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अफसरों की सांठगांठ से आउटसोर्सिंग भर्तियों में होता है फर्जीवाड़ा, रसूखदार लोगों की ज्यादातर हैं एजेंसियां!

Big Fraud In Outsourcing Recruitments

By शिव मौर्या 
Updated Date

लखनऊ। सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग एजेंसियों के द्वारा कर्मचारियों की हो रही भर्तियों में बड़ा फर्जीवाड़ा किया जाता है। इस फर्जीवाड़ें में अफसरों से लेकर विभागों के कर्मचारियों की मिलीभगत रहती है, जिसके जरिए कर्मचारियों का शोषण किया जाता है। आउ​टसोर्सिंग भर्तियों में कर्मचारियों की सैलरी में भी बड़ा खेल किया जाता है। तय वेतन से भी कम रुपये कर्मचारियों को दिए जाते हैं। साथ ही चेहते लोगों को इसके जरिए विभागों में एंट्री दिलाई जाती है।

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बता दें कि, सेवा प्रदाता एजेंसियों के जरिए कर्मचारी लेकर काम कराने का कारोबार 790 करोड़ रुपये पार कर गया है। लेकिन सरकारी तंत्र न तो भ्रष्टाचार का पर्याय साबित हो रही आउटसोर्सिंग भर्ती व्यवस्था को खत्म करने को तैयार है और न ही इन भर्तियों के लिए स्पष्ट नीति बनाकर बेरोजगारों का शोषण रोक कर भर्ती का समान अवसर उपलब्ध कराने की मुकम्मल व्यवस्था ही कर रही है।

हालांकि हाईकोर्ट द्वारा सरकारी विभागों में सेवा प्रदाता के जरिए भर्तियों पर रोक व इससे संबंधित नियम पूछने के बाद आउटसोर्सिंग नीति को जल्द मंजूरी मिलने की संभावना है। गौरतलब है कि आउटसोर्सिंग एजेंसियों का फर्जीवाड़ा किसी से छिपा नहीं है। पंचायतीराज विभाग से लेकर राजस्व विभाग तक की भर्तियों में आउटसोर्सिंग एजेंसियों व सरकारी तंत्र की मिलीभगत का खुलासा हो चुका है, जिसके कारण कई भर्तियां निरस्त हो चुकी हैं।

इसके साथ ही इन भर्तियों में आईएएस और पीसीएस अफसर भी फंस चुके हैं। सरकार विधानसभा में आउटसोर्सिंग को बेरोजगारों से धोखे वाला काम मान चुकी है।  श्रम मंत्री इस समस्या का जल्द स्थायी समाधान का वादा कर चुके हैं और मुख्यमंत्री के निर्देश पर आउटसोर्सिंग नीति बनाने की कवायद भी शुरू हो गई, लेकिन यह काम पूरा होने का नाम नहीं ले रहा है। 21 अक्तूबर को मुख्यमंत्री पॉलिसी के मसौदे पर सहमति दे चुके हैं, पर एक माह बाद भी नीति नहीं बनी।

प्रभावशाली लोगों की हैं आउटसोर्सिंग कंपनियां
सूत्रों की माने तो सरकारी विभागों में आउटसोसिंग के जरिए भर्ती करने वाली एजेंसियां ज्यादातर प्रभावशाली लोगों की हैं। एजेंसियों द्वारा कर्मचारियों की भर्तियों में जमकर मनमना तरीका अपनाया जाता है। प्रदेश सरकार ने 2019-20 के आम बजट में 790 करोड़ 66 लाख रुपये सरकारी कार्यालयों में आउटसोर्सिंग से रखे गए कर्मचारियों पर खर्च के लिए रखा है। सूत्रों की माने तो आउटसोसिंग कंपनियां कर्मचारियों के वेतन में बड़ा फर्जीवाड़ा करते हैं। कर्मचारियों को तय वेतन से भी कम रुपये देते हैं। सूत्र बतातें हैं कि भर्ती के समय भी कंपनियां अपने तरीके से कर्मचारियों को रखती है। इसके लिए बेरोजगारों से रकम भी वसूली जाती है।

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भर्ती को लेकर प्रमुख शिकायतें
– आउटसोर्सिंग चयन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं। भर्ती का विज्ञापन नहीं होता जारी।
– मनचाहे लोगों की भर्ती में भ्रष्टाचार के अवसर बनते हैं।
– कर्मचारियों को को पूरा मानदेय नहीं मिल पाता है। कई बार खाते में तो पूरा भुगतान होता है, लेकिन बाहर से कर्मी से कुछ हिस्सा वापस ले लिया जाता है।
– समान कार्य व पद होने के बावजूद अलग-अलग एजेंसियां अलग-अलग मानदेय देती हैं।

आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के सहारे ​नगर​ निगम
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी विभागों में नियमति की जगह आउटसोर्सिंग के कर्मचारी तैनात करने पर आपत्ति जताई है। हालांकि, लखनऊ नगर निगम का काम इन कर्मचारियों के ही सहारे चल रहा है। इसके बाद भी राजधानी के हिसाब से आठ हजार कर्मचारियों की कमी है।

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