मुकदमे दर्ज हुए। इनमें मारपीट, बलवा और जान से मारने की धमकी की लाइन लगी है। वर्ष 1990 में उनकी हिस्ट्रीशीट (नंबर 15 ए) खोली गई और जिला बदर की कार्रवाई हुई। अनिल पर हरीपर्वत थाने में आबीएस कॉलेज के बाहर बलवा, फायरिग के दो मुकदमे थे तो शाहगंज और लोहामंडी थाने में भी एफआईआर थीं। तत्कालीन डीएम ने पुलिस की रिपोर्ट पर मुहर लगाकर उन्हें जिला बदर करने के आदेश दिए। तत्कालीन एसएसपी ने उस समय गुंडा एक्ट की रिपोर्ट में बहुत ही तीखी टिप्पणी की थी। इसके आधार पर यह कार्रवाई हुई थी। हालांकि वर्ष 1997 में तत्कालीन मंडलायुक्त ने गुंडा एक्ट की कार्रवाई को रद करने के आदेश दिए थे। उस समय आगरा कॉलेज के तत्कालीन प्राचार्य ने अनिल यादव के पक्ष में एक पत्र लिखा था। जिसमें उनके उज्जवल भविष्य के मद्देनजर इस कार्रवाई को न्याय संगत नहीं बताया था। इसी आधार पर प्रथम अपील में मंडलायुक्त ने डीएम की गुंडा एक्ट की रिपोर्ट को रद किया था।

पिछली सपा सरकार में अनिल यादव के आपराधिक इतिहास को पुलिस ने दफन कर दिया। सबसे पहले हिस्ट्रीशीट खाका गायब किया था। जबकि हिस्ट्रीशीट खाका हिस्ट्रीशीटर की मृत्यु उपरांत ही नष्ट किया जाता है। हाईकोर्ट में अनिल यादव की नियुक्ति संबंधी याचिका पर सुनवाई के दौरान आगरा पुलिस से रिपोर्ट मांगी गई थी। पुलिस सूत्रों के अनुसार अनिल यादव का आपराधिक इतिहास खोजने में पुलिस के पसीने छूट गए जो क्राइम नंबर पता चल रहे थे उनके रिकार्ड थानों से गायब थे। गुंडा एक्ट की एक फाइल प्रशासन के पास भी रहती है। बातचीत में यह जिक्र होने पर एक प्रशासनिक अधिकारी के ऑफिस का रिकार्ड खंगाला गया। वहां अनिल यादव की फाइल मिल गई। जिसमें उनके खिलाफ गुंडा एक्ट और जिला बदर की कार्रवाई की गई थी। उसमें अपराध संख्या का स्पष्ट उल्लेख था। उन मुकदमों की कोर्ट से चाजर्शीट निकलवाई गईं। तब रिपोर्ट भेजी जा सकी।

सीबीआई जांच हुई तो कई अफसरों पर गिरेगी गाज

अनिल यादव को उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष पद से हटाने के बाद यदि सीबीआई जांच कराई गई तो कई अफसरों पर गाज गई सकती है| इनमें अनिल और आयोग के कई अन्य अफसरों के अलावा पूर्व में चयनित भी शामिल हैं। अभ्यर्थियों का आरोप है कि भर्तियों में प्री से लेकर इंटरव्यू तक में मनमानी हुई है। समीक्षा अधिकारी, राजस्व निरीक्षक की भर्तियों में तो अभ्यर्थियों ने ओएमआर शीट खाली छोड़ दी जिसे बाद में भरा गया। आंदोलनकारी इस मामले को हाईकोर्ट के समक्ष ले जाने की तैयारी में हैं। पीसीएस-2011 की ही बात की जाए तो मुख्य परीक्षा के मूल्यांकन में स्केलिंग का मनमाने तरीके से इस्तेमाल हुआ। इस परीक्षा के एक ही पेपर में स्केलिंग के बाद जाति विशेष के लोगों के 60 से भी अधिक नंबर बढ़ गए। इसके विपरीत उसी पेपर में दूसरों के नंबर घट गए। इतना ही नहीं, जाति विशेष के अभ्यर्थियों को साक्षात्कार में 135 से 141 तक अंक दिए गए जबकि ज्यादातर अभ्यर्थियों को 121 तक अंक मिले। प्रतियोगियों ने यह डिटेल हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में भी लगाए हैं। उन्होंने सीधी भर्ती की 23 भर्तियों की डिटेल जुटाई है। इनमें ओबीसी के लिए निर्धारित सीट से डेढ़ गुना से भी अधिक पदों पर जाति विशेष के अभ्यर्थियों का चयन हुआ है। इन विवरणों को भी साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया गया है। प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के अवनीश का आरोप है कि कई ऐसे शिक्षक हैं जिन्होंने कॉपियों का मूल्यांकन नहीं किया लेकिन पैनल में उनके नाम हैं।

दसवीं में 45 % अंक

श्री चित्रगुप्त परास्नातक महाविद्यालय मैनपुरी के प्राचार्य से उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष जैसी प्रतिष्ठित कुर्सी हासिल करने वाले डॉ. अनिल कुमार यादव को हाईस्कूल में महज 46 प्रतिशत अंक मिले थे। डॉ. अनिल यादव ने अपनी शैक्षणिक योग्यता के जो दस्तावेज हाईकोर्ट को उपलब्ध कराए हैं, उनके मुताबिक अनिल की जन्मतिथि 24 फरवरी 1962 है। उन्होंने 1978 में 16 साल की उम्र में हाईस्कूल की परीक्षा महज 45.6 प्रतिशत अंकों के साथ पास की थी। यूपी बोर्ड से संबद्ध विक्टोरिया इंटर कॉलेज आगरा से 10वीं की परीक्षा में उन्हें विज्ञान विषय में सर्वाधिक 50 अंक मिले। गणित में 100 में से 39 नंबर हासिल किए। 1978 में हाईस्कूल पास करने के चार साल बाद 1982 में इंटरमीडिएट की परीक्षा 58.2 फीसदी अंकों से पास की। इंटर में उन्हें सर्वाधिक 67 नंबर वनस्पति विज्ञान में हासिल हुए। बाद में डॉ. अनिल यादव ने इसी विषय से एमएससी और पीएचडी की डिग्री हासिल की। आगरा विश्वविद्यालय की एमएससी वनस्पति विज्ञान की 1986 की परीक्षा में प्रथम स्थान पाने पर उन्हें द्वारिका प्रसाद मथुरा प्रसाद स्वर्ण पदक से नवाजा गया। बाद में उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से ही एलएलबी और एलएलएम की पढ़ाई की। 1998 में एलएलएम अंतिम वर्ष में पुनर्परीक्षा के बाद 56.10 प्रतिशत अंक मिले थे।

इण्टर में दो बार हुए थे फेल-

जब अनिल यादव के इलाहाबाद में आने पर उन्हें शक हुआ तो उन्होंने इनके बारे में पता लगाना शुरू किया। सन 1978 में अनिल यादव ने हाई स्कूल सेकेंड डिवीजन से पास किया था। इंटर में दो साल लगातार फेल होने के बाद वर्ष 1982 में इंटर की परीक्षा पास की। उसके बाद सभी परीक्षा इन्होंने फर्स्ट डिवीजन और एलएलएम सेकेंड डिवीजन से पास की।’

नए अध्यक्ष के लिए भी राह आसान नहीं

उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग के नए अध्यक्ष के लिए भी राह आसान नहीं दिख रही। अभी नए अध्यक्ष का नाम घोषित नहीं हुआ है, लेकिन भर्तियों की शुचिता सुनिश्चित करने के लिए कार्यभार संभालने के बाद नए अध्यक्ष को पूर्व में लिए गए कई फैसलों को तत्काल बदलना होगा। अन्यथा, उन्हें भी प्रतियोगियों के तीव्र विरोध तथा कानूनी लड़ाई का सामना करना पड़ेगा। भर्तियों में अनियमितता पर पर्दा डालने के लिए लोकसेवा आयोग में पिछले ढाई साल में कई विवादित फैसले लिए गए। यहां तक कि आयोग चयनितों के नाम भी घोषित नहीं करता। आयोग की एक बैठक में हुए फैसले के तहत सिर्फ रोल नंबर और रजिस्ट्रेशन नंबर के आधार पर परिणाम घोषित किए जा रहे हैं। यहां तक कि पीसीएस में चयनितों के नाम भी आयोग ने घोषित नहीं किए। इससे पहले आयोग में चयनितों की जाति घोषित न करने का निर्णय लिया गया था। आयोग ने अंकपत्र देखने की प्रक्रिया भी काफी जटिल कर दी है।

अनिल यादव के कार्यकाल की नियुक्तियां भी हों रद्द

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष पद पर अनिल यादव की नियुक्ति अवैध होने के बाद उनके कार्यकाल में हुई भर्तियों की वैधानिकता पर भी सवाल खड़ा हो गया है। प्रतियोगियों का कहना है कि अनिल यादव की नियुक्ति अवैध है। इसलिए इनके समय में हुई भर्तियां भी अवैध हैं सो इन्हें रद्द किया जाना चाहिए। प्रतियोगियों के एक वर्ग ने इस मांग को लेकर आंदोलन करने की घोषणा की है। वहीं दूसरा वर्ग हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने की तैयारी में है। अनिल यादव के ढाई वर्ष के कार्यकाल में तकरीबन 250 तरह की भर्तियों में 40 हजार पदों पर नियुक्तियां हुई हैं। इनमें से 237 तरह की तो सीधी भर्तियां यानी जिनमें सिर्फ साक्षात्कार के आधार पर चयन हुआ। अनिल यादव की नियुक्ति रद्द होने के बाद ये भर्तियां भी फंसती दिख रही हैं। प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति की ओर से उनके कार्यकाल में हुई भर्तियों की सीबीआई जांच की मांग की याचिका पहले ही दाखिल हो चुकी है। उनके कार्यकाल की नियुक्ति तथा भर्तियों की सीबीआई जांच के लिए आंदोलनों की अगुवाई के साथ कानूनी लड़ाई लड़ने वाले प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के अवनीश पांडेय का कहना है कि इस पर विधिक राय ली गई है। अधिवक्ताओं के निर्देशन में याचिका तैयार कराई जा रही है। जल्द ही दाखिल की जाएगी।

अनिल यादव का विवादों से रहा नाता-

आयोग अध्यक्ष के रूप में अनिल यादव ने दो अप्रैल 2013 को कार्यभार संभाला था। तब से अब तक ढाई सौ से अधिक परीक्षाओं के परिणाम आयोग ने जारी किए हैं। खुद आयोग के अध्यक्ष की ओर से दिए गए हलफनामे में ही 238 परीक्षाओं का जिक्र है। इसके अलावा लगभग दो दर्जन प्रतियोगी परीक्षाएं हैं। इसी साल मई में घोषित कृषि अधीनस्थ सेवा वर्ग-3 की परीक्षा में तो आयोग पर और भी गंभीर आरोप है कि उसमें विज्ञापन में घोषित बैकवर्ड की सीटों संख्या परिणाम में कई गुना बढ़ा दी गई। अन्य कई परीक्षाओं में भी आरोप हैं।

यही नहीं, अनिल यादव के कार्यकाल में आयोग को दो परीक्षाओं के परिणाम भी बदलने पड़े। पीसीएस-2011 की प्री परीक्षा का परिणाम इसलिए बदलना पड़ा क्योंकि उसे पहले त्रिस्तरीय आरक्षण के तहत घोषित किया गया था। इसी तरह पीसीएसजे-2013 का परिणाम गलत सवालों की वजह से बदलना पड़ा। आयोग के इतिहास में शर्मनाक घटना के रूप में पहली बार पीसीएस का पेपर भी आउट हुआ। 29 मार्च, 2015 को लखनऊ में पेपर आउट हुआ था और आयोग को दोबारा परीक्षा करानी पड़ी। इसकी सीबीआइ जांच के लिए भी याचिका दाखिल हुई थी लेकिन अदालत ने नामंजूर कर दिया था। यादव के ढाई साल के कार्यकाल में हुई परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर तमाम सवाल खड़े हैं। उनके ऊपर परीक्षाओं में कुछ खास जिलों और एक जाति विशेष का पक्ष लेने के आरोप लगते रहे।

प्रतियोगियों ने लोक सेवा आयोग के गेट पर ‘यादव सेवा आयोग’ तक लिख भी दिया था। अभ्यर्थी यह आरोप लगाते रहे हैं कि आयोग में ओवरलैपिंग के जरिए सामान्य वर्ग की सीटों में आरक्षितों का चयन किया जा रहा है। इनका सच भी सामने आएगा। हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुरेश बहादुर सिंह और अनिल सिंह बिसेन कहते हैं कि अदालत ने युवाओं का विश्वास बहाल कर दिया है। प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति ने हाईकोर्ट से फैसला अपने पक्ष में आने के बाद सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल करने का फैसला किया है। समिति की ओर से अधिवक्ता सत्येंद्र त्रिपाठी ने कहा कि यदि सरकार या आयोग सुप्रीम कोर्ट जाता है तो प्रतियोगी भी अपना पक्ष रखेंगे।

अनिल यादव के मात्र ढाई वर्षों के कार्यकाल में उनके साथ तकरीबन दो दर्जन विवाद जुड़े और भर्ती से जुडे़ विभिन्न मामलों में 43 याचिकाएं दाखिल की गईं। शुरुआत से ही उनकी नियुक्ति पर लगातार सवाल उठते रहे। लगातार यह विवाद का विषय रहा कि उनकी नियुक्ति मानक के अनुसार नहीं हुई है। इससे पहले वह छह वर्षों तक आयोग में सदस्य भी रहे। खास वर्ग और क्षेत्र के लोगों को तवज्जो देने सहित उनकी कार्यशैली पर साक्षात्कार पैनल, पेपर सेटिंग, मूल्यांकन में भी खास वर्ग के लोगों को शामिल करने के आरोप लगे। इससे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ज्यादातर वरिष्ठ शिक्षकों ने आयोग के साक्षात्कार पैनल में शामिल होने तथा मूल्यांकन से मना कर दिया।

कई ने तो आयोग पर अच्छा व्यवहार नहीं किए जाने का भी आरोप लगाया है। उन पर अफसरों और कर्मचारियों के साथ तानाशाही रवैया अपनाने का भी आरोप लगा। कर्मचारियों को आयोग की भर्तियों में धांधली तथा अध्यक्ष के खिलाफ बोलना भी भारी पड़ा। चार कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा चुकी है। खास यह कि इसके खिलाफ यूनियन ने आवाज उठाई, धरना भी दिया लेकिन बाहर किसी की बोलने की हिम्मत नहीं हुई। सबकुछ आयोग परिसर के भीतर हुआ। डॉ.अनिल पर साक्षात्कार के लिए पहुंचे अभ्यर्थियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करने का भी आरोप है।

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