आगरा। सात अजूबों में शामिल सबसे खूबसूरत इमारत ताज महल यूं तो दुनिया की नजर में मुगल बादशाह शाहजहां और उनकी बेगम मुमताज के प्रेम की निशानी है। जहां दोनों की कब्र आज भी उनके प्रेम की गवाही देती है। इस बीच ताज महल की वास्तविक पहचान को लेकर आगरा की जिला अदालत में सवाल खड़ा किया गया है। अदालत में पेश किए गए एक दावे में ताज महल के मंदिर होने की बात कही गई है। जिसे लेकर अदालत ने आर्किलॉजिकल सर्वे आॅफ इंडिया (ASI) से उसका पक्ष अदालत के सामने रखने को कहा था।

मिली जानकारी के मुताबिक एएसआई ने अदालत के समक्ष दाखिल किये अपने हलफनामे में स्पष्ट किया है कि उसके रिकार्ड के मुताबिक ताज महल एक मकबरा है। यह पहला मौका है जब एएसआई ने स्वीकार किया है कि ताज महल एक मकबरा है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर को होनी है।

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जवाब दाखिल करते हुए एएआई ने कहा कि दुनिया के सतवें अजूबे के रूप में पहचना रखने वाले ताज महल के मंदिर होने के साक्ष्य इतिहास में कहीं नहीं मिलते हैं। सरकारी रिकार्ड में ताज महल में किसी शिव लिंग के मौजूद होने की बात को भी पूरी तरह से नकारा गया है। एएसआई ने अपने हलफनामे में ब्रिटिश काल का जिक्र करते हुए कहा कि दस्तावेज बताते हैं कि 1920 में ताज महल को संरक्षित इमारत घोषित किया गया था। इसे एक संरक्षित धरोहर के रूप में ही देखना उचित होगा। एएसआई की ओर से पेश हुए वकील ने कहा कि ताज महल को मंदिर बताने वाली याचिका पूरी तरह से काल्पनिक तथ्यों पर आधारित है। अदालत को इसे निरस्त कर देना चाहिए।

वहीं दूसरी ओर ताज महल को भगवान शिव का मंदिर बताते हुए हिंदुओं को पूजा अर्चना करने की छूट दिए जाने की अपील करने वाले पक्ष का कहना है कि तेजो महालय यानी ताज महल के भीतर मौजूद कब्रों को वहां से ​हटाकर मुस्लिमों की इबादत पर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिए। ताज महल पर आगरेश्वर महादेव नागनाथेश्वर विराजमान का स्वामित्व है। इस मामले को दाखिल कर्ता वकील हरिशंकर जैन ने स्वयं को वादी का मित्र करार दिया है।

याचिका में कहा गया है कि तेजो महालय मंदिर महल का निर्माण 12वीं सदी में राजा परमार्दी देव ने करवाया था। जिसके बाद इस मंदिर की देखरेख का जिम्मा जयपुर के महाराज मान सिंह ने लिया और उनके बाद 17 वीं सदी में इसकी देखरेख राजा मान सिंह ने की। इसी दौर में शाहजहां ने तेजो महालय मंदिर महल को हथिया लिया और अपनी चहेती बेगम मुमताज—उल—जुमानी की मौत के बाद इसे मकबरा बना दिया। मन्दिर को मकबरा बनाने के लिए इमार​त के कुछ हिस्से में बदलाव कर इसे इस्लामिक पहचान दी गई।

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इसके साथ ही वादी पक्ष का कहना है कि एएसआई की ओर से पेश किए गए तथ्य गलत हैं। जिसका जवाब वह अदालत के समक्ष अगली सुनवाई में पेश करेंगे। उनके जवाब के आगे एएसआई के तथ्य कहीं नहीं ठहरेंगे।