पंजाब-गोवा के बाद गुजरात-हिमाचल जाने से केजरीवाल ने की तौबा

नई दिल्ली। ​आम आदमी पार्टी (AAP) के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अ​रविन्द केजरीवाल ने फैसला किया है कि अब वह अपना पूरा ध्यान दिल्ली की राजनीति पर ही केन्द्रित रखेंगे। पंजाब और गोवा के चुनावों के बाद दिल्ली एमसीडी चुनाव में फेल होने के बाद अरविन्द केजरीवाल ने गुजरात और हिमाचल में इस साल होने वाले चुनावों को लड़ने का विचार त्याग दिया है।

बताया जा रहा है कि पार्टी की पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी ने दिल्ली के बाहर किसी भी चुनाव को न लड़ने का प्रस्ताव रखा है। इस कमिटी के सदस्यों का मानना है कि पार्टी को दिल्ली पर पूरा ध्यान देकर नए और समर्पित कार्यकर्ता जोड़ने की जरूरत है। ​कमिटी के कुछ सदस्यों ने पंजाब और गोवा के चुनावों की मिसाल देते हुए कहा कि पंजाब में उम्मीद से बहुत कम केवल 20 सीटें ही पार्टी को मिलीं, जबकि गोवा में पार्टी अपना खाता तक नहीं खोल पाई। इन दोनों ही राज्यों में मिली हार से पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा है। अगर पार्टी यही गलती हिमाचल और गुजरात में दोहराती है तो पार्टी के पास दिल्ली में भी कुछ नहीं बचेगा। बेहतर होगा कि पार्टी अपना पूरा ध्यान दिल्ली की सरकार चलाने पर केन्द्रि​त करे।

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पार्टी के सूत्रों की माने तो आप के अंदर ऐसे कई नेता हैं जिनको अंदेशा है कि पार्टी दिल्ली में अपनी जमीन खो रही है। एमसीडी चुनावों में आप को मिली हार को एक सबक के रूप में लेने की बात कही गई है।

गुजरात में चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी में थे अरविन्द केजरीवाल —

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दिल्ली विधानसभा से पंजाब और गोवा के बाद गुजरात विजय का सपना देखने वाले अ​रविन्द केजरीवाल लंबे समय से वहां पार्टी कैडर को खड़ा करने की कोशिश में जुटे थे। उन्होंने हार्दिक पटेल के नेतृत्व में खड़े हुए पाटीदार आंदोलन को न सिर्फ अपना समर्थन दिया बल्कि उस दौरान गुजरात का दौरा कर जनसभाएं कर शक्ति प्रदर्शन भी किया।

देर आए दुरुस्त आए —

अरविन्द केजरीवाल की शैली को करीब से जानने वालों की माने तो उनके नेतृत्व वाली आप अपने स्वर्णिम दौर से गुजर चुकी है। पिछले दो सालों के भीतर पार्टी में जिस तरह के विवाद उठे और उठा पटक हुई वह पार्टी के समर्थकों का मनोबल गिराने वाली साबित हुई। एक आंदोलन से उठी पार्टी ने जिस तरह से दिल्ली की सत्ता प्राप्त की थी वह सराहनीय था, नई विचारधारा के साथ राजनीति में एंट्री लेने वाली इस पार्टी के सामने अपार संभावनाएं खड़ीं थी। जिन्हें पार्टी को सस्ते में मिली सफलता के घमंड ने ठोकर मार दी। पार्टी के जिम्मेदार पदाधिकारियों में सामंजस्य की कमी और अहम की भावना ने बड़ी हानि पहुंचाई। पार्टी दिल्ली में अपनी बनी बनाई जमीन और अंदरूनी कलह को नजरंदाज कर पंजाब जैसे बड़े राज्यों की सत्ता कब्जाने के लिए आतुर नजर आई।

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