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20 लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज, फिर भी क्यों कुछ खास नही ? जाने एक्सपर्ट की राय

20 Lakh Crore Economic Package Yet Why Nothing Special Know Expert Opinion

नई दिल्ली। पीएम नरेंद्र मोदी ने 20 लाख करोड़ रुपये के भारी-भरकम पैकेज का ऐलान करते हुए कहा था कि यह जीडीपी के करीब 10 फीसदी का होगा. लेकिन जानकार कहते हैं कि कुछ नया बहुत कम है. इसमें मॉनिटरी पैकेज ज्यादा है और फिस्कल पैकेज में कई पहले के ऐलान ही लागू किए गए हैं. इसमें रिजर्व बैंक और ​बैंकों की तरफ से मिलने वाला करीब 11 लाख करोड़ रुपये का मौद्रिक पैकेज है.

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दो तरह के होते हैं पैकेज

एक्सपर्ट कहते हैं, ‘असल में किसी सरकारी राहत पैकेज का दो हिस्सा होता है. पहला फिस्कल पैकेज यानी राजकोषीय हिस्सा और दूसरा मॉनिटरी यानी मौद्रिक हिस्सा. राजकोषीय हिस्से को सरकार अपनी जेब से देती है और मौद्रिक पैकेज रिजर्व बैंक या बैंकों के माध्यम से दिया जाता है.’

तो यह जो राहत पैकेज है, इसमें रिजर्व बैंक और ​बैंकों की तरफ से मिलने वाला करीब 11 लाख करोड़ रुपये का मौद्रिक पैकेज है. अब तक रिजर्व बैंक द्वारा करीब 6 लाख करोड़ रुपये का मौद्रिक पैकेज दिया गया. सरकार ने सिर्फ 1.7 लाख करोड़ रुपये का फिस्कल पैकेज दिया, लेकिन यह भी बजट में तय था. यानी बजट में तय किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं का पैसा समय से पहले खर्च कर दिया गया.

इसी तरह वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बुधवार को जो करीब 6 लाख करोड़ रुपये का पैकेज घोषित किया है, उसमें भी मॉनिटरी हिस्सा ज्यादा है. इसमें करीब 5.5 लाख करोड़ रुपये मॉनिटरी पैकेज के रूप में हैं जो बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को देने हैं.

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जरूरत से कम है यह पैकेज

एक्सपर्ट कहते हैं, ‘हमारे बजट को देखते हुए बहुत कम है. सरकार ने फिस्कल पैकेज के नाम पर बहुत कम दिया है. हमारे देश का एक साल का बजट 30 लाख करोड़ रुपये का है और रिजर्व बैंक करीब 3-4 लाख करोड़ रुपये सिस्टम में डालता है. यानी हमारी जीडीपी का करीब 35 फीसदी हिस्सा तो सिस्टम में ऐसे ही आ जाता है. तो अगर सरकार इस पैसे को थोड़ा पहले खर्च कर दे तो यही किसी बड़े राहत पैकेज का काम कर देगा. बाकी अगर राशि के हिसाब से देखें तो इसके कम से कम दोगुनी राशि का राहत पैकेज होना चाहिए था.’

वित्त मंत्री के 6 लाख करोड़ के पैकेज का विश्लेषण

वित्त मंत्री ने करीब 5.94 लाख करोड़ करोड़ रुपये के पैकेज का ऐलान किया. असल में वित्त मंत्री ने ज्यादातर जो घोषणाएं की हैं इनमें सरकारी खजाने पर जो नुकसान होगा वह होगा टीडीएस और टीसीएस रेट में कटौती से करीब 50,000 करोड़ रुपये, परेशान एमएसएमई को 4,000 करोड़ रुपये का सबऑर्डिनेट सपोर्ट और 15 हजार से कम सैलरी वालों के पीएफ खाते में कर्मचारी-नियोक्ता का योगदान सरकार द्वारा देने पर करीब 2,500 करोड़ रुपये. यानी कुल महज 56,500 करोड़ रुपये की रकम सीधी खर्च हो रही है.

सरकार ने कई ऐसी चीजों को भी कोरोना का राहत पैकेज बता दिया है. जिनका कोई मतलब नहीं है. जैसे पीएफ में 2 फीसदी कम योगदान को राहत पैकेज कैसे कहा जा सकता है, इसमें जो पैसा कर्मचारी की जेब में ज्यादा आएंगे वह उसके अपने होंगे. इसमें भला सरकार क्या दे रही है. इसी तरह ईएमआई पर राहत सिर्फ यह होगा कि जिनके पास पैसा नहीं है वे इसे नहीं चुकाएंगे, लेकिन उन्हें बाद में ब्याज सहित इसे देना ही होगा और आगे जब यह रकम काफी बढ़ जाएगी, तो वे इसे कैसे चुकाएंगे यह उनको सोचना है.

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एमएसएमई को लोन का गणित

सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) को जो 3 लाख करोड़ रुपये की लोन गारंटी दी गई है. उसमें भी सरकार की जेब से अभी कुछ नहीं जाने वाला. लोन गारंटी का मतलब है ​कि अगर एमएसएमई लोन डिफाल्ट करते हैं तो उसकी भरपाई सरकार करेगी. इससे एमएसएमई संकट के इस दौर में लोन लेने को प्रोत्साहित होंगे, लेकिन समस्या यह है कि बैंकों का जिस तरह से एनपीए बढ़ रहा है, वह ऐसे लोन देनें में आनाकानी ही करेंगे. भला कौन बैंक चाहेगा कि उसका लोन डिफाल्ट हो, लंबे समय तक विवाद, हो फिर सरकार उसकी भरपाई करे या उसका एनपीए बढ़ जाए. वैसे भी यह तत्काल मिलने वाली राहत तो है नहीं, इसका इम्पैक्ट अगले कई वर्षों में होगा.

इसके पहले जो रिजर्व बैंक ने 6 लाख करोड़ रुपये नकदी का प्रवाह किया है उसका लाभ भी बैंकों ने दिया नहीं, यानी उसका खास फायदा कॉरपोरेट, एमएसएमई को नहीं मिला, इसको वित्त मंत्री ने भी स्वीकार किया है.

एमएसएमई को जो 45 दिन के भीतर बकाया देने की घोषणा की गई है, वह उनका अपना पैसा है, यानी सरकार की जेब से नहीं जानी है. वह तो उन्होंने जो भी सप्लाई किया होगा, उसकी कीमत है, देर-सबेर सरकार को देना ही था. बस अच्छी बात यह है कि इसे 45 दिन के भीतर देने को कहा गया है ताकि एमएसएमई को नकदी संकट से कुछ निजात मिल सके.

बिजली वितरण कंपनियों को राहत

लॉकडाउन ने पावर सेक्टर की कमर तोड़ दी है, बिजली कंपनियों के पास ज्यादातर रेवेन्यू इंडस्ट्री से आता है, जो कि बंद रहे. बिजली वितरण कंपनियों पर 94,000 करोड़ रुपये का बकाया है और उनको 90,000 करोड़ का बेल आउट दिया गया है. इसका बोझ भी अंतत: बैंकों और राज्य सरकारों पर जाएगा. ये असल में सरकार का क्राइसिस मैनेजमेंट है राहत पैकेज नहीं.

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असली जरूरतमंदों को बहुत कम

कोविड-19 से सबसे ज्यादा प्रवासी मजदूर या ऐसे कर्मचारी प्रभावित हैं, जिनकी संख्या करीब 40 करोड़ है. दूसरे, मध्यवर्गीय लोग भी प्रभावित हैं जिनकी सैलरी कट हो गई है या नौकरी चली गई है. अभी तो उनको सीधा कुछ खास नहीं मिला है, सिर्फ पीएफ जैसे कुछ प्रावधान हैं जिनका खास फायदा नहीं मिलना है.

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