कश्मीरी पंडितों के सामूहिक पलायन के 30 साल, वो मंजर याद कर आज भी सिहर जाते हैं लोग

Kashmiri pandit
कश्मीरी पंडितों के सामूहिक पलायन के 30 साल, वो मंजर याद कर आज भी सिहर जाते हैं लोग

नई दिल्ली। आतंकियों के खौफ से कश्मीरी पंडितों के घाटी से पलायन के आज 30 साल पूरे हो गए हैं। कश्मीरी पंडित समुदाय के लोगों ने इसे याद करते हुए सोशल मीडिया पर खुद का वीडियो पोस्ट किया। 19 जनवरी, 1990 को लाखों कश्मीरी पंडित घाटी में आतंकवादियों द्वारा किए गए जनसंहार के बाद अपने घरों को छोड़ने के लिए मजबूर हो गए।
पनुन कश्मीर का अर्थ है हमारा खुद का कश्मीर। वह कश्मीर जिसे कश्मीरी पंडितों ने खो दिया है। पन्नुन कश्मीर, कश्मीर का वह हिस्सा है, जहां बहुतायत में कश्मीरी पंडित रहते थे। लेकिन 1989 से 1995 के बीच दहशत और मौत का एक ऐसा दौर चला की पंडितों को कश्मीर से पलायन होने पर मजबूर होना पड़ा।

30 Years Of Mass Exodus Of Kashmiri Pandits Remembering People They Still Tremble Today :

इस नरसंहार में 6000 कश्मीरी पंडितों को मारा गया। 750000 पंडितों को पलायन के लिए मजबूर किया गया। 1500 मंदिरों नष्ट कर दिए गए। 600 कश्मीरी पंडितों के गांवों को इस्लामी नाम दिया गया। इस नरसंहार को भारत की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सरकार मूकदर्शक बनकर देखती रही। आज भी नरसंहार करने और करवाने वाले खुलेआम घुम रहे हैं।

इस मौके पर सुप्रसिद्ध राजनीतिक टिप्पणीकार सुनंदा वशिष्ठ ने खुद की बचपन एक तस्वीर ट्वीट की और कहा कि घर वापस जाने का संकल्प मजबूत हुआ है। उन्होंने ट्वीट करके कहा कि मेरे पास अपने बचपन की कई तस्वीरें नहीं हैं। जीवन और फैमली एल्बमों के बीच चयन करने में कोई विकल्प नहीं है। जान बचाने के दौरान फैमली एल्बम पीछे छूट गए। 30 साल हो गए। घर वापस जाने का संकल्प केवल मजबूत हुआ है।

पत्रकार राहुल पंडिता भी ट्विटर पर लिखा ‘कश्मीर से 30 साल का वनवास। अब हम प्रतिज्ञा करते हैं कि हम घर लौटेंगे। विधु विनोद चोपड़ा के निर्देशन में बनी फिल्म ‘शिकारा’ कश्मीरी पंडितों के पलायन पर अधारित है। यह फिल्म सात फरवरी को रिलीज होने वाली है। लोगों ने ट्विटर पर इस पहल का समर्थन किया है और कश्मीरी पंडितों के साथ एकजुटता व्यक्त की है।

पिछले साल जुलाई में गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में कहा कि केंद्र सरकार कश्मीरी पंडितों और सूफियों को घाटी में वापस लाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने इस दौरान यह भी कहा था कि एक समय आएगा जब वे प्रसिद्ध खीर भवानी मंदिर में प्रार्थना करेंगे। माता खीर भवानी मंदिर कश्मीरी पंडितों के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक है, जो श्रीनगर से लगभग 14 किलोमीटर पूर्व में स्थित है।

अमित शाह ने इस दौरान कहा था कि कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ने के लिए मजबूर किया गया। उनके कई मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया। जम्मू-कश्मीर में सूफीवाद को निशाना बनाया गया। सूफीवाद एकता और सद्भाव का प्रतीक है, लेकिन उन पर हमला किया गया। कश्मीरी पंडितों और सूफियों के पक्ष में कोई आवाज नहीं उठाई गई जब उन पर क्रूरतापूर्वक हमला किया गया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार कश्मीरी पंडितों को वापस लाने के लिए प्रतिबद्ध है।

नई दिल्ली। आतंकियों के खौफ से कश्मीरी पंडितों के घाटी से पलायन के आज 30 साल पूरे हो गए हैं। कश्मीरी पंडित समुदाय के लोगों ने इसे याद करते हुए सोशल मीडिया पर खुद का वीडियो पोस्ट किया। 19 जनवरी, 1990 को लाखों कश्मीरी पंडित घाटी में आतंकवादियों द्वारा किए गए जनसंहार के बाद अपने घरों को छोड़ने के लिए मजबूर हो गए। पनुन कश्मीर का अर्थ है हमारा खुद का कश्मीर। वह कश्मीर जिसे कश्मीरी पंडितों ने खो दिया है। पन्नुन कश्मीर, कश्मीर का वह हिस्सा है, जहां बहुतायत में कश्मीरी पंडित रहते थे। लेकिन 1989 से 1995 के बीच दहशत और मौत का एक ऐसा दौर चला की पंडितों को कश्मीर से पलायन होने पर मजबूर होना पड़ा। इस नरसंहार में 6000 कश्मीरी पंडितों को मारा गया। 750000 पंडितों को पलायन के लिए मजबूर किया गया। 1500 मंदिरों नष्ट कर दिए गए। 600 कश्मीरी पंडितों के गांवों को इस्लामी नाम दिया गया। इस नरसंहार को भारत की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सरकार मूकदर्शक बनकर देखती रही। आज भी नरसंहार करने और करवाने वाले खुलेआम घुम रहे हैं। इस मौके पर सुप्रसिद्ध राजनीतिक टिप्पणीकार सुनंदा वशिष्ठ ने खुद की बचपन एक तस्वीर ट्वीट की और कहा कि घर वापस जाने का संकल्प मजबूत हुआ है। उन्होंने ट्वीट करके कहा कि मेरे पास अपने बचपन की कई तस्वीरें नहीं हैं। जीवन और फैमली एल्बमों के बीच चयन करने में कोई विकल्प नहीं है। जान बचाने के दौरान फैमली एल्बम पीछे छूट गए। 30 साल हो गए। घर वापस जाने का संकल्प केवल मजबूत हुआ है। पत्रकार राहुल पंडिता भी ट्विटर पर लिखा 'कश्मीर से 30 साल का वनवास। अब हम प्रतिज्ञा करते हैं कि हम घर लौटेंगे। विधु विनोद चोपड़ा के निर्देशन में बनी फिल्म 'शिकारा' कश्मीरी पंडितों के पलायन पर अधारित है। यह फिल्म सात फरवरी को रिलीज होने वाली है। लोगों ने ट्विटर पर इस पहल का समर्थन किया है और कश्मीरी पंडितों के साथ एकजुटता व्यक्त की है। पिछले साल जुलाई में गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में कहा कि केंद्र सरकार कश्मीरी पंडितों और सूफियों को घाटी में वापस लाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने इस दौरान यह भी कहा था कि एक समय आएगा जब वे प्रसिद्ध खीर भवानी मंदिर में प्रार्थना करेंगे। माता खीर भवानी मंदिर कश्मीरी पंडितों के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक है, जो श्रीनगर से लगभग 14 किलोमीटर पूर्व में स्थित है। अमित शाह ने इस दौरान कहा था कि कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ने के लिए मजबूर किया गया। उनके कई मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया। जम्मू-कश्मीर में सूफीवाद को निशाना बनाया गया। सूफीवाद एकता और सद्भाव का प्रतीक है, लेकिन उन पर हमला किया गया। कश्मीरी पंडितों और सूफियों के पक्ष में कोई आवाज नहीं उठाई गई जब उन पर क्रूरतापूर्वक हमला किया गया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार कश्मीरी पंडितों को वापस लाने के लिए प्रतिबद्ध है।