अस्थमा की बीमारी से हैं परेशान तो इन चीजों का रखें खयाल

अस्थमा की बीमारी से हैं परेशान तो इन चीजों का रखें खयाल
अस्थमा की बीमारी से हैं परेशान तो इन चीजों का रखें खयाल

लखनऊ। मौसम में बदलाव की वजह से सांस संबंधी बीमारियां जैसे अस्थमा के मरीजों की संख्या में काफी बढ़ जाती है। अस्थमा की बीमारी में मरीज की सांस की नलियों की पेशियों में जकड़न-भरा संकोच पैदा होता है, तो मरीज को सांस लेने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यह एक ऐसी बीमारी है जिसमें समय पर रोग विशेषज्ञ के पास न ले जाएं तो समस्या काफी बढ़ जाती है।

Asthma Patient What You Need To Know :

ऐसे होती है शुरुआत

अस्थमा की शुरुआत एलर्जी से होती है। कुछ लोगों को मौसम बदलने पर एलर्जी होती है और कुछ को धूल आदि से और कुछ को तो पूरे साल एलर्जी रहती है। यही एलर्जी बाद में दमा के रूप में सामने आती है।

दमा के मुख्य लक्षण

बार-बार खांसी आना
छाती में घुटन या सांस फूलना आदि।
छाती में जोर से आवाज होना।
माता-पिता में से किसी को यह रोग है तो बच्चों को भी इसके होने की संभावना बनी रहती है।
अस्थमा, अनुवांशिक और पर्यावरण, दोनों के कारण हो सकता है।

ऐसे पता करें अस्थमा है या नहीं

अस्थमा का पता करने के लिए एक साधारण सा टेस्ट(स्पाइरोमैट्री) करना होता है।
टेस्ट से सांस की रुकावट का पता लगाकर अस्थमा की जानकारी मिलती है।
वहीं श्वास नलियों में सूजन कम करने की दवाएं भी उपलब्ध हैं, क्योंकि रोग यहीं से बढ़ता है।
कुछ मरीजों में पीक फ्लो व लंग्स फंक्शन टेस्ट भी किया जाता है।

अस्थमा का कारण

धूल के कणों से।
सिगरेट के धुएं व वायु प्रदूषण से।
ठंडी हवा या मौसमी बदलाव से।
पेंट की गंध, परफ्यूम या रूम फ्रेशनर से।
भावनात्मक मनोभाव (जैसे रोना या लगातार हंसना) और तनाव से।
गर्भावस्था में यदि महिला तंबाकू के धुएं के बीच में रहती है, तो उसके बच्चे को अस्थमा हो सकता है।

ये सावधानी बरतें

दवाएं नियमित रूप से लें।
सूखी सफाई यानी झाड़ू से घर की साफ-सफाई से बचें।
बेडशीट, सोफा, गद्दे आदि की भी नियमित सफाई करें, खासकर तकिया की क्योंकि इसमें काफी सारे एलर्जी वाले तत्व मौजूद होते हैं।
हफ्ते में एक बार चादर और तकिए के कवर बदल लें और दो महीने में पर्दे धो लें।
कॉकरोच, चूहे, फफूंद आदि को घर में जमा न होने दें।
मौसम के बदलाव के समय एहतियात बरतें।
बहुत ठंडे से बहुत गर्म में अचानक नहीं जाएं और न ही बहुत ठंडा या गर्म खाना खाएं।
धूल मिट्टी से दूर रहें। घर पर ही रहें।
पालतू जानवर से दूर रहे हैं। पा
डाक्टरी सलाह पर रोज व्यायाम करें।
अपना इन्हेलर अपने पास रखें।
डॉक्टर की सलाह लेने के बाद ही योग या एक्सरसाइज करना शुरू करें।

न खाए ये चीज़

अगर दमा के मरीज दूध और दूध से बने पदार्थों का सेवन करना बंद कर दें तो उनका आधा रोग तो अपने आप ठीक हो सकता है।
इसके अलावा केला, कटहल, पकाई हुई चुकंदर न लें।
मौसमी सेम या फलियां, लोबिया आदि भी नुकसानदायक हैं।

लखनऊ। मौसम में बदलाव की वजह से सांस संबंधी बीमारियां जैसे अस्थमा के मरीजों की संख्या में काफी बढ़ जाती है। अस्थमा की बीमारी में मरीज की सांस की नलियों की पेशियों में जकड़न-भरा संकोच पैदा होता है, तो मरीज को सांस लेने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यह एक ऐसी बीमारी है जिसमें समय पर रोग विशेषज्ञ के पास न ले जाएं तो समस्या काफी बढ़ जाती है। ऐसे होती है शुरुआत अस्थमा की शुरुआत एलर्जी से होती है। कुछ लोगों को मौसम बदलने पर एलर्जी होती है और कुछ को धूल आदि से और कुछ को तो पूरे साल एलर्जी रहती है। यही एलर्जी बाद में दमा के रूप में सामने आती है। दमा के मुख्य लक्षण बार-बार खांसी आना छाती में घुटन या सांस फूलना आदि। छाती में जोर से आवाज होना। माता-पिता में से किसी को यह रोग है तो बच्चों को भी इसके होने की संभावना बनी रहती है। अस्थमा, अनुवांशिक और पर्यावरण, दोनों के कारण हो सकता है। ऐसे पता करें अस्थमा है या नहीं अस्थमा का पता करने के लिए एक साधारण सा टेस्ट(स्पाइरोमैट्री) करना होता है। टेस्ट से सांस की रुकावट का पता लगाकर अस्थमा की जानकारी मिलती है। वहीं श्वास नलियों में सूजन कम करने की दवाएं भी उपलब्ध हैं, क्योंकि रोग यहीं से बढ़ता है। कुछ मरीजों में पीक फ्लो व लंग्स फंक्शन टेस्ट भी किया जाता है। अस्थमा का कारण धूल के कणों से। सिगरेट के धुएं व वायु प्रदूषण से। ठंडी हवा या मौसमी बदलाव से। पेंट की गंध, परफ्यूम या रूम फ्रेशनर से। भावनात्मक मनोभाव (जैसे रोना या लगातार हंसना) और तनाव से। गर्भावस्था में यदि महिला तंबाकू के धुएं के बीच में रहती है, तो उसके बच्चे को अस्थमा हो सकता है। ये सावधानी बरतें दवाएं नियमित रूप से लें। सूखी सफाई यानी झाड़ू से घर की साफ-सफाई से बचें। बेडशीट, सोफा, गद्दे आदि की भी नियमित सफाई करें, खासकर तकिया की क्योंकि इसमें काफी सारे एलर्जी वाले तत्व मौजूद होते हैं। हफ्ते में एक बार चादर और तकिए के कवर बदल लें और दो महीने में पर्दे धो लें। कॉकरोच, चूहे, फफूंद आदि को घर में जमा न होने दें। मौसम के बदलाव के समय एहतियात बरतें। बहुत ठंडे से बहुत गर्म में अचानक नहीं जाएं और न ही बहुत ठंडा या गर्म खाना खाएं। धूल मिट्टी से दूर रहें। घर पर ही रहें। पालतू जानवर से दूर रहे हैं। पा डाक्टरी सलाह पर रोज व्यायाम करें। अपना इन्हेलर अपने पास रखें। डॉक्टर की सलाह लेने के बाद ही योग या एक्सरसाइज करना शुरू करें। न खाए ये चीज़ अगर दमा के मरीज दूध और दूध से बने पदार्थों का सेवन करना बंद कर दें तो उनका आधा रोग तो अपने आप ठीक हो सकता है। इसके अलावा केला, कटहल, पकाई हुई चुकंदर न लें। मौसमी सेम या फलियां, लोबिया आदि भी नुकसानदायक हैं।