दो आस्थाओं के साथ शुरू हुई ‘गोवर्धन’ पूजा

बांदा: उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड़ में हर तीज-त्योहार मनाने के अपने अलग-अलग तौर तरीके हैं, आप ‘गोवर्धन’ पूजा को ही ले लीजिए। हिंदू धर्मावलंबी यहां दो अलग-अलग आस्थाओं के साथ ग्यारह दिवसीय गोवर्धन पूजा करेंगे।




उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड़ में तीज-त्योहार मनाने की अलग-अलग परंपराएं प्रचलित हैं। यहां लोग गोवर्धन पूजा भी दो आस्थाओं के साथ करते हैं। गांवों में हिंदू धर्मावलंबी दीपावली के दिन गाय के गोबर का पहाड़ बनाकर घर के प्रथम द्वार में ‘गोधन दाई’ (गोवर्धन पर्वत) की स्थापना कर ग्यारह दिन तक सुबह-शाम पूजा-अर्चना करेंगे।

इस दौरान कोई भी व्यक्ति अपने पालतू मवेशी का गोबर पड़ोसी को नहीं देंगे। सबसे खास बात यह है कि गोवर्धन की पूजा महिलाएं ही करती हैं और दीपक जलाकर मिट्टी के बर्तन (दिये) में रोजाना बासी भोजन परोस कर गोधन दाई के खाने के लिए रखती हैं।




यदुवंशियों का मानना है कि भगवान इन्द्र गोकुलवासियों से नाराज होकर वहां अंधाधुंध बारिश करवाई थी और श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पहाड़ उंगली में उठाकर यदुवंशिंयों की रक्षा की थी। जबकि इसके विपरीत किसानों का मानना है कि ‘गोबर’ उनका पहला ‘धन’ है, इसलिए वह ‘गोबर-धन’ की पूजा करते हैं। पूजा के अंतिम दिन महिलाएं इस गोवर्धन पहाड़ के प्रतीक का गोबर अपने खेतों में डाल कर अच्छी फसल पैदा होने की प्रार्थना करती हैं।

धार्मिक अनुष्ठान कराने में परंगत बलराम दास महाराज बताते हैं कि ‘यह बहुत पुरानी परंपरा है, दो अलग-अलग आस्थाओं के साथ यदुवंशी और किसान गोवर्धन पूजा करते हैं।’ वह बताते हैं कि ‘दीपावली को कोई भी किसान अपने खेतों से मवेशी नहीं हांकते, चाहे खड़ी फसल जितनी चट हो जाए।’

बांदा से आर. जयन की रिपोर्ट

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