अफ्रीका में आज ही के दिन भारतीय सेना ने आजाद कराए थे 223 बंधक: ऑपरेशन खुकरी

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    नई दिल्ली: ऑपरेशन खुकरी भारतीय सेना के शौर्य की एक ऐसी मिसाल थी, जिसे याद कर आज भी भारतीय नागरिक गर्व महसूस करते हैं. दरअसल, यह ऑपरेशन यूनाइटेड नेशंस असिस्टेंस मिशन इन सिएरा लियोन के तहत अफ्रीका में अंजाम दिया गया था. वैसे ये एक ऐसा बहुराष्ट्रीय ऑपरेशन था, जिसमें भारत के अलावा घाना, ब्रिटेन और नाइजीरिया भी शामिल थे. लेकिन इस ऑपरेशन को केवल भारतीय सेना ने अपने दम पर अंजाम दिया था और विद्रोहियों के संगठन रिवोल्यूशनरी यूनाइटेड फ्रंट (RUF) के चंगुल में ढ़ाई माह से फंसे 223 भारतीय जवानों को सकुशल मुक्त कराया था.

    223 Indian Hostages Were Freed By The Indian Army On This Day Operation Khukri :

    यूनाइटेड नेशंस के शांति मिशन में लगे भारतीय सेना के जवानों को विद्रोहियों के संगठन रिवोल्यूशनरी यूनाइटेड फ्रंट ने बंधक बनाकर रखा था. उन विद्रोहियों से कई देश उलझना नहीं चाहते थे. यही वजह थी कि जब भारत ने ऑपरेशन खुकरी के लिए अमेरिका और ब्रिटेन ने किसी भी तरह की मदद देने से साफ मना कर दिया था. बताया जाता है कि यूनाइटेड नेशंस के अधिकारी भी इस ऑपरेशन से दूर रहना चाहते थे.

    ऐसे शुरू हुआ था बंधक संकटबात 90 के दशक की है. अफ्रीका के सियेरा लियोन में तबाही मची हुई थी. लोग मारे जा रहे थे. साल 1991 से गृहयुद्ध चल रहा था. ना जाने कितने ही लोग इस गृहयुद्ध की भेंट चढ़ चुके थे. किसी तरह से ये गृहयुद्ध 8 साल बाद तब शांत हुआ, जब वर्ष 1999 में वहां की निर्वाचित सरकार ने विद्रोहियों को बातचीत के लिए राजी किया. कई दौर की बातचीत हुई. जिसका नतीजा ये हुआ कि विद्रोहियों ने सेना और सरकार के साथ समझौता कर लिया. अब सबसे बड़ी चुनौती थी कि इस समझौते को पूरे देश में लागू करना.

    यूनाइटेड नेशंस वहां के हालात पर लगातार नजर रख रहा था. लिहाजा समझौते को लागू कराने के लिए यूनाइटेड नेशंस ने एक शांति सेना तैयार करने का फैसला किया. शांति सेना का गठन हुआ तो भारतीय जवान भी इस शांति सेना का हिस्सा बने. अप्रैल 2000 में भारतीय सेना के जवान शांति सेना शामिल हुए और उन्हें कैलाहुन और दारू इलाके में तैनाती दी गई.

    सब ठीक चल रहा था. लेकिन 1 मई 2000 को विद्रोहियों के संगठन रिवोल्यूशनरी यूनाइटेड फ्रंट के कुछ तत्वों ने मकेनी इलाके में सैन्य बलों पर हमला कर दिया. इस दौरान संपर्क नहीं होने की वजह से कैलाहुन में तैनात टुकड़ी को इसकी ख़बर नहीं लगी. अगले दिन वहां सेना के कुछ कमांडरों की विद्रोहियों के नेताओं के साथ बैठक थी. उसी दौरान विद्रोहियों ने बैठक के बहाने सैन्य कमांडरों को बंधक बना लिया और पूरे इलाके में कब्जा कर लिया.

    दस दिन बीत चुके थे. वहां की जनता और शांति सेना के दबाव में विद्रोहियों ने बैठक में शामिल होने के गए कुछ चुनिंदा अधिकारियों को वापस बेस पर जाने की इजाजत दे दी. साथ ही कुछ बंधकों को रिहा भी किया गया. लेकिन आगे हालात बिगड़ते जा रहे थे. विद्रोहियों ने 500 केन्याई शांति सैनिकों के हथियार छीन लिए और फ़्रीटाउन की ओर बढ़ना शुरू कर दिया. इस बात से इलाके में दहशत का माहौल था. इसी बीच ब्रिटिश सैनिकों ने फ़्रीटाउन से नागरिकों और कर्मचारियों को हटा दिया था.

    सैन्य दल की क्यूआरएफ टीम ने मगोरबका में मोर्चा संभाला. जहां विद्रोहियों ने अधिक संख्या में केन्याई सैनिकों को घेर लिया था. QRF टीम ने बढ़त बनाई. विद्रोहियों को घात लगाकर पीछे जाने पर मजबूर कर दिया और केन्याई लोगों को बचाया, लेकिन कैलाहुन में हालत खराब होते जा रहे थे. वहां 5/8वीं गोरखा राइफल्स की दो कंपनियां सैकड़ों आरयूएफ विद्रोहियों के बीच अपने बेस में घिरी हुई थीं. फिर मौका पाकर भारी संख्या में वहां मौजूद विद्रोहियों ने उन्हें बंधक बना लिया.

    भारतीय सैनिकों को छुड़ाने के लिए हरसंभव रास्ता तलाश किया जा रहा था. विद्रोही नेताओं से बातचीत चल रही थी. लेकिन कोई हल नहीं निकला. अब भारतीय सेना इंतजार नहीं कर सकती थी. भारत ने विद्रोहियों के कब्जे से अपने 223 जवानों को किसी भी हाल में छुड़ाने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया था. उधर, विद्रोही किसी भी हाल में मानने को तैयार नहीं थे. भारत ने ब्रिटेन और अमेरिका से मदद मांगी लेकिन उन दोनों ने मना कर दिया.

    तब भारतीय सेना ने विद्रोहियों को सबक सिखाने की ठान ली. भारतीय सेना ने ऑपरेशन खुकरी की तैयारी पूरी कर ली थी. 30 घंटे में इस ऑपरेशन को पूरा करने का प्लान था. लेकिन उस इलाके में भारी बारिश हो रही थी. ऐसे में ऑपरेशन शुरू करना खतरे से खाली नहीं था. करीब दस घंटे बाद बारिश थम चुकी थी. वो 15 जुलाई का दिन था. भारतीय सेना के जवान विद्रोहियों से लोहा लेने के लिए तैयार थे. बंधक संकट के पचहत्तरवें दिन ऑपरेशन खुकरी शुरू हुआ.

    नई दिल्ली: ऑपरेशन खुकरी भारतीय सेना के शौर्य की एक ऐसी मिसाल थी, जिसे याद कर आज भी भारतीय नागरिक गर्व महसूस करते हैं. दरअसल, यह ऑपरेशन यूनाइटेड नेशंस असिस्टेंस मिशन इन सिएरा लियोन के तहत अफ्रीका में अंजाम दिया गया था. वैसे ये एक ऐसा बहुराष्ट्रीय ऑपरेशन था, जिसमें भारत के अलावा घाना, ब्रिटेन और नाइजीरिया भी शामिल थे. लेकिन इस ऑपरेशन को केवल भारतीय सेना ने अपने दम पर अंजाम दिया था और विद्रोहियों के संगठन रिवोल्यूशनरी यूनाइटेड फ्रंट (RUF) के चंगुल में ढ़ाई माह से फंसे 223 भारतीय जवानों को सकुशल मुक्त कराया था. यूनाइटेड नेशंस के शांति मिशन में लगे भारतीय सेना के जवानों को विद्रोहियों के संगठन रिवोल्यूशनरी यूनाइटेड फ्रंट ने बंधक बनाकर रखा था. उन विद्रोहियों से कई देश उलझना नहीं चाहते थे. यही वजह थी कि जब भारत ने ऑपरेशन खुकरी के लिए अमेरिका और ब्रिटेन ने किसी भी तरह की मदद देने से साफ मना कर दिया था. बताया जाता है कि यूनाइटेड नेशंस के अधिकारी भी इस ऑपरेशन से दूर रहना चाहते थे. ऐसे शुरू हुआ था बंधक संकटबात 90 के दशक की है. अफ्रीका के सियेरा लियोन में तबाही मची हुई थी. लोग मारे जा रहे थे. साल 1991 से गृहयुद्ध चल रहा था. ना जाने कितने ही लोग इस गृहयुद्ध की भेंट चढ़ चुके थे. किसी तरह से ये गृहयुद्ध 8 साल बाद तब शांत हुआ, जब वर्ष 1999 में वहां की निर्वाचित सरकार ने विद्रोहियों को बातचीत के लिए राजी किया. कई दौर की बातचीत हुई. जिसका नतीजा ये हुआ कि विद्रोहियों ने सेना और सरकार के साथ समझौता कर लिया. अब सबसे बड़ी चुनौती थी कि इस समझौते को पूरे देश में लागू करना. यूनाइटेड नेशंस वहां के हालात पर लगातार नजर रख रहा था. लिहाजा समझौते को लागू कराने के लिए यूनाइटेड नेशंस ने एक शांति सेना तैयार करने का फैसला किया. शांति सेना का गठन हुआ तो भारतीय जवान भी इस शांति सेना का हिस्सा बने. अप्रैल 2000 में भारतीय सेना के जवान शांति सेना शामिल हुए और उन्हें कैलाहुन और दारू इलाके में तैनाती दी गई. सब ठीक चल रहा था. लेकिन 1 मई 2000 को विद्रोहियों के संगठन रिवोल्यूशनरी यूनाइटेड फ्रंट के कुछ तत्वों ने मकेनी इलाके में सैन्य बलों पर हमला कर दिया. इस दौरान संपर्क नहीं होने की वजह से कैलाहुन में तैनात टुकड़ी को इसकी ख़बर नहीं लगी. अगले दिन वहां सेना के कुछ कमांडरों की विद्रोहियों के नेताओं के साथ बैठक थी. उसी दौरान विद्रोहियों ने बैठक के बहाने सैन्य कमांडरों को बंधक बना लिया और पूरे इलाके में कब्जा कर लिया. दस दिन बीत चुके थे. वहां की जनता और शांति सेना के दबाव में विद्रोहियों ने बैठक में शामिल होने के गए कुछ चुनिंदा अधिकारियों को वापस बेस पर जाने की इजाजत दे दी. साथ ही कुछ बंधकों को रिहा भी किया गया. लेकिन आगे हालात बिगड़ते जा रहे थे. विद्रोहियों ने 500 केन्याई शांति सैनिकों के हथियार छीन लिए और फ़्रीटाउन की ओर बढ़ना शुरू कर दिया. इस बात से इलाके में दहशत का माहौल था. इसी बीच ब्रिटिश सैनिकों ने फ़्रीटाउन से नागरिकों और कर्मचारियों को हटा दिया था. सैन्य दल की क्यूआरएफ टीम ने मगोरबका में मोर्चा संभाला. जहां विद्रोहियों ने अधिक संख्या में केन्याई सैनिकों को घेर लिया था. QRF टीम ने बढ़त बनाई. विद्रोहियों को घात लगाकर पीछे जाने पर मजबूर कर दिया और केन्याई लोगों को बचाया, लेकिन कैलाहुन में हालत खराब होते जा रहे थे. वहां 5/8वीं गोरखा राइफल्स की दो कंपनियां सैकड़ों आरयूएफ विद्रोहियों के बीच अपने बेस में घिरी हुई थीं. फिर मौका पाकर भारी संख्या में वहां मौजूद विद्रोहियों ने उन्हें बंधक बना लिया. भारतीय सैनिकों को छुड़ाने के लिए हरसंभव रास्ता तलाश किया जा रहा था. विद्रोही नेताओं से बातचीत चल रही थी. लेकिन कोई हल नहीं निकला. अब भारतीय सेना इंतजार नहीं कर सकती थी. भारत ने विद्रोहियों के कब्जे से अपने 223 जवानों को किसी भी हाल में छुड़ाने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया था. उधर, विद्रोही किसी भी हाल में मानने को तैयार नहीं थे. भारत ने ब्रिटेन और अमेरिका से मदद मांगी लेकिन उन दोनों ने मना कर दिया. तब भारतीय सेना ने विद्रोहियों को सबक सिखाने की ठान ली. भारतीय सेना ने ऑपरेशन खुकरी की तैयारी पूरी कर ली थी. 30 घंटे में इस ऑपरेशन को पूरा करने का प्लान था. लेकिन उस इलाके में भारी बारिश हो रही थी. ऐसे में ऑपरेशन शुरू करना खतरे से खाली नहीं था. करीब दस घंटे बाद बारिश थम चुकी थी. वो 15 जुलाई का दिन था. भारतीय सेना के जवान विद्रोहियों से लोहा लेने के लिए तैयार थे. बंधक संकट के पचहत्तरवें दिन ऑपरेशन खुकरी शुरू हुआ.