दिन की शुरुआत से पहले इन मंत्रों का करें जाप, जानिए नित्य क्रिया की विधि

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Best Mantras For Every Day For Daily Use Read What Is Its Benefits

प्रत्येक मंत्र साधक को अपने जीवन-यापन में ही नहीं, अपितु दैनिक दिनचर्या में भी कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना बहुत आवश्यक होता है। वैसे भी जो व्यक्ति जिस मार्ग का अनुसरण करता है, उसे उस मार्ग में सफलतापूर्वक चलकर लक्ष्य तक पहुंचने के सभी नियमों को जान लेना तथा उनका पूरी तरह से पालन करना चाहिए। साधक को सफलता प्राप्त करने के लिए स्नान-संध्याशील होना अत्यावश्यक है।

प्रातः कृत्य- सूर्योदय से प्रायः दो घण्टे पूर्व ब्रह्म – मुहूर्त्त होता है । इस समय सोना (निद्रालीन होना) सर्वथा निषिद्ध है । इस कारण ब्रह्म – मुहूर्त्त में उठकर निम्न मंत्र को बोलते हुए अपने हाथों (हथेलियों) को देखना चाहिए।

कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते कर-दर्शनम्॥

हाथों के अग्रभाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती और मूल में ब्रह्मा स्थित हैं (ऐसा शास्त्रों में कहा गया है)। इसलिए प्रातः उठते ही हाथों का दर्शन करना चाहिए। उसके पश्चात् नीचे लिखी प्रार्थना को बोलकर भूमि पर पैर रखें।

समुद्रवसने देवी ! पर्वतस्तनमण्डले।
विष्णुपत्नि ! नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व मे॥

हे विष्णु पत्नी ! हे समुद्ररुपी वस्त्रों को धारण करने वाली तथा पर्वतरुप स्तनों से युक्त पृथ्वी देवी ! तुम्हें नमस्कार है , तुम मेरे पादस्पर्श को क्षमा करो। इस कृत्य के पश्चात् मुख को धोएं, कुल्ला करें और फिर प्रातः स्मरण तथा भजन आदि करके श्री गणेश, लक्ष्मी, सूर्य, तुलसी, गाय, गुरु, माता, पिता , इष्टदेव एवं (घर के) वृद्धों को सादर प्रणाम करें।

प्रातः स्मरण

उमा उषा च वैदेही रमा गंगेति पंचकम्।
प्रातरेव स्मरेन्नित्यं सौभाग्यं वर्द्धते सदा॥
सर्वमंगल मांगल्ये ! शिवे ! सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये ! त्र्यंबक ! गौरि नारायणि ! नमोऽस्तुते ॥
हे जिह्वेरससराज्ञे ! सर्वदा मधुरप्रिये !।
नारायणाख्यपीयूषं पिब जिह्वे ! निरंतरम्॥

शौच -विधि

यज्ञोपवीत को कंठी कर दाएं कर्ण में लपेटकर वस्त्र या आधी धोती से सिर ढांप लें। वस्त्राभाव में जनेऊ को सिर के ऊपर से लेकर बाएं कर्ण से पीछे करें। जल के पात्र को बाएं रख, दिन में उत्तर तथा रात्रि में दक्षिण की ओर मुख कर निम्नलिखित मंत्र बोलकर एवं मौनता बनाए रखकर मल-मूत्र का त्याग करें।

गच्छंतु ऋषयो देवाः पिशाचा ये च गुह्यकाः।
पितृभूतगणाः सर्वे करिष्ये मलमोचनम्॥

पात्र से जल लें , बाएं हाथ से गुदा धोकर लिंग में एक बार , गुदा में तीन बार मिट्टी लगाकर जल से शुद्ध करें। बाएं हाथ को अलग रखते हुए दाएं हाथ से लांग टांगकर उसी हाथ में पात्र लें । मिट्टी के तीन हिस्से करें। पहले से बायां हाथ दस बार , दूसरे ( हिस्से ) से दोनों हाथ सात बार और तीसरे से पात्र को तीन बार शुद्ध करें।

उसी पात्र से बारह से सोलह बार कुल्ले करें। अब दोनों पैरों को ( पहले बायां और फिर दायां ) तीन – तीन बार धोकर बची हुई मिट्टी धो दें। सूर्योदय से पूर्व एवं पश्चात् उत्तर की ओर मुख कर बारह बार कुल्ला करें।

दिन से रात्रि में आधी, यात्रा में चौथाई तथा आतुरकाल में यथाशक्ति शुद्धि करनी आवश्यक है। मल – त्याग के पश्चात् बारह बार, मूत्र – त्याग के बाद चार बार तथा भोजनोपरांत सोलह बार कुल्ला करें।

दंतधावन – विधि

मुखशुद्धि किए बिना कोई भी मंत्र कभी फलदायक नहीं होता। अतः सूर्योदय से पहले और बाद में उत्तर अथवा दोनों समय पूर्वोत्तर कोण ( ईशान ) में मुंह करके दतुअन करें । मध्यमा , अनामिका अथवा अंगुष्ठ से दांत साफ करें । तर्जनी उंगली का कभी प्रयोग न करें । तत्पश्चात् प्रार्थना करें –

आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च। ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्वन्नो देहि वनस्पते॥

दुग्धवाले वृक्ष का बारह अंगुल का दतुअन (दातौन) धोकर उपर्युक्त प्रार्थना करें। फिर दतुअन को चीरकर जीभी करें और धोकर बायीं ओर फेंक दें।

स्नान विधि

मानव – शरीर में नौ छिद्र प्रमुख होते हैं। रात्रि में शयन करने से वे अपवित्र हो जाते हैं । अतः प्रातः स्नान अवश्य करना चाहिए । गंगा आदि नदी में कभी दतुअन नहीं करना चाहिए। स्नानोपरांत गंगा आदि जलाशय में भीगे वस्त्र बदलने अथवा निचोड़ने नहीं चाहिए। निम्नलिखित मंत्र से वरुण की प्रार्थना करें –

अपामधिपतिस्त्वं च तीर्थेषु वसतिस्तव ।
वरुणाय नमस्तुभ्यं स्नानानुज्ञां प्रयच्छ मे ॥

पवित्र होकर एवं स्नानार्थ संकल्प करके निम्नलिखित मंत्र से मृत्तिका लगाएं। कटि (कमर)के नीचे , दाहिने हाथ तथा मंत्र से न लगाएं।

अश्वक्रांते रथक्रांते ! विष्णुक्रांते ! वसुंधरे ! ।
मृत्तिके ! हर मे पापं यन्मया दुष्कृतां कृतम् ॥

तीर्थावाहन – पुष्कराद्यानि तीर्थानि गंगाद्या सरितस्तथा ।
आगच्छन्तु पवित्राणि स्नानकालं सदा मम् ॥

भागीरथी की प्रार्थना – विष्णुपादाब्ज संभूते ! गंगे ! त्रिपथगामिनी ।
धर्मद्रवेति विख्याते ! पापं मे हर जाह्नवि ॥

नाभि तक जल में उतरकर सूर्य की ओर मुख करके (जल के ऊपर ब्रह्महत्या रहती है , इसलिए) जल हिलाकर एवं तीन गोते लगाकर स्नान करें। अच्छी तरह स्नान कर लेने पर निम्न मंत्र से जल के बाहर एक अंजलि दें।

यन्मया दूषितं तोयं मलैः शरीरसंभवेः ।
तस्य पापस्य शुद्धयर्थं यक्ष्माणं तर्पमाम्यहम् ॥

यदि घर में स्नान करें तो पूर्वाभिमुख हो पात्र से जल लेकर वरुण और गंगा आदि तीर्थो का आवाहन कर पांव तथा मुख धोकर स्नान करें । असमर्थ अवस्था में निम्न क्रिया करने से भी स्नान का फल होता ( मिलता ) है ।
मणिबंध , हाथ तथा घुटनों तक पैर धोकर एवं पवित्र होकर दोनों घुटनो के भीतर हाथ करके आचमन करने से स्नान के समान फल होता है ।

प्रत्येक मंत्र साधक को अपने जीवन-यापन में ही नहीं, अपितु दैनिक दिनचर्या में भी कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना बहुत आवश्यक होता है। वैसे भी जो व्यक्ति जिस मार्ग का अनुसरण करता है, उसे उस मार्ग में सफलतापूर्वक चलकर लक्ष्य तक पहुंचने के सभी नियमों को जान लेना तथा उनका पूरी तरह से पालन करना चाहिए। साधक को सफलता प्राप्त करने के लिए स्नान-संध्याशील होना अत्यावश्यक है। प्रातः कृत्य- सूर्योदय से प्रायः दो घण्टे पूर्व ब्रह्म – मुहूर्त्त होता…