भैया दूज: भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक

नई दिल्ली: दीपावली के साथ ही भाई-बहन के पावन प्रेम की प्रतीक भाई द्वितीया का अपना विशेष महत्व है। भारतीय बहनें इस पर्व पर भाई की मंगल कामना कर अपने को धन्य मानती हैं। भैयादूज हिन्दू समाज में भाई-बहन के पवित्र रिश्तों का प्रतीक है| यह पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है| इस बार यह पर्व 1 नवम्बर दिन मंगलवार को मनाया जायेगा| भाई-बहन के पवित्र रिश्तों के प्रतीक के पर्व को हिन्दू समुदाय के सभी वर्ग के लोग हर्ष उल्लास से मनाते हैं| इस पर्व पर जहां बहनें अपने भाई की दीर्घायु व सुख समृद्धि की कामना करती हैं तो वहीं भाई भी सगुन के रूप में अपनी बहन को उपहार स्वरूप कुछ भेंट देने से नहीं चूकते| इस पर्व पर बहनें प्राय: गोबर से मांडना बनाती हैं, उसमें चावल और हल्दी के चित्र बनाती हैं तथा सुपारी फल, पान, रोली, धूप, मिष्ठान आदि रखती हैं, दीप जलाती हैं। इस दिन यम द्वितीया की कथा भी सुनी जाती है|




भैयादूज की प्रथम कथा-

भविष्य पुराण में उल्लेखित यह द्वितीया की कथा सर्वमान्य एवं महत्वपूर्ण है, इसके अनुसार सूर्य की पत्नी संज्ञा की दो संतानें थीं। उनमें पुत्र का नाम यमराज और पुत्री का नाम यमुना था। संज्ञा अपने पति सूर्य की उद्दीप्त किरणों को सहन नहीं कर सकने के कारण उत्तरी ध्रुव में छाया बनकर रहने लगी। इसी से ताप्ती नदी तथा शनिश्चर का जन्म हुआ। इसी छाया से सदा युवा रहने वाले अश्विनी कुमारों का भी जन्म हुआ है, जो देवताओं के वैद्य माने जाते हैं। उत्तरी ध्रुव में बसने के बाद संज्ञा (छाया) का यम तथा यमुना के साथ व्यवहार में अंतर आ गया। इससे व्यथित होकर यम ने अपनी नगरी यमपुरी बसाई। यमुना अपने भाई यम को यमपुरी में पापियों को दंड देते देख दु:खी होती, इसलिए वह गोलोक चली गई।




समय व्यतीत होता रहा। तब काफी सालों के बाद अचानक एक दिन यम को अपनी बहन यमुना की याद आई। यम ने अपने दूतों को यमुना का पता लगाने के लिए भेजा, लेकिन वह कहीं नहीं मिली। फिर यम स्वयं गोलोक गए जहां यमुनाजी की उनसे भेंट हुई। इतने दिनों बाद यमुना अपने भाई से मिलकर बहुत प्रसन्न हुई। यमुना ने भाई का स्वागत किया और स्वादिष्ट भोजन करवाया। इससे भाई यम ने प्रसन्न होकर बहन से वरदान मांगने के लिए कहा। तब यमुना ने वर मांगा कि- ‘हे भैया, मैं चाहती हूं कि जो भी मेरे जल में स्नान करे, वह यमपुरी नहीं जाए।

भैयादूज की द्वितीय कथा-

एक राजा अपने साले के साथ चौपड़ खेला करता था। साला जीत जाता था। राजा ने सोचा कि भाई दूज पर यह बहन से टीका कराने आता है, इसलिए जीत जाता है। अतः राजा ने भाई दूज आने पर साले को आने से रोक दिया। साथ ही कड़ा पहरा लगा दिया कि वह न आ सके। जब भैया दूज पर भाई बहन के पास टीका कराने नहीं पहुंचा तो वह बहन बहुत दुःखी हुई।

तब भाई यमराज की कृपा से कुत्ते का रूप धारण कर राजा के कड़े पहरे के बावजूद बहन के यहां पहुंचा। बहन हाथ में टीका लेकर बैठी थी। कुत्ते को देखकर उसने प्रेम से अपना टीके से सना हाथ उसके माथे पर फेरा। कुत्ता वापस चला गया। लौटकर वह राजा से बोला—मैं भाई दूज का टीका करा आया, आओ अब खेलें। राजा बहुत चकित हुआ। तब साले ने पूरी बात सुनाई। राजा टीके के महत्व को मान गया और अपनी बहन से टीका कराने चला गया।




यह सुनकर यम चिंतित हो उठे और मन-ही-मन विचार करने लगे कि ऐसे वरदान से तो यमपुरी का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। भाई को चिंतित देख, बहन बोली- भैया आप चिंता न करें, मुझे यह वरदान दें कि जो लोग आज के दिन बहन के यहां भोजन करें तथा मथुरा नगरी स्थित विश्रामघाट पर स्नान करें, वे यमपुरी नहीं जाएं। यमराज ने इसे स्वीकार कर वरदान दे दिया। बहन-भाई मिलन के इस पर्व को अब भाई-दूज के रूप में मनाया जाता है।

भैयादूज में दान का महत्व –

भारतीय संस्कृति में प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठान के साथ दान का विशेष महत्व है| दान में केवल मानव ही नही पशु पक्षी भी समिमलित होतें हैं, भाई दूज के दिन किसी निर्धन या विद्वान ब्रह्मण को भोजन करना चाहिए, साथ ही गाय,कुत्ता व पक्षियों को भी यथायोग्य भोजन दिया जाये| परिवार के सभी लोग सूर्य को जल दें, जो बहनें व्रत रखती हैं, वह दोपहर बाद भोजन कर सकती हैं, लेकिन जब तक भाई की आरती कर लें| भाई को चाहिए जी वो सामर्थ्य के अनुसार अपनी बहन को उपहार अवश्य दे और यदि बहन किसी संकट में है तो उसे दूर करने का प्रयास करे|

विनीत वर्मा की रिपोर्ट-