पिछले दस साल से हत्या के आरोप में दूसरे के नाम से जेल में बंद बेगुनाह- जिम्मेदार कौन?

बिजनौर। आपने एक कहावत जरूर सुनी होगी कि पुलिस रस्सी का सांप बनाती है, लेकिन यह खबर पढकर आप हैरान रह जायेंगे कि बिजनौर पुलिस ने रस्सी का सांप ही नही बल्कि अजगर बना दिया। हत्या के मामले का आरोपी जब पुलिस के हाथ नही लगा तो पुलिस ने अपने निकम्मे पन पर पर्दा डालने के लिए हत्या आरोपी के बेगुनाह भाई को आरोपी के नाम से गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया जिसके बाद कोर्ट ने चालानी रिपोर्ट के आधार उसे जेल भेज दिया। जो पिछले लगभग दस वर्षो से बेगुनाह होते हुए जेल की कालकोठरी में कैद है। हैरत की बात तो यह है कि बेगुनाह होने के सारे सबूत देने के बावजूद भी कोई भी अधिकारी आज तक उसे इंसाफ नही दिला सका।

यह घटना है जनपद बिजनौर के थाना नगीना देहात क्षेत्र के ग्राम साबुवाला की जहां 23 फरवरी 2001 में धर्मपाल पुत्र बिशम्बर सिंह की मामूली कहासुनी को लेकर हत्या हो गई थी। हत्या का आरोप लगाते हुए मृतक के पिता विश्म्बर सिंह की ओर से मृतक धर्मपाल की पत्नी इंद्रा देवी व उसके दो भाई पप्पू उर्फ वीरबहादुर, शिव सिंह उर्फ गुडडू पुत्रगण मनबहादुर एंव उनके मामा भगवत व एक रिश्तेदार राजेन्द्र रावत के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कराया था। हत्या वाले दिन से ही आरोपी पप्पू फरार हो गया था तथा अन्य सभी आरोपियों को पुलिस ने जेल भेज दिया था। फरार पप्पू उर्फ वीरबहादुर के अलावा अपर जिला एंव सत्र न्यायाधीश द्वितीय बिजनौर ने 29 नवमबर 2003 को इंद्रा देवी, शिव सिंह उर्फ गुडडू पुत्रगण मनबहादुर एंव भगवत व राजेन्द्र रावत सभी आरोपियो को दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

जब कई सालो तक भी पुलिस हत्यारोपी पप्पू को पकडने में नाकाम रही तो कोर्ट ने पप्पू को भगोडा घोषित करते हुए उस पर दो हजार रूपए का ईनाम घोषित करने के अलावा पुलिस को हत्यारोपी को तत्काल जिन्दा या मुर्दा कोर्ट में पेश करने के आदेश दिये। इनाम का लालच व झूठी वाहवाही लूटने की यही से होती है जनपद बिजनौर के थाना नगीना देहात पुलिस की रस्सी का सांप ही नही बल्कि अजगर बनाने की कहानी शुरू। फरार चल रहे हत्यारोपी की बुढी मां राजकुमारी के अनुसार 28 अप्रैल 2006 की रात्री लगभग 10 बजे नगीना देहात थानाध्यक्ष आरके सिंह भारी पुलिस बल के साथ फरार चल रहे पप्पू के संबन्ध में जानकारी करने के लिए उसके घर पहुंचे। जब एसओ को पप्पू के बारे में कोई जानकारी नही मिली तो उसने राजकुमारी व उसके दूसरे निर्दोष बडे बेटे बाली उर्फ बलबहादुर जो उसी मनहूस दिन पंजाब से मजदूरी कर घर लौटा था। दोनो को जबरन थाने उठा लाए, थाने लाकर एसओ आरके सिंह ने उससे कहा कि फरार चल रहे तेरे बेटे पप्पू को हम खोज खोजकर परेशान हो गए है। अब मैंने उसके नाम की जगह तेरे इस बेटे बाली को पप्पू बना दिया है। अब तुझे कोर्ट में बाली को ही पप्पू बताना होगा यदि तूने ऐसा नही किया तो तुझे व तेरे परिवार को अफीम व चरस की तस्करी में जेल भेज दूंगा।

हत्या के मामले में तो यह जेल से बाहर आ सकता है। लेकिन इस केस में तुम लोग जेल चले गए तो जिन्दगी भर वहां सढते रहोगे। इसके बाद एसओ आरके सिंह ने अपने निकम्मे पन पर पर्दा डालते हुए बाली उर्फ बलबहादुर को 29 अप्रैल को पुलिस मुठभेड में पुलिस पार्टी पर जानलेवा हमला और फर्जी अवैध तमंचा बरामद दिखाया। इतना ही नही उस नकारा एसओ ने घर से उठाकर लाए निर्दोष बालबहादुर पर ही फर्जी ढंग से धारा 307 व आर्म्स के मुकदमे के अलावा हत्या आरोपी पप्पू उर्फ वीरबहादुर बनाकर 30 अपै्रल 06 को न्यायालय को गुमराह कर उसके समक्ष पेश किया। उसके बाद कोर्ट ने भी पटवारी का मिलान और दरोगा के चालान पर अपनी मोहर लगाकर बाले उर्फ बालबहादुर को ही हत्या आरोपी पप्पू मानकर जेल की कालकोठरी में भेज दिया। जबकि बेगुनाह की बुढी मां राजकुमारी ने अगले दिन ही एसपी से लेकर राष्ट्रपति तक को उस एसओ आर के सिंह की करतूत का शिकायती पत्र भेजकर अवगत कराया था।

जिसके बाद उस एसओ ने भविष्य में अपने को कानून के फंदे से बचने के लिए उल्टा कानून का मजाक बनाने में कोई कसर नही छोडी उस निकम्मे एसओ आरके सिंह ने गांव के कुछ लोगो के नाम से बाली उर्फ बलबहादुर को पप्पू उर्फ वीरबहादुर साबित करने के फर्जी शपथ पत्र तक खुद अदालत में दाखिल कर दिये। जबकि न्यायालय अपर सत्र न्यायाधीश कोर्ट न0 2 ने एसओ आरके सिंह द्वारा बनाई गई मुठभेड की कहानी संदिग्ध मानते हुए खारिज कर 06 दिसम्बर 2007 को दोषमुक्त कर दिया था। लेकिन इस हत्या मांमले में दूसरे के नाम से जेल में बन्द होने के कारण न्यायालय में इसका निस्तारण नही हो सका। उधर तभी से बाली उर्फ बालबहादुर जेल की कालकोठरी में बन्द होकर भी शिकायती पत्र भेजकर जनपद न्यायधीश, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, मानवाधिकार आयोग, मुख्यमंत्री, डीजीपी समेत तमाम अधिकारियों को चीख-चीख कर अपनी बेगुनाही का सबूत भेजता रहा। लेकिन किसी ने भी उसकी एक न सुनी। इतना ही नही मृतक धर्मपाल के परिजन एंव गाँव के प्रधान अरतेन्द्र सिंह लाडा व रामपाल, शेर सिंह, असगर, छिन्दर सिंह सहित सैकडो ग्रामीण भी बाली के बेगुनाह होने की गवाही दे चुके है।

22 जनवरी 2009 व 13 अगस्त 2010 में जेल के निरीक्षण के दौरान बाली उर्फ बालबहादुर ने अपर जिला एंव सत्र न्यायधीश से अपने निर्दोष होने का सबूत देते हुए अपनी फरियाद सुनाई की वह अपने हत्या आरोपी भाई पप्पू के साथ शराब एक्ट के मुकदमेें में अपराध संख्या 177/07 व 178/07 में 08 अगस्त 1997 से 12 अगस्त 97 तक जेल में बंद रह चुका है, मेरे व मेरे भाई के निशान और अंगूठोे का मिलान किया जाये जिससे सच्चाई का पता चल सके कि में कौन हूं? और मेरा असली नाम क्या है। जिसके बाद कोर्ट के आदेश पर बालबहादुर उर्फ बाली के संबन्ध में जेल का रिकार्ड तलब किया गया जिसमें उसके बेगुनाह होने की पुष्टि तो हुई। लेकिन कोर्ट ने पूरी सच्चाई जानने के लिए निर्दोष बाली उर्फ बलबहादुर व हत्या आरोपी पप्पू के फिंगर प्रिंट मैच कराने के लिए एक्सपर्ट को भेज दी थी। लेकिन भ्रष्टाचारी मकडाजाल में उसकी गरीबी फस गई। जिस कारण उसकी रिपोर्ट पिछले छह वर्षो से आजतक नही आयी है।

यह जनपद पुलिस के निकम्मे पन का पहला मांमला नही है। पिछले वर्ष 11 नवम्बर 14 को थाना बढापुर पुलिस ने हत्या व लूट के मांमले में इरफान पुत्र नफीस को फुरकान के नाम से जेल भेज दिया था। जबकि 11 नवम्बर 14 को जनपद बिजनौर की थाना बढापुर पुलिस ने जो हत्या व लूट की घटना दिखाई थी, उस समय इरफान किसी दूसरी घटना के मांमले में दिल्ली की तिहाड जेल में बन्द था। जब कोर्ट को बिजनौर पुलिस की इस करतूत के सारे दस्तावेज दिखाऐ खऐ तो न्यायालय ने 07 जुलाई 15 को इरफान को बेगुनाह मानते हुए उसे तत्काल जेल से रिहा करने के आदेश दिये थे। अब हर किसी की जुबान पर बस एक यही सवाल है कि जब पप्पू उर्फ वीरबहादुर ही बाली उर्फ बलबहादुर है तो पिछले दस वर्षो से जेल में बन्द होने के बावजूद न्यायालय द्वारा उसकी पत्रावली का निस्तारण क्यों नही किया गया। या तो न्यायालय को भी जेल में बन्द बाली उर्फ बलबहादुर की बेगुनाही के सबूत मिल गये है। जिस कारण अन्य आरोपियों की सजा होने के बावजूद कोर्ट ने उसकी पत्रावली पर विचार नही किया।

जबकि शासन द्वारा समय समय पर यह कहा जाता है कि भले ही गलती से कितने भी अपराधी छूट जाये लेकिन एक भी निर्दोष जेल नही जाना चाहिये। सरकार को नींद से जगाने के लिए क्या यह दो घटना काफी नही है। इस बात का कोई भी सरकार का नुमाईंदा जवाब देने को तैयार नही है कि पिछले दस वर्षो से निर्दोश बाली जो जेल में बन्द है उसका क्या वह समय वापस ला सकते है, और क्या उस निकम्मे एसओ आरके सिंह जो इस समय भी जनपद के थाना कोतवाली शहर में अपनी डयूटी कर ना जाने कितने निर्दोषो को अपराधी बना रहा है, अब यह अपने आप में एक सवाल बना हुआ है कि क्या उस पर कोई कार्रवाही होगी?

इस मामले को लेकर सुभाष सिंह बघेल (पुलिस अधीक्षक बिजनौर ) का कहना है कि जिला जज वीके श्रीवासतव व जिलाधिकारी विनोद कुमार पवार द्वारा 27 सितम्बर 15 को जेल के निरीक्षण में जिसमें वह भी मौजूद थे। बन्दी बाली उर्फ बलबहादुर ने अपने बेगुनाह होने की शिकायत की थी यह पूरा प्रकरण न्यायालय में चल रहा है। बहुत जल्द ही कोर्ट से विवेचना आदेश मिलने की संभावना है आदेश मिलते ही वह मांमले की बारीकी से जांच कराएंगे जांच में दोषी पाये जाने पर आरोपी एसओ आरके सिंह को किसी कीमत पर बख्शा नही जायेगा। क्योंकि इस तरह से किसी की जिन्दगी बरबाद करना इंसानियत के खिलाफ है।

इस संबंध में दलजीत सिंह चौधरी (एडीजी एलओ) का कहना है कि आपके माध्यम से जो जानकारी मिली है वह बेहद गम्भीर है। इस प्रकरण की पूरी रिपोर्ट मंगवाई जायेगी। जांच रिपोर्ट में दोषी पाये जाने पर एसओ के खिलाफ कडी कार्रवाही अमल में लाई जायेगी।

राजेन्द्र चौधरी सपा प्रवक्ता/ वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री राजनैतिक पेंशन उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि आपके माध्यम से मांमला उनके संज्ञान में आया है। वह जेल में बंद निर्दोष बाली उर्फ बलबहादुर को रिहा कराने व आरोपी एसओ आरके सिंह के खिलाफ कार्रवाही कराने के संबन्ध में मुख्यमंत्री से बात करेंगे। पीडि़त परिवार को सरकार की ओर से पूरा इंसाफ दिलाया जायेगा।

बिजनौर से शहजाद अंसारी की रिपोर्ट