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208 शिक्षाविदों का पीएम मोदी को पत्र, कहा- लेफ्ट विंग ने शिक्षण संस्थानों का माहौल बिगाड़ा

208 Educationists Letter To Pm Modi Said Left Wing Spoiled The Atmosphere Of Educational Institutions

By रवि तिवारी 
Updated Date

नई दिल्ली। विश्वविद्यालयों के कुलपतियों सहित 208 शिक्षाविदों (academicians) ने रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) को पत्र लिख कर देश में बिगड़ते अकादमिक माहौल के लिए ‘वामपंथी कार्यकर्ताओं (Left wing) के एक छोटे समूह’ को जिम्मेदार ठहराया है। चिट्ठी में लिखा गया है कि लेफ्ट विंग एक्टिविस्ट्स की गतिविधियों की वजह से शिक्षण कैंपस में पढ़ाई-लिखाई का काम बाधित होता है और इससे विश्वविद्यालयों का माहौल खराब हो रहा है। इन शिक्षाविदों ने आरोप लगाया है कि इन ग्रुप्स द्वारा कम उम्र के छात्रों को वैचारिक रूप से प्रभावित किया जा रहा है जिससे नए छात्र पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। पीएम मोदी को ये पत्र शनिवार को लिखा गया है।

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पत्र में कहा गया है कि लेफ्ट विंग के ऐक्टिविस्ट्स मंडली देश में शैक्षणिक माहौल को खराब करने में जुटी है। हम इस बात से निराश हैं कि छात्र राजनीति के नाम पर, एक विघटनकारी वामपंथी एजेंडे को आगे बढ़ाया जा रहा है। हाल ही में जेएनयू से लेकर जामिया तक, एएमयू से लेकर जादवपुर तक के परिसरों में हुए घटनाओं ने को लेकर हो रही बदनामी के कारण हमें बिगड़ते शैक्षणिक माहौल के प्रति सचेत किया है। इसके पीछे लेफ्ट विंग के ऐक्टिविस्ट्स मंडली का हाथ है।

पत्र लिखने वालों में डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (मध्य प्रदेश) के कुलपति प्रोफेसर आरपी तिवारी, दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर एचसीएस राठौर, एनबीए के अध्यक्ष और जीजीएस इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. केके अग्रवाल, आईसीएसएसआर के सचिव वीके मल्होत्रा, दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. पायल मागो, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो सुनील गुप्ता एसपी विश्वविद्यालय, गुजरात के कुलपति डॉ. श्रीश भाई कुलकर्णी शामिल हैं। शिक्षण संस्थानों में ‘लेफ्ट विंग की अराजकता के खिलाफ बयान’ शीर्षक से लिखे गए पत्र में कुल 208 अकादमिक विद्वानों के हस्ताक्षर हैं।

इन शिक्षाविदों ने कहा कि इन संस्थानों में वामपंथियों की वजह से पढ़ाई-लिखाई के कामों में बाधा पहुंची है। छोटी उम्र में ही छात्रों को कट्टरपंथी बनाने की कोशिश ना केवल उनके सोचने की क्षमता बल्कि उनकी कौशल को भी प्रभावित कर रही है। इसकी वजह से छात्र ज्ञान और जानकारी की नई सीमाओं को लांघने और खोजने की बजाय छोटी राजनीति में उलझ रहे हैं। विचारधारा के नाम पर अनैतिक राजनीति करके समाज और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ असहिष्णुता बढ़ाई जा रही है। इस तरह के प्रयासों से बहस को सीमित करके विश्वविद्यालयों और संस्थानों को दुनिया की नजरों से दूर करने की कोशिश की जा रही है।

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