‘कदम मिलाकर चलना होगा…’, पढ़ें अटल जी की जोश भर देने वाली कवितायें

‘कदम मिलाकर चलना होगा,पढ़ें अटल जी की जोश भर देने वाली कवितायें
‘कदम मिलाकर चलना होगा...’, पढ़ें अटल जी की जोश भर देने वाली कवितायें

Atal Bihari Vajpayee Poems

नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी वर्ष 1999 से लेकर 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। लंबे समय से बीमार अटल जी की हालत बेहद नाजुक बताई जा रही है। बात करें इनके जीवन की तो इन्हे एक राजनेता के तौर पर जितना सराहा गया हैं, उतना ही प्यार उनकी कविताओं को दिया गया है।

अटल जी ने अपने जीवन में कई कविताएं लिखीं और समय-समय पर उन्हें संसद और दूसरे मंचों पर अपनी कविताओं को पढ़ा भी है। देखिये उनकी पहली कविता से लेकर कुछ जोश भर देने वाली कवितायें…….

कदम मिलाकर चलना होगा,
बाधाएं आती हैं आएं।
घिरें प्रलय की घोर घटाएं,
पावों के नीचे अंगारे॥
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,
निज हाथों में हंसते-हंसते।
आग लगाकर जलना होगा,
कदम मिलाकर चलना होगा॥
हास्य-रूदन में, तूफानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में।
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में॥
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा,
उजियारे में, अंधकार में॥
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में।
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक॥
अरमानों को ढलना होगा,
कदम मिलाकर चलना होगा।
सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब॥
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ।
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढलना होगा॥
कदम मिलाकर चलना होगा,
कुछ कांटों से सज्जित जीवन।
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन॥
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में।
जलना होगा, गलना होगा,
क़दम मिलाकर चलना होगा॥

अटली जी की पहली कविता

‘यह ताजमहल, यह ताजमहल
यमुना की रोती धार विकल
कल कल चल चल
जब रोया हिंदुस्तान सकल
तब बन पाया ताजमहल
यह ताजमहल, यह ताजमहल..!!’

एक बरस बीत गया
झुलासाता जेठ मास
शरद चांदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया
सीकचों मे सिमटा जग
किंतु विकल प्राण विहग
धरती से अम्बर तक
गूंज मुक्ति गीत गया
एक बरस बीत गया
पथ निहारते नयन
गिनते दिन पल छिन
लौट कभी आएगा
मन का जो मीत गया
एक बरस बीत गया

दूध में दरार पड़ गई
खून क्यों सफेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया।
बंट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।
खेतों में बारूदी गंध,
टूट गये नानक के छंद
सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है।
वसंत से बहार झड़ गई
दूध में दरार पड़ गई।
अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता।
बात बनाएं, बिगड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।

नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी वर्ष 1999 से लेकर 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। लंबे समय से बीमार अटल जी की हालत बेहद नाजुक बताई जा रही है। बात करें इनके जीवन की तो इन्हे एक राजनेता के तौर पर जितना सराहा गया हैं, उतना ही प्यार उनकी कविताओं को दिया गया है। अटल जी ने अपने जीवन में कई कविताएं लिखीं और समय-समय पर उन्हें संसद और दूसरे मंचों पर अपनी कविताओं को पढ़ा…