ये कैसी कर्जमाफी : 18 दिनों में कर्नाटक के 30 किसानों की आत्महत्या

Hopeless Farmer
ये कैसी कर्जमाफी : 18 दिनों में कर्नाटक के 30 किसानों की आत्महत्या

नई दिल्ली। एक रिपोर्ट के अनुसार कर्नाटक में नई सरकार बनने के बाद 5 जुलाई को बुलाए गए बजट सत्र में किसानों की लोन माफी की घोषणा के बाद 18 दिनों में कर्नाटक के 30 किसानों ने आत्महत्या की है। लोन माफी के बाद भी किसानों की आत्महत्याओं के ये मामले उन सरकारी दावों की पोल खोलते दिख रहे हैं, जिनमें लोन माफी को अत्महत्या रोकने का हथियार के रूप में देखा जाता है।

30 Farmers Committed Suicide After Loan Waiver In Karnataka :

कर्नाटक में कांग्रेस, जेडीएस और बसपा के गठबंधन वाली सरकार द्वारा लोन माफी का दिया जाना, केन्द्र सरकार की ओर से खरीफ की फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा और अच्छे मानसून के बावजूद किसानों की आत्महत्याएं अपने आप में कई सवाल खड़े कर रहीं हैं।

कर्नाटक में किसानों की आत्महत्या के मुख्य कारण के रूप में बैंक लोन, सिंचाई की कमी और सूखे को मुख्य कारण के रूप में देखा जाता रहा है। हालांकि एक अंग्रेजी अखबार की​ रिपोर्ट के मुताबिक अच्छे मानसून के बावजूद जिन किसानों ने आत्महत्याएं की है उनके इलाकों में सिंचाई के व्यवस्थित प्रबंध हैं। सरकार ने उनके कर्ज भी माफ किए हैं, लेकिन इसके बाद भी किसानों की दशा में किसी प्रकार के संकेत नजर नहीं आ रहे।

इसी मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि आत्महत्या करने वाले किसानों में 3 लाख से लेकर 30 लाख तक का बैंक लोन रखने वाले किसान शामिल हैं। जिनमें से अधिकांश ऐसे थे जो 3 लाख से 10 लाख तक के कर्जदार थे। कर्ज अधिक होने की स्थिति में इन किसानों के पास फसल लोन लेने का कोई विकल्प नहीं था। पिछली कुछ फसलों के लिए इन सभी ने स्थानीय सूदखोरों से भी कर्ज ले रखा था। जिनकी वसूली से तंग आकर किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं।

​भारत में केवल कर्नाटक ही नहीं है जहां किसानों की दुर्दशा है इस मामले में महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश समेंत अन्य राज्य भी शामिल हैं। दशकों से सरकारी अनदेखी और प्राकृतिक आपदाओं का शिकार हो रहे किसानों की माली हालत इतनी जरजर है कि उनके सामने आत्महत्या करने के अलावा कोई विकल्प ही शेष नहीं है।

कर्नाटक से आई यह रिपोर्ट उन सियासी हुकमरानों के लिए आंखें खोलने वाली है जिन्हें लगता है कि किसानों का कर्ज भर मांफ कर देने से उनकी जिन्दगी में बदलाव आ जाएगा। वास्तविकता ये है कि फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य कुछ सौ रुपए बढ़ा देने से और आधे आधे वादों से किसानों की स्थिति में बदलाव आने वाला नहीं है। किसान के जीवन स्तर में बदलाव लाने के लिए ​सरकार को नियमित प्रक्रिया के तहत साल दर साल उसकी फसल को सही मूल्य दिलाने और उसे फसल पैदा करने के लिए सहूलियतें पहुंचानी होगी। जिसके बाद ही किसानों के जीवन स्तर में किसी प्रकार का बदलाव संभव है।

नई दिल्ली। एक रिपोर्ट के अनुसार कर्नाटक में नई सरकार बनने के बाद 5 जुलाई को बुलाए गए बजट सत्र में किसानों की लोन माफी की घोषणा के बाद 18 दिनों में कर्नाटक के 30 किसानों ने आत्महत्या की है। लोन माफी के बाद भी किसानों की आत्महत्याओं के ये मामले उन सरकारी दावों की पोल खोलते दिख रहे हैं, जिनमें लोन माफी को अत्महत्या रोकने का हथियार के रूप में देखा जाता है।कर्नाटक में कांग्रेस, जेडीएस और बसपा के गठबंधन वाली सरकार द्वारा लोन माफी का दिया जाना, केन्द्र सरकार की ओर से खरीफ की फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा और अच्छे मानसून के बावजूद किसानों की आत्महत्याएं अपने आप में कई सवाल खड़े कर रहीं हैं।कर्नाटक में किसानों की आत्महत्या के मुख्य कारण के रूप में बैंक लोन, सिंचाई की कमी और सूखे को मुख्य कारण के रूप में देखा जाता रहा है। हालांकि एक अंग्रेजी अखबार की​ रिपोर्ट के मुताबिक अच्छे मानसून के बावजूद जिन किसानों ने आत्महत्याएं की है उनके इलाकों में सिंचाई के व्यवस्थित प्रबंध हैं। सरकार ने उनके कर्ज भी माफ किए हैं, लेकिन इसके बाद भी किसानों की दशा में किसी प्रकार के संकेत नजर नहीं आ रहे।इसी मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि आत्महत्या करने वाले किसानों में 3 लाख से लेकर 30 लाख तक का बैंक लोन रखने वाले किसान शामिल हैं। जिनमें से अधिकांश ऐसे थे जो 3 लाख से 10 लाख तक के कर्जदार थे। कर्ज अधिक होने की स्थिति में इन किसानों के पास फसल लोन लेने का कोई विकल्प नहीं था। पिछली कुछ फसलों के लिए इन सभी ने स्थानीय सूदखोरों से भी कर्ज ले रखा था। जिनकी वसूली से तंग आकर किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं।​भारत में केवल कर्नाटक ही नहीं है जहां किसानों की दुर्दशा है इस मामले में महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश समेंत अन्य राज्य भी शामिल हैं। दशकों से सरकारी अनदेखी और प्राकृतिक आपदाओं का शिकार हो रहे किसानों की माली हालत इतनी जरजर है कि उनके सामने आत्महत्या करने के अलावा कोई विकल्प ही शेष नहीं है।कर्नाटक से आई यह रिपोर्ट उन सियासी हुकमरानों के लिए आंखें खोलने वाली है जिन्हें लगता है कि किसानों का कर्ज भर मांफ कर देने से उनकी जिन्दगी में बदलाव आ जाएगा। वास्तविकता ये है कि फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य कुछ सौ रुपए बढ़ा देने से और आधे आधे वादों से किसानों की स्थिति में बदलाव आने वाला नहीं है। किसान के जीवन स्तर में बदलाव लाने के लिए ​सरकार को नियमित प्रक्रिया के तहत साल दर साल उसकी फसल को सही मूल्य दिलाने और उसे फसल पैदा करने के लिए सहूलियतें पहुंचानी होगी। जिसके बाद ही किसानों के जीवन स्तर में किसी प्रकार का बदलाव संभव है।