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AIMPLB ने सुप्रीम कोर्ट से बहुविवाह, निकाह- हलाला के खिलाफ याचिकाएं न सुनने की अपील की

Aimplb Appeals To Supreme Court Not To Hear Petitions Against Polygamy Nikah Halala

By रवि तिवारी 
Updated Date

नई दिल्ली। बहुविवाह और निकाह हलाला के खिलाफ दायर याचिकाओं के खिलाफ ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ( AIMPLB) ने भी सुप्रीम कोर्ट में हस्तक्षेप याचिका दाखिल की है। अर्जी में बोर्ड ने कहा कि बहुविवाह, निकाह हलाला, शरिया कोर्ट, निकाह मुताह के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट याचिकाओं पर सुनवाई न करे।

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बोर्ड ने कहा है कि 1997 में सुप्रीम कोर्ट पहले ही तय कर चुका है कि पर्सनल लॉ को मौलिक अधिकारों की कसौटी पर परखा नहीं जा सकता है। कोर्ट ने कहा था कि अदालत इन पर सुनवाई नहीं कर सकती और ये विधायिका के क्षेत्राधिकार का मामला है। बोर्ड ने कहा है कि ये नियम पवित्र कुरान और हदीस से लिए गए हैं।

आपको बता दें कि इस संबंध में बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय समेत कुछ अन्य याचिकाएं दाखिल की गई हैं। याचिकाओं में कहा गया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 की धारा 2 को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 का उल्लंघन करने वाला घोषित किया जाए, क्योंकि यह बहु विवाह और निकाह हलाला को मान्यता देता है। भारतीय दंड संहिता, 1860 के प्रावधान सभी भारतीय नागरिकों पर बराबरी से लागू हों। याचिका में यह भी कहा गया है कि ‘ट्रिपल तलाक’ आईपीसी की धारा 498A के तहत एक क्रूरता है।  

क्या है निकाह हलाला?

अगर वर्तमान मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधानों को देखें तो इनके मुताबिक अगर किसी मुस्लिम महिला का तलाक हो गया है और वह उसी पति से दोबारा निकाह करना चाहती है, तो उसे पहले किसी और शख्स से शादी कर एक रात गुजारनी होती है। इस प्रथा को निकाह हलाला कहते हैं।

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इससे पहले पिछले साल जून में दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने तीन तलाक बिल में निकाह हलाला और बहुविवाह पर रोक लगाने के लिए प्रावधान की मांग की थी। इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खत लिखते हुए कहा था कि निकाह हलाला और बहुविवाह बेहद ही शर्मनाक और अमानवीय सामाजिक कुरीतियां हैं।

स्वाति मालीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे अपने पत्र में कहा था, सबसे पहले मैं आपको (नरेंद्र मोदी) तीन तलाक जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ कानून पास करवाने के प्रयासों के लिए बधाई देना चाहती हूं। एक सभ्य समाज में जहां महिला और पुरुष को हर पहलू में समान दर्जा हो, वहां इस प्रकार की कुरीतियों की कोई जगह नहीं है।

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