नोटबंदीः गरीब ‘क्याजा’ से खरीद रहे रोजमर्रा का सामान

बांदा। बड़े नोटो का प्रचलन बंद होने से ग्रामीण क्षेत्र के गरीब खासे परेशान है, घर में धरी रही गाढ़ी कमाई बैंको में जमा करने के बाद अब बैंकों में कैश उपलब्ध न होने पर धन निकासी नहीं हो पा रही। गांव-देहात में लोग रोजमर्रा की चीजे खरीदने के लिए ‘क्याजा’ का सहारा ले रहे हैं।

सबसे पहले बता दें कि ‘क्याजा’ क्या है? बुंदेलखंड़ के गांव-देहात में धनाभाव के चलते दुकानदारों के यहां फसली अनाज बेंच साग-सब्जी और नमक-तेल खरीद कर बसर करने की पुरानी परंपरा रही है। यहां बेंचे जाने वाले अनाज को ही देहाती भाषा में ‘क्याजा’ कहते है। केन्द्र सरकार द्वारा बड़े नोटों का प्रचलन बंद करने से ग्रामीण अंचल की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। लोगों के घरों में जो भी गाढ़ी कमाई थी, वह बैंकों में जमा हो चुकी है और ग्रामीण अंचल की बैंक शाखाओं में अब तक कैश न पहुंच पाने से लोग घर-गृहस्थी चलाने के लिए नोट के विकल्प के तौर पर ‘क्याजा’ को चुना है। दैनिक उपयोग का सामान छोटे दुकानदारों के यहां अनाज बेंच कर खरीद रहे हैं।



बांदा जिले के तेन्दुरा गांव में इलाहाबाद बैंक की शाखा है, गांव के छोटे-बड़े किसान और मजदूर एक हजार और पांच सौ की नोट का प्रचलन बंद होने के बाद इस शाखा में जमा कर चुके हैं। गांव में तकरीबन सभी के हालात एक जैसे हैं। घर चलाने के लिए एक पाई नहीं बची। किसान खाद-बीज के लिए तरस रहा है तो मजदूर वर्ग साग-भाजी, नमक-तेल के जुगाड़ में परेशान है। गांव की बुजुर्ग महिला फुलिया ने बताया कि ‘उसके घर में रोज क्याजा से ही सामान खरीदा जा रहा है।’ उसने बताया कि ‘इस समय धान की फसल आ गई है, वह दुकानदार नत्थू राजा से शाम-सबेरे सौदा खरीद कर चूल्हा जलाती है।’

फुलिया के अलावा तकरीबन सभी लोग अपना घर चलाने के लिए क्याजा का सहारा ले रहे हैं। गांव के बड़े किसान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सगे साढू रामलगन सिंह गहरवार ने बताया कि ‘उनके घर में जो भी बड़े नोट थे, सभी बैंक में जमा हो चुके हैं। गांव की बैंक शाखा में कैश न होने से जहां खाद-बीज नहीं खरीद पा रहे, वहीं उनकी पत्नी मीना सिंह पड़ोस की दुकान में अनाज बेंच कर रोजमर्रा का सामान खरीद कर घर खर्च पूरा कर रही है।’





विकलांग बंधना रैदास ने बताया कि ‘बैंक से उसके विकलांग पेंशन की निकासी नहीं हो पा रही, कोटेदार राशन सामाग्री की कीमत उसी अनाज की कटौती कर वसूल कर लेता है। जो थोड़ा बहुत बचा, वह क्याजा में दुकानदारों के यहां चला जाता है।’ इसी गांव के दुकानदार रमेश सिंह ने बताया कि ‘उसकी दुकान में रोजाना ‘क्याजा’ 20 से 25 किलोग्राम धान आ जाता है, क्याजा में मिले धान को बाजार में बेंच कर उसके बदले परचून का सामान लाते हैं। कुल मिलकर यह कहा जा सकता है कि नोटबंदी से उपजे आर्थिक संकट से उबरने के लिए ‘क्याजा’ बड़ा विकल्प बन चुका है, जिसके जरिए लोग अपनी आवश्यकताएं पूरी कर रहे हैं।

बाँदा से आर जयन की रिपोर्ट