39 साल बाद कोर्ट ने आरोपी को माना 17 साल का नाबालिग, उम्रकैद माफ़

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39 साल बाद कोर्ट ने आरोपी को माना 17 साल का नाबालिग, उम्रकैद माफ़

नई दिल्ली। बिहार के गया निवासी एक व्यक्ति को कोर्ट ने 39 साल मुकदमा लड़ने और 10 साल जेल काटने के बाद रिहा करने का हुक्म सुनाया है। 1980 में नाबालिग रहते मामूली कहासुनी पर उसने चचेरे भाई की हत्या कर दी। लेकिन, निचली अदालत और हाईकोर्ट ने उसे नाबालिग नहीं माना। क्योंकि, उसने 10 साल सजा काट ली है जो नाबालिग होने पर सुनाई जाने वाली सजा का लगभग तीन गुना है।

After 39 Years Of Trial And Spending 10 Years In Jail Sc Ordered Accused Was Minor During Crim :

क्या है पूरा मामला?

ये घटना 1980 की है। बिहार के गया में बनारस सिंह अपने चचेरे भाई के साथ एक होटल पहुंचे. इसी होटल में उसने भाई की हत्या कर दी। कुछ देर के बाद होटल स्टाफ को पता चला कि बनारस सिंह वहां से गायब हो गया। लेकिन बाद में पुलिस से उसे गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद गया की एक कोर्ट ने उसे हत्या के आरोप में आजावीन कारावास की सजा सुना दी। वो 10 साल से ज्यादा समय तक जेल में रहा।

फैसले को चुनौती

इसके बाद बनारस सिंह ने पटना हाईकोर्ट में सजा के खिलाफ अपील दायर की। उनकी दलील थी कि उसने जिस वक्त हत्या की तब वो नाबालिग था। सिंह ने कोर्ट में कहा कि उस वक्त उनकी उम्र 17 साल 6 महीने थी। उस लिहाज से उसे नाबालिग के हिसाब से सजा दी जाए, लेकिन हाई कोर्ट ने 1998 में उनकी इस अपील को खारीज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला

साल 2009 में सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में पटना हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी। उनके वकील ने बिहार चाइल्ड्स एक्ट और जुविनाइल जस्टिस एक्ट का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपनी बात रखी। दस साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से जवाब मांगा। रिपोर्ट में 10वीं के सर्टिफिकेट और बाकी रिकॉर्ड्स के हवाले ये साबित हो गया कि बनारस सिंह हत्या के समय 17 साल 6 महीने के थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिंह पहले ही करीब 10 साल की सजा काट चुके हैं। ऐसे में तुरंत उसे जेल से रिहा किया जाना चाहिए।

नई दिल्ली। बिहार के गया निवासी एक व्यक्ति को कोर्ट ने 39 साल मुकदमा लड़ने और 10 साल जेल काटने के बाद रिहा करने का हुक्म सुनाया है। 1980 में नाबालिग रहते मामूली कहासुनी पर उसने चचेरे भाई की हत्या कर दी। लेकिन, निचली अदालत और हाईकोर्ट ने उसे नाबालिग नहीं माना। क्योंकि, उसने 10 साल सजा काट ली है जो नाबालिग होने पर सुनाई जाने वाली सजा का लगभग तीन गुना है। क्या है पूरा मामला? ये घटना 1980 की है। बिहार के गया में बनारस सिंह अपने चचेरे भाई के साथ एक होटल पहुंचे. इसी होटल में उसने भाई की हत्या कर दी। कुछ देर के बाद होटल स्टाफ को पता चला कि बनारस सिंह वहां से गायब हो गया। लेकिन बाद में पुलिस से उसे गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद गया की एक कोर्ट ने उसे हत्या के आरोप में आजावीन कारावास की सजा सुना दी। वो 10 साल से ज्यादा समय तक जेल में रहा। फैसले को चुनौती इसके बाद बनारस सिंह ने पटना हाईकोर्ट में सजा के खिलाफ अपील दायर की। उनकी दलील थी कि उसने जिस वक्त हत्या की तब वो नाबालिग था। सिंह ने कोर्ट में कहा कि उस वक्त उनकी उम्र 17 साल 6 महीने थी। उस लिहाज से उसे नाबालिग के हिसाब से सजा दी जाए, लेकिन हाई कोर्ट ने 1998 में उनकी इस अपील को खारीज कर दी। सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला साल 2009 में सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में पटना हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी। उनके वकील ने बिहार चाइल्ड्स एक्ट और जुविनाइल जस्टिस एक्ट का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपनी बात रखी। दस साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से जवाब मांगा। रिपोर्ट में 10वीं के सर्टिफिकेट और बाकी रिकॉर्ड्स के हवाले ये साबित हो गया कि बनारस सिंह हत्या के समय 17 साल 6 महीने के थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिंह पहले ही करीब 10 साल की सजा काट चुके हैं। ऐसे में तुरंत उसे जेल से रिहा किया जाना चाहिए।