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करोड़ों खर्च के बाद भी दूषित हो रही हैं सभी नदियां, अब गोमती किनारे टहलना हुआ जानलेवा

A Stroll Along The Gomti River Can Be Sick

By शिव मौर्या 
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लखनऊ। सूबे में नदियों की सफाई का दावा करने वाली सरकार की कलई खुलने लगी है। नदियों की सफाई के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिये गये लेकिन नदियों की हालत पहले से भी बदतर हो गयी है। उत्तर प्रदेश ठोस अपशिष्ट प्रबंधन एवं अनुश्रवण स​मिति की तरफ से नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को भेजी गई रिपोर्ट ने गोमती नदी की सफाई के दावों की पोल खोल दी है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि गोमती का पानी पीना, डुबकी लगाना या आचमन करना तो दूर अब किनारे टहलना भी आपको बीमार कर सकती है। इस रिपोर्ट में गोमती किनारों पर मॉर्निंग वॉक से बचने की सलाह दी गई है, क्योंकि नदी के कचरे की सड़न के कारण हवा भी बिगड़ रही है।

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रिपोर्ट में बताया गया है कि, इसे रोकने में मुख्य सचिव समेत प्रदेश सरकार के आला​धिकारी पूरी तरह से फेल साबित हुए हैं। समिति के सचिव और पूर्व जिला जज राजेंद्र सिंह ने नदी के इस हाल के लिए राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार को जिम्मेदार ठहराया है। अनुश्रण ​समिति की रिपोर्ट में बताया गया है कि, राजधानी लखनऊ के साथ प्रदेश के दस जिलों में भी गोमती नदी में प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है, जो बेहद ही चिंताजनक है। पीलीभीत, शाहजहांपुर, लखीमपुर-खीरी, हरदोई, सीतापुर, बाराबंकी, फैजाबाद, सुलतानपुर, प्रतापगढ़ और जौनपुर के लोगों को भी चेतावनी जारी की गयी है।

इन जिलों के लोगों को भी नदी में स्नान करने या पानी से आचमन न करने की सलाह दी गयी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, इन जिलों के लोगों को जागरूक किया जाये, जिसकी जिम्मेदारी जिलाधिकारी को दी जाये। इसके साथ ही रिपोर्ट में जल निगम की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाये गये हैं। समिति की रिपोर्ट में बताया गया है कि, सीवरेज, पंपिंग स्टेशन और सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट रोजाना 24 घंटे चलाने का दावा पूरी तरह से झूठा है। इसके लिए जल निगम पर तीन करोड़ रुपये का पर्यावरणीय हर्जाना लगाने की सिफारिश की गई है।

23 जनवरी को बनाई गई थी कमेटी
करोड़ों रुपये बहाने के बाद भी नदियां साफ नहीं हुईं। इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 23 जनवरी को एक कमेटी का गठन किया गया। कमेटी ने चार महीने तक गोमती नदी के अलग—अगल हिस्सों में पानी के नमूने लिए और जांच की। इसके साथ ही गोमती नदी और उसमें फैल रहे प्रदूषण के अलग—अलग बिंदुओं पर अध्ययन के बाद सोमवार को अपनी रिपोर्ट एनजीटी को सौंप दी। रिपोर्ट में बताया गया है कि कई जगह, गोमती नदी के पानी में आक्सिजन की मात्रा शून्य पाई गई है। एनजीटी के निर्देश पर उप्र ठोस अपशिष्ट प्रबंधन एवं अनुश्रवण समिति ने शहर के अलग-अलग हिस्सों से गोमती नदी के पानी के नमूने एकत्र किए। उसमें रासायनिक तत्वों की जांच, नागरिकों के साथ बैठकें और निरीक्षण करवाने के बाद 81 पन्नों की यह रिपोर्ट तैयारी की गई।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पर 6 करोड़ 84 लाख जुर्माना लगाने की सिफारिश
रिपोर्ट में बताया गया है कि, गोमती नदी को साफ रखने में यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पूरी तरह से फेल साबित हुआ है। इसको लेकर भारतीय दंड संहिता और पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986 के तहत प्रदूषण बोर्ड पर 6 करोड़ 84 लाख 75 हजार रुपये का जुर्माना लगाने की सिफारिश की है। इसके साथ ही लखनऊ नगर निगम पर दो करोड़ रुपये का जुर्माना लगाने को कहा गया है। वहीं इससे पहले भी ​नगर निगम पर पांच करोड़ का जुर्माना लग चुका है, जो जमा नहीं हुआ है। ऐसे में एनजीटी अगर हर्जाने की सिफारिश मान लेता है तो निगम पर कुल 7 करोड़ रुपये का हर्जाना बकाया हो जाएगा।

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जांच कमिटी ने इन बिंदुओं पर की सिफारिशें
जिलाधिकारी, जल निगम और संबंधित विभाग नमामि गंगा परियोजना के तहत सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट के डीपीआर भेजें। इस पर नौ महीने के अंदर फैसला हो।

— राजधानी लखनऊ समेत दस जिलों के नगर निगम और नगर पालिका पर एक—एक करोड़ रुपये का पर्यावरणीय हर्जाना लगाया जाये।

— गोमती नदी के दोनों ओर 150 मीटर के दायरे में कोई निर्माण न किया जाए।

— यूपी सरकार 100 करोड़ रुपये की गांरटी जमा करे। दो साल के भीतर नदी में गिरने वाले नालों के लिए एसटीपी नहीं बनने पर यह जब्त कर लिया जाए।

— नगर आयुक्त, जिला मैजिस्ट्रेट, अधिशासी अधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि गोमती में गिरने वाले नालों के मुहाने पर स्टील की जाली लगाई जाए।

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