सुलह की आखिरी उम्मीद के साथ मुलायम को लेने एयरपोर्ट पहुंचे अखिलेश





लखनऊ। पहले चाचा—भतीजे और उसके बाद पिता—पुत्र के बीच बंटी समाजवादी पार्टी में सुलह के कई प्रयास असफल होने के बाद गुरूवार को मो0 आजम खां ने आखिरी उम्मीद के रूप में पिता—पुत्र और चाचा के बीच सुलह की कोशिशें तेज की हैं। सूत्रों की माने तो आजम खां ने मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव को दिल्ली से लखनऊ लाने को राजी कर लिया है। मुलायम और शिवपाल को एयरपोर्ट से लेने के लिए आजम खां के साथ स्वयं अखिलेश यादव गए हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि इसके बाद चारों लोगों के बीच एक बैठक रखी गई है।




सूत्रों की माने तो बहुत हद तक संभव है कि दो फाड़ों में बंट चुकी समाजवादी पार्टी में एक बीच के रास्ते को निकाला जा सकता है। मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव, अखिलेश यादव और आजम खां के बीच होने वाली बैठक में इस समय सबसे बड़ा मुद्दा पार्टी सिंबल को बचाने का होगा। जो यूपी के विधानसभा चुनावों में सपा के दोनों खेमों को है। आजम खां की कोशिश है कि पार्टी सबसे पहले अपने चुनाव चिह्रन को बचाए क्योंकि उसके बिना दोनों ही खेमे चुनाव के मैदान में खाली हाथ सिपाही की तरह होगे।




ऐसा कहा जा रहा है कि आजम खां चाहते हैं कि दोनों खेमों के बीच कम से कम इतनी सहमति बना ली जाए जिससे पार्टी अखिलेश यादव के नेतृत्व और पार्टी सिंबल के साथ चुनावी दंगल में उतर सके। जिसके लिए शिवपाल यादव से शांत रहने की अपील की जाएगी और मुलायम सिंह यादव को सह सम्मान दोबारा पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त कर अखिलेश यादव को कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद देकर​ स्थिति को सामान्य करने का प्रयास किया जाएगा।




आपको बता दें कि समाजवादी पार्टी इन दिनों दो गुटों में बंटी हुई है। एक ओर पार्टी के विधायकों, सांसदों और कार्यकर्ताओं के समर्थन के दम पर राष्ट्रीय अध्यक्ष बने सीएम अखिलेश यादव हैं तो दूसरी ओर पार्टी के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और उनके छोटे भाई शिवपाल यादव का गुट। दोनों ही गुटों ने दूसरे गुट को असंवैधानिक करार देते हुए निर्वाचन आयोग के सामने पार्टी के चुनाव चिन्ह साइकिल पर दावा ठोक दिया है। जिसके लिए निर्वाचन आयोग की ओर से दोनों गुटों को नोटिस देकर 9 जनवरी तक अपना पक्ष रखने को कहा है। बहुत हद तक संभव है कि अगर दोनों गुट अपने पर अड़े रहे तो आयोग पार्टी सिंबल को जब्त कर दोनों गुटों को अपने अपने सिंबल पर लड़ने को कहेगा। जिस स्थिति में दोनों गुटों के सामने सबसे बड़ी समस्या अपने समर्थकों को वैकल्पिक चुनाव चिन्ह के बारे में बताने की होगी।