विवादों भरा रहा डॉ. अनिल यादव का सफर

इलाहाबाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार यादव की नियुक्ति को अवैध करार कर रद कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि डॉ. अनिल कुमार यादव की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 14, 16 व 316 के प्रावधान की अनदेखी करके की गयी है। कहा कि जहां तक आयोग के अध्यक्ष द्वारा इस बीच अपने कार्यकाल के दौरान लिए गए फैसलों की सीबीआई से जांच की मांग का सवाल है, इस पर कोर्ट अलग से केस दायर होने पर विचार करेगी। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश डॉ. डी.वाई. चन्द्रचूड़ तथा न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की खण्डपीठ ने सतीश कुमार सिंह की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।

अदालत ने कहा है कि अध्यक्ष की नियुक्ति में संवैधानिक उपबंधों, पद की योग्यता, व्यक्ति की सत्यनिष्ठा, विश्वसनीयता को ध्यान में नहीं रखा गया। नियुक्ति के लिए पहुंचे 83 अभ्यर्थियों के आवेदन पर विचार एवं तुलनात्मक आंकलन न कर एक व्यक्ति का एक ही दिन में चयन व संस्तुति करने में राज्य सरकार ने अपने विवेक का प्रयोग नहीं किया। साथ ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित मानकों का उल्लंघन कर नियुक्ति कर ली गयी जबकि अन्य योग्य व्यक्ति उपलब्ध थे। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने 12 सितम्बर 84 के अपने ही शासनादेश का पालन नहीं किया जिसमें अध्यक्ष पद पर नियुक्ति व्यक्ति के चरित्र का सत्यापन उसके कार्यस्थल एवं जन्म-स्थान के जिले से उसके किये जाने की व्यवस्था की गयी है।

सरकार ने जिस विद्यालय में अनिल यादव प्राचार्य थे, मैनपुरी के जिलाधिकारी की रिपोर्ट पर नियुक्ति कर ली गयी। रिपोर्ट भी 31 मार्च को रविवार के दिन एक ही दिन में तैयार की गयी। लेखपाल ने अनिल यादव के हलफनामे के आधार पर रिपोर्ट दी कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक केस नहीं है जबकि जन्म स्थान आगरा के एसपी की बाद में आयी रिपोर्ट गुण्डा एक्ट, जानलेवा हमले जैसे अपराध दर्ज होने व बरी होने की रिपोर्ट दी गयी। इस पर नियुक्ति के समय विचार नहीं किया गया।

कोर्ट ने कहा कि नियुक्ति के समय व्यक्ति ही नहीं संवैधानिक पद की विश्वसनीयता को ध्यान में रखना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया में अनुच्छेद 14 एवं 16 का उल्लंघन किया गया। अनिल यादव का बायोडाटा 29 मार्च 13 को विशेष अधिकारी ने प्रमुख सचिव तत्पश्चात मुख्य सचिव एवं अंत में मुख्यमंत्री तक भेजा गया। जहां मुख्यमंत्री ने नियुक्ति की संस्तुति राज्यपाल को भेज दी। इसके बाद 31 मार्च 13 को मैनपुरी के जिलाधिकारी से तुरंत रिपोर्ट मांगी गयी। फाइल एसडीएम, तहसीलदार व लेखपाल तक गयी।

यादव ने हलफनामा दिया कि उनका चरित्र साफ है, लेखपाल की रिपोर्ट पर जिलाधिकारी ने उसी दिन अपनी रिपोर्ट सरकार को भेज दी। 2 अप्रैल 13 को अनिल यादव की नियुक्ति की अधिसूचना जारी कर दी गयी। कोर्ट ने कहा कि 31 मार्च को खाली होने वाले अध्यक्ष पद का कार्यभार सदस्य देख सकता था। ऐसी कोई अति आवश्यकता नहीं थी कि चंद दिन के भीतर मनमानी प्रक्रिया अपना अन्य नामों पर विचार किये बगैर नियुक्ति की जाती। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि अन्य नामों को मुख्यमंत्री के पास भेजा जाता तो बेहतर व्यक्ति का आकलन कर संस्तुति दी जा सकती थी किन्तु ऐसा नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि नियुक्ति मनमाने तौर पर उचित प्रक्रिया का पालन किये बगैर जल्दीबाजी में की गयी। कोर्ट ने अनिल यादव को अध्यक्ष पद धारण करने के अयोग्य माना और उनकी नियुक्ति को संविधान के विपरीत करार देते हुए रद्द कर दिया।

सरकार ने नहीं जारी किया बर्खास्तगी का आदेश-

हाईकोर्ट ने भले ही अनिल यादव की नियुक्ति को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया हो पर सरकार ने अभी उनकी बर्खास्तगी का आदेश जारी नहीं किया है। हाईकोर्ट के आदेश का परीक्षण कराने के बाद ही सरकार इस मामले में अगला कदम उठाएगी। माना जा रहा था कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद सरकार की ओर से भी अनिल यादव की बर्खास्तगी के आदेश जारी कर दिए जाएंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं। शासन के आला अधिकारियों का कहना है कि अभी हाईकोर्ट के फैसले की प्रति मिली नहीं है। न्यायालय के आदेश की प्रति मिलने के बाद उसका परीक्षण कराया जाएगा और फिर आगे की कार्यवाही के बारे में निर्णय किया जाएगा।

अनिल यादव को बचाने के लिए आपराधिक रिकॉर्ड से की गई छेड़छाड़

सूत्रों की माने तो उनका कहना है कि अनिल यादव को बचाने के लिए न्यू आगरा थाने में उनके आपराधिक रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की गई। पहले हिस्ट्रीशीटर रहे अनिल यादव के खिलाफ गुंडा एक्ट, बलवा और मारपीट में 17 मुकदमे दर्ज हुए थे, लेकिन रिकॉर्ड गड़बड़ मिला। कमला नगर निवासी यूपीपीएससी चेयरमैन अनिल यादव ने वर्ष 1988-89 में आगरा कॉलेज से बॉटनी में एमएससी की, इसके बाद आगरा विवि से पीएचडी की। कॉलेज के समय में अक्षय गौतम के साथ बलवा और मारपीट की। थाना न्यू आगरा में उनके खिलाफ 17 मुकदमे दर्ज हैं। हिस्ट्री शीट 15 (ए) खुलने के साथ गुंडा एक्ट की कार्रवाई की गई थी। यूपीपीएससी चेयरमैन की नियुक्ति को चुनौती देने के बाद थाना न्यू आगरा के रिकॉर्ड खंगाले गए, तो वर्ष 2005 में रजिस्टर नंबर चार और आठ से छेड़छाड़ करने का मामला सामने आया है।

अनिल यादव का विवादों से रहा नाता-

आयोग अध्यक्ष के रूप में अनिल यादव ने दो अप्रैल 2013 को कार्यभार संभाला था। तब से अब तक ढाई सौ से अधिक परीक्षाओं के परिणाम आयोग ने जारी किए हैं। खुद आयोग के अध्यक्ष की ओर से दिए गए हलफनामे में ही 238 परीक्षाओं का जिक्र है। इसके अलावा लगभग दो दर्जन प्रतियोगी परीक्षाएं हैं। इसी साल मई में घोषित कृषि अधीनस्थ सेवा वर्ग-3 की परीक्षा में तो आयोग पर और भी गंभीर आरोप है कि उसमें विज्ञापन में घोषित बैकवर्ड की सीटों संख्या परिणाम में कई गुना बढ़ा दी गई। अन्य कई परीक्षाओं में भी आरोप हैं।

यही नहीं, अनिल यादव के कार्यकाल में आयोग को दो परीक्षाओं के परिणाम भी बदलने पड़े। पीसीएस-2011 की प्री परीक्षा का परिणाम इसलिए बदलना पड़ा क्योंकि उसे पहले त्रिस्तरीय आरक्षण के तहत घोषित किया गया था। इसी तरह पीसीएसजे-2013 का परिणाम गलत सवालों की वजह से बदलना पड़ा। आयोग के इतिहास में शर्मनाक घटना के रूप में पहली बार पीसीएस का पेपर भी आउट हुआ। 29 मार्च, 2015 को लखनऊ में पेपर आउट हुआ था और आयोग को दोबारा परीक्षा करानी पड़ी। इसकी सीबीआइ जांच के लिए भी याचिका दाखिल हुई थी लेकिन अदालत ने नामंजूर कर दिया था। यादव के ढाई साल के कार्यकाल में हुई परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर तमाम सवाल खड़े हैं। उनके ऊपर परीक्षाओं में कुछ खास जिलों और एक जाति विशेष का पक्ष लेने के आरोप लगते रहे।

प्रतियोगियों ने लोक सेवा आयोग के गेट पर ‘यादव सेवा आयोग’ तक लिख भी दिया था। अभ्यर्थी यह आरोप लगाते रहे हैं कि आयोग में ओवरलैपिंग के जरिए सामान्य वर्ग की सीटों में आरक्षितों का चयन किया जा रहा है। इनका सच भी सामने आएगा। हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुरेश बहादुर सिंह और अनिल सिंह बिसेन कहते हैं कि अदालत ने युवाओं का विश्वास बहाल कर दिया है। प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति ने हाईकोर्ट से फैसला अपने पक्ष में आने के बाद सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल करने का फैसला किया है। समिति की ओर से अधिवक्ता सत्येंद्र त्रिपाठी ने कहा कि यदि सरकार या आयोग सुप्रीम कोर्ट जाता है तो प्रतियोगी भी अपना पक्ष रखेंगे।

अनिल यादव के मात्र ढाई वर्षों के कार्यकाल में उनके साथ तकरीबन दो दर्जन विवाद जुड़े और भर्ती से जुडे़ विभिन्न मामलों में 43 याचिकाएं दाखिल की गईं। शुरुआत से ही उनकी नियुक्ति पर लगातार सवाल उठते रहे। लगातार यह विवाद का विषय रहा कि उनकी नियुक्ति मानक के अनुसार नहीं हुई है। इससे पहले वह छह वर्षों तक आयोग में सदस्य भी रहे। खास वर्ग और क्षेत्र के लोगों को तवज्जो देने सहित उनकी कार्यशैली पर साक्षात्कार पैनल, पेपर सेटिंग, मूल्यांकन में भी खास वर्ग के लोगों को शामिल करने के आरोप लगे। इससे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ज्यादातर वरिष्ठ शिक्षकों ने आयोग के साक्षात्कार पैनल में शामिल होने तथा मूल्यांकन से मना कर दिया।

कई ने तो आयोग पर अच्छा व्यवहार नहीं किए जाने का भी आरोप लगाया है। उन पर अफसरों और कर्मचारियों के साथ तानाशाही रवैया अपनाने का भी आरोप लगा। कर्मचारियों को आयोग की भर्तियों में धांधली तथा अध्यक्ष के खिलाफ बोलना भी भारी पड़ा। चार कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा चुकी है। खास यह कि इसके खिलाफ यूनियन ने आवाज उठाई, धरना भी दिया लेकिन बाहर किसी की बोलने की हिम्मत नहीं हुई। सबकुछ आयोग परिसर के भीतर हुआ। डॉ.अनिल पर साक्षात्कार के लिए पहुंचे अभ्यर्थियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करने का भी आरोप है।