1980 से लेकर आज तक: सरकार ने किसानों को क्या दिया और उद्योगों को कितना फायदा पहुंचाया

नई दिल्ली। देश में पिछले 35 सालों में केंद्र व राज्यों में ना जाने कितनी सरकारें आयी और चली गयी, सबका मुद्दा गरीब और गरीबी ही रहा, लेकिन न गरीबों की संख्या में कमी आई और न ही गरीबी कम हुई। इस दौरान सबसे ज्यादा हालात बदतर हुए तो देश के किसान के। फिर वो चाहे किसी भी राज्य का रहा हो।

जिस देश की अर्थव्यवस्था का आधार ही कृषि हो आज उसमें आत्महत्या करने वालों में सबसे बड़ी संख्या किसानों की है।

इन सालों में भारत को भले ही दुनिया की उभरती हुई सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा हो, लेकिन अंदरूनी हालात को देखते हुए ये दावे केवल छलावा नजर आते हैं। अर्थव्यवस्था के जो मानक आंकड़ों के माध्यम से दिखाकर राजनीति की जाती है वो चंद औध्योगिक घरानों और शहरों से निकालकर आता है।

वास्तविकता तो यह है कि देश और राज्यों की सरकारें विकास के आधार कृषि और किसान को भूलकर  औध्योगिक विकास के पीछे भाग रही हैं। जिससे देश की आबादी का लगभग 70 फीसदी हिस्सा कोई जुड़ाव महसूस नहीं करता है।

इस औध्योगिक विकास को कायम रखने के लिए सरकार हर स्तर पर छूट से लेकर नए उद्योग लगाने से लेकर हजारों करोड़ रुपये सुविधाओं के नाम पर खर्च करती है।

1980 से लेकर 2015 तक  सभी प्रदेश की सरकारें और देश की सरकारें चुनाव में किए गए वादों में जितना पैसा बर्बाद कर चुकी है। अगर  इन सबका 10 प्रतिशत ही देश के किसानों को दे दिया गया होता, तो देश की तरक्की हो जाती।