बुंदेलखंड के पान किसान की कमर तोड़ रही नोटबंदी

महोबा। दशकों से प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहे बुंदेलखंड के महोबा जनपद की एक पहचान वहां के खेतों में पैदा होने वाले देशावरी पान के पत्तों से भी जुड़ी रही है। यहां से देशभर में प्रतिदिन पान पहुंचता है। जिससे महोबा के पान कारोबारी प्रतिदिन 20 लाख रूपए का कारोबार करते थे, लेकिन 8 नवंबर से लागू हुई नोटबंदी के बाद यह कारोबार घटकर आधा रह गया है। धंधा मंदा होने के साथ—साथ नगदी की कमी से पैदा हुई उधारी ने किसानों की कमर तोड़कर रख दी है।




पान किसान ओम प्रकाश चौरसिया बताते हैं कि डेढ़ दशक पहले तक केवल महोबा में 400 एकड़ जमीन पर पान की खेती होती थी। कुदरत नाराज हुई तो यह खेती सिमट कर 70 एकड़ तक सीमित रह गई। जैसे तैसे पान किसान अपनी गुजर बसर कर रहा था, लेकिन नोटबंदी ने किसान की कमर तोड़कर रख दी है। किसान रोज पान लेकर बाजार में पहुंचता है, लेकिन खरीददार नहीं है। जो व्यापारी पान खरीद भी रहे हैं, वो पहले से आधी कीमत दे रहे है और उधारी की शर्त अलग से रख रहे हैं। मजबूरी में उनके जैसे कई किसान उधारी पर अपनी फसल बेंचने को मजबूर हैं।




वहीं एक दूसरे किसान का कहना है कि पान की खेती बेहद नाजुक होती है। किसान दिन रात एक कर पान की खेती करने का जोखिम उठाता है। उसके बाद लागत और मजदूरी अलग से लगती है। जब से सरकार ने 500 और 1000 रुपए के नोट पर रोक लगाई है तब से मजदूरी निकालना मुशकिल हो गया है। जो माल पहले हाथों हाथ बिक जाता था उसे बेंचने में मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है। व्यापारी के पास नगदी नहीं है, इसलिए वह माल उधार में खरीद रहा है। किसान के पास तो माल रोज तैयार हो रहा है, जिसे बेचेगा नहीं तो मजदूरी तक डूब जाएगी।




महोबा की पान मंडी में छोटा मोटा धंधा कर अपने परिवार की रोजी रोटी चलाने वाले लाला का कहना है कि कुदरत की मार ने पहले ही देशावरी पान का धंधा चौपट कर डाला है। जो किसान बचे भी है वे इस नोटबंदी में खत्म हो जाएंगे। बाजार में सन्नाटा है, किसी के पास रोकड़ ही नहीं है जो किसान को देकर माल खरीद सके। बाहर का मंडी में तो खरीददारों की हालत और खराब है। वह जिन व्यापारियों को माल भेजते हैं उनके पास भी नगदी नहीं है। सारा धंधा नगद पर ही चलता है। नगद पर होने वाला धंधा तो रुपए में 20 पैसे भर बचा है।