बुंदेलखंड के किसानों की कमर तोड़ रही अन्ना प्रथा

लखनऊ। उत्तर प्रदेश का सबसे बद्हाल क्षेत्र बुंदेलखंड का किसान सालोें से सूखे और फसलों की बर्बादी के कारण प्रदेश और देश की राजनीति के केन्द्र में रहा है। यहां के किसानों को कुदरत से ज्यादा कष्ट राजनेताओं ने दिए हैं जो हर बार इनके कष्टों को दूर करने के नाम पर इनके जख्मों को कुरेद कर हरा कर जाते हैं। इन दिनों इस क्षेत्र में किसानों के लिए एक बड़ी समस्या सालों से चली आ रही अन्ना प्रथा है। जो जो कर्ज में दबे किसानों की फसल पर आफत बनकर टूट रही है।




बुन्देलखंड में लगातार हो रहे पलायन के बीच आवारा मवेशियों की तादात में बड़ी बढ़ोत्तरी हुई है। जिनके झुंड लेकर कुछ घूमंतू चरवाहे एक गांव से दूसरे गांव घूमते हैं। जहां ये चरवाहे जानवरों के लिए चारागाह पाते हैं वहीं अपना ठिकाना बना लेते हैं। उसके बाद आगे बढ़ जाते हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान जाने के दौरान आवार जानवरों के झुंड रास्ते में आने वाली किसानों की फसलों को बड़ा नुकसाने पहुंचाते हैं।




किसानों के मुताबिक यह प्रथा बुंदेलखंड में काफी पुरानी है। जब कोई जानवर काफी समय तक दूध नहीं देता या बूढ़ा होने लगता है, तो उसे अन्ना प्रथा के तहत कुछ विशेष घूमंतू जाति के चरवाहे लोगों को दे दिया जाता था। ये लोग इन जानवरों दूसरे स्थानों पर चराने के लिए ले जाते हैं। उनसे जो बच्चे तैयार होते हैं या थोड़ा बहुत दूध पैदा होता है उससे ये चरवाहे अपना और अपने परिवारों रोटी का जुगाड़ करते आए हैं। अब यही प्रथा इनके लिए समस्या बन रही है।

एक किसान कल्लू का कहना है कि सूखे और चारे की कमी के चलते अन्ना प्रथा के तहत दिए जाने वाले जानवरों की संख्या तेजी से बढ़ी है। किसानों ने अपने जानवर चरवाहों को दे दिया है। बड़ी संख्या में पलायन कर गए लोग भी अपने मवेशी इनके हवाले कर गए हैं। अब इन चरवाहों के पास हजारों की संख्या में मवेशी हैं। जिन्हें लेकर ये चरवाहे चारे और पानी की तलाश में घूंमते रहते हैं। ज्यादा जानवर होने पर ये चरवाहे अपने जानवरों को नियंत्रित नहीं कर पाते और रास्ता चलते ये जानवर किसानों की फसलें उजाड़ देते हैं।




महोबा जिले के किसान बलराम बताते हैं कि अन्ना जानवरों ने पहले से कर्ज में दबे किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। सड़कों के किनारे के खेतों पर इन जानवरों का आतंक आए दिन देखने को मिलता है। सैकड़ों जानवरों के झुडं के रूप में चलने वाले ये जानवर ​कब किस खेत को उजाड़ दें पता नहीं। इस समस्या की जनकारी केन्द्र और राज्य सरकारों में मौजूद स्थानीय प्रतिनिधयों के माध्यम से पहुंचाई जा चुकी है। लेकिन अभी तक इसका कोई हल नहीं मिला है।