अरुणा ने 42 साल तक किया था इच्‍छामृत्‍यु का इंतजार, SC ने नहीं दी थी इजाजत

अरुणा ने 42 साल तक किया था इच्‍छामृत्‍यु का इंतजार, SC ने नहीं दी थी इजाजत
अरुणा ने 42 साल तक किया था इच्‍छामृत्‍यु का इंतजार, SC ने नहीं दी थी इजाजत
अरुणा शानबाग की कहानी दर्द की ऐसी दास्तां है, जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। एक ऐसी महिला जो 42 साल से मुर्दों जैसी जिंदगी बिता रही थी। आज भले ही अरुणा की मौत की खबर आई है, लेकिन मानसिक रुप से तो उसकी मौत 42 साल पहले ही हो गई थी। इच्छामृत्यु का मुद्दा 1980 के दशक में अरुणा शानबाग को अस्पताल से बाहर लाने की कोशिश भी हुई। मगर अस्पताल में अरुणा के सहकर्मियों ने इसका…

अरुणा शानबाग की कहानी दर्द की ऐसी दास्तां है, जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। एक ऐसी महिला जो 42 साल से मुर्दों जैसी जिंदगी बिता रही थी। आज भले ही अरुणा की मौत की खबर आई है, लेकिन मानसिक रुप से तो उसकी मौत 42 साल पहले ही हो गई थी।

इच्छामृत्यु का मुद्दा

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1980 के दशक में अरुणा शानबाग को अस्पताल से बाहर लाने की कोशिश भी हुई। मगर अस्पताल में अरुणा के सहकर्मियों ने इसका कड़ा विरोध किया। उनकी सहकर्मियों ने अरुणा को अस्पताल में ही रखे जाने को लेकर हड़ताल शुरू कर दी। उनकी ऐसी हालत को देखकर पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता पिंकी विरानी ने अदालत में अरुणा को इच्छा मृत्यु देने की याचिका दायर की।

24 जनवरी 2011 में अरुणा को इच्छामृत्यु देने की पिंकी विरानी की याचिका देश के इतिहास में अपनी तरह की पहली याचिका थी। सुप्रीम कोर्ट ने सात मार्च 2011 को यह याचिका खारिज कर दी। मगर फैसले के दौरान सर्वोच्च अदालत ने इस आशय के स्पष्ट संकेत दिए कि विशेष स्थितियों में इच्छामृत्यु की स्वीकृति दी जा सकती है। न्यायालय ने स्थायी कोमा की स्थिति में मरीजों को जीवनरक्षक प्रणाली से हटाकर परोक्ष इच्छामृत्यु (पैसिव यूथनेशिया) की अनुमति दे दी

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लेकिन जहरीला इंजेक्शन देकर जीवन खत्म करने के तरीके प्रत्यक्ष इच्छामृत्यु (एक्टिव यूथनेशिया) को खारिज कर दिया। अरुणा को दयामृत्यु देने से इनकार करते हुए न्यायालय ने कुछ कड़े दिशानिर्देश तय किए जिनके तहत हाई कोर्ट की निगरानी व्यवस्था के माध्यम से परोक्ष इच्छामृत्यु कानूनी रूप ले सकती है।

कैसे तबाह हुई अरुणा की जिंदगी

अस्पताल में नर्स अरुणा उसे मना किया करती थी। जिससे सोहनलाल की चिढ़ बढ़ने लगी और उसने अरुणा पर नजर रखना शुरू कर दिया। 42 साल पहले जब अरुणा 23 साल की थी, वो अपनी डयूटी खत्म कर कपड़े बदलने के लिए चेंजिंग रूम में पहुंची। सोहन वहां पहले से ही घात लगाकर बैठा था, उसने अरुणा को दबोच लिया, कुत्ते के गले की चेन ही करुणा के गले पर कस दी। इसके बाद अरुणा का यौन शोषण करने की कोशिश की। चेन के कसाब से अरुणा के दिमाग तक खून पहुंचाने वाली नसें फट गईं। उसकी आंखों की रोशनी चली गई, शरीर को लकवा मार गया, अरुणा बोल भी नहीं पा रही थी।

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आरोपी सोहनलाल को सजा

अरुणा को कोमा में पहुंचाने के आरोप में सोहन को कुछ दिन बाद ही पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। अदालत में मामला चला और सोहनलाल पर अरुणा की हत्या की कोशिश और कान की बाली लूटने का आरोप लगा। हैरानी की बात ये है कि उसपर बलात्कार की कोशिश का आरोप तक नहीं लगा, पुलिस ने ऐसी कोई धारा नहीं लगाई। फिर भी सोहनलाल को सात साल की सजा मिली, सजा काट कर वो रिहा हो गया। लेकिन अरुणा बेसुध रही।

सुप्रीम कोर्ट इच्छा मृत्यु की मांग ठुकराई

7 मार्च 2011 को लेखिका पिंकी विरानी द्वारा अरुणा के लिए की गई इच्छामृत्यु की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दिया था। पिंकी विरानी ने अरुणा की जीवनी भी लिखी है और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी कि अरुणा की स्थिति को देखते हुए उन्हें मरने की अनुमति दी जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने पिंकी विरानी की इस अपील को खारिज कर दिया है।

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बॉलीवुड भी शोक में डूबा

बॉलीवुड अभिनेता ऋषि कपूर, नेहा धूपिया, सतीश कौशिक और निर्देशक मधुर भंडारकर आदि ने भी ट्विटर के जरिए अरुणा को श्रद्धाजंलि दी। अभिनेत्री नेहा धूपिया ने लिखा- कितना दुखद है। अरुणा शानबाग को श्रद्धांजलि।

फिल्मकार मधुर भंडारकर ने लिखा- उन्हें दूसरी दुनिया में बेहतर जिंदगी मिले। सतीश कौशिक ने कहा- 42 साल! हे भगवान। कितना भयावह है। अरुणा को आखिरकार दुखों और दर्द से छुटकारा मिला।

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