मिशन 2017 के लिए अयोध्या बनी सियासी राजधानी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सियासत का जिक्र हो और राम मन्दिर का नाम न आए ऐसा संभव नहीं है। इस सूबे में पिछले तीन दशकों की चुनावी राजनीति में राम मन्दिर एक ऐसा मुद्दा रहा है जिसने कई बार सरकारें बनाई और गिराईं हैं। धीरे—धीरे राम मन्दिर भगवा राजनीति या दूसरे शब्दों में कहें कट्टर हिन्दूवादी राजनीति का मुद्दा भर बनकर रह गया। जिसे उछाल कर भगवा राजनीति करने वाले अपनी जरूरत के हिसाब से उछालते और शांत करते रहे। पिछले एक दशक में यह मुद्दा उतना ज्वलंत नहीं रहा जितना 90 के दशक में हुआ करता था। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों में यूपी की राजनीति में भगवा राजनीति ने जिस तरह की वापसी की उससे तमाम सेकुलर दलों को अपना अस्तित्व तक खतरे में नजर आने लगा। जिसका परिणाम है कि 2017 के विधानसभा चुनावों को लेकर शुरू हुई राजनीति में राम मन्दिर और अयोध्या एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरते नजर आ रहे हैं। एक ओर बाबरी विध्वंस कांड के समय कारसेवकों पर गोली चलावाने के आरोपों का सामना करते आए पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के उत्तराधिकारी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हैं जो अयोध्या में राम जन्मभूमि म्यूजियम बनाने जा रहे हैं, तो दूसरी ओर भगवा राजनीति और राम मन्दिर के मुद्दे को भुनाने के आरोप झेलती आई केन्द्र में बैठी बीजेपी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार है जो अयोध्या में रामायण सर्किट तैयार करवाने का दंभ भर रही है।




जानकारों की माने तो 2014 में उत्तर भारत की राजनीति में बीजेपी ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व के दम पर जो पैठ बनाई, उसे लेकर विरोधी दलों में एक छटपटाहट का माहौल है। सेकुलरिज्म की सियासत करने वाले तमाम दलों को अंदाजा नहीं था कि भगवा राजनीति और नरेन्द्र मोदी की छवि बीजेपी उनकी जागीर बन चुके सूबों को उनसे ही छीन लेगी। इस बात में कोई दोराय नहीं एक दशक से कमजोर नेतृत्व के कारण भगवा राजनीति की सबसे बड़ी खिलाड़ी बीजेपी को जातिगत और सेकुलर राजनीति करने वाले क्षेत्रीय दल हराते चले आ रहे थे, जबकि सेकुलरिजम की सबसे बड़ी झंडावरदार कांग्रेस इन्ही क्षेत्रीय दलों को सेकुलरिजम के झंडे के नीचे लाकर केन्द्र की सत्ता में अपने सियासी रूसूख को कायम किए हुए थी। बीजेपी ने नरेन्द्र मोदी के दमदार नेतृत्व के चलते सेकुलरिजम के समीकरण को न केवल ध्वस्त कर दिया बल्कि एक ​ऐसा नया समीकरण तैयार कर दिया, जिसका तोड़ निकालना सेकुलर दलों के लिए मुश्किल हो रहा है। बिहार जैसे राज्य में भले ही दो धुरविरोधी दल राजद और जदयू ने एक होकर बीजेपी को सियासी अंकगणित में हरा दिया हो लेकिन वर्तमान समय में यह गठबंधन सवालों में घिरा हुआ है।




अब देशभर की सियासत को अपने इर्द गिर्द घुमाने वाले यूपी में 2017 विस चुनावों की तैयारी शुरू हो गई है। जहां पिछले डेढ़ दशक से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच में सत्ता का हस्तांतरण होता आया है। ये दोनों ही पार्टियां सेकुलर और जातिगत राजनीति विचारधारा से प्रभावित हैं। दोनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में बीजेपी ही है। क्योंकि विधानसभा में नंबर तीन की हैसियत रखने वाली इस पार्टी ने लोकसभा चुनावों में अपने प्रदर्शन से विरोधियों की चिन्ता बढ़ा रखी है।

यही वजह है कि अब विरोधी बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाने की सोच के साथ अब राम के नाम का सहारा लेने को मजबूर हैं। कभी मंदिर जाने वालों को लड़कियां छेड़ने वाला करार दे चुके कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी शायद इसी सोच के साथ अयोध्या के हनुमान मंदिर और मन्दिरों के महन्तों से मिलकर अशीर्वाद लेते नजर आए। जिसके बाद यूपी के सीएम अखिलेश यादव को अयोध्या की सुध आई और उन्होंने आनन फानन में एक माह के भीतर अयोध्या में भगवान राम के नाम पर दो बड़ी सरकारी योजनाओं की घोषणा कर महंतों से यूपी विजय का आशीर्वाद ले लिया। जिसके बाद राम मंदिर को सियासी मुद्दा ना बनाने की हामी भरने वाली और राम नाम का सियासी कॉपीराइट रखने वाली बीजेपी ने केन्द्रीय पर्यटन मंत्रालय द्वारा घोषित रामायण सर्किट के काम को तेज कर दिया है। 250 करोड़ लगात से तैयार होने वाले रामायण सर्किट को केन्द्र सरकार अपनी एक बड़ी योजना के रूप में पेश कर रही है।




विधानसभा चुनावों को लेकर जब सारे सियासी दल एक एक कर राम की शरण में जाते नजर आ रहे हैं। सवाल ये है कि दशकों तक जिस राम नाम की सियासत को सांप्रदायिकता की राजनीति कह कर कोसा जाता रहा उसी सियासत को अब सेक्युलर कैसे बनाया जाएगा। यह देखना बहुत ही रूचिकर होगा कि यूपी के मिशन 2017 में राम किसके होंगे और राम भक्तों का वोट किसे मिलेगा।