बढ़ सकता है बिहार का सियासी पारा

पटना। लालू के ठिकानों पर सीबीआई की छापेमारी और उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के खिलाफ दर्ज हुए भ्रष्टाचार के मामले के बाद महागठबंधन के बीच बढ़ी तनातनी आने वाले कुछ घंटों में बढ़ सकती है। राष्ट्रपति चुनाव के लिए होने वाले मतदान के कारण जदयू और राजद के बीच का संघर्ष विराम अब खत्म होने वाला है। अब देखने वाली बात यह होगी कि भ्रष्टाचार के मामले में फंसते नजर आ रहे डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव बैकफुट पर जाकर इस्तीफा देते हैं या फिर सीएम नीतीश कुमार फ्रंट फुट पर आकर अपनी सुशासन बाबू वाली छवि को डिफेंड करते हैं।

इस मामले को लेकर बिहार की महागठबंधन सरकार पर जिस तरह के संकट के बाद मंडरा रहे हैं उसे ध्यान में रखते हुए कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। वर्तमान रा​जनीतिक परिदृष्य और बिहार के सियासी सूरमाओं के अनुभव दोनों का आंकलन किया जाए तो बिहार में महागठबंधन सरकार के कायम बने रहने की संभावनाएं भी बनती नजर आ रहीं हैं।

कुछ राजनीति विश्लेषकों की माने तो सपरिवार सीबीआई के निशाने पर आ चुके लालू प्रसाद यादव के लिए बिहार सरकार में बना रहना बेहद जरूरी मालूम पड़ता है। अगर वे अपने पुत्र तेजस्वी को इस्तीफा नहीं दिलाते और सीएम नीतीश कुमार इस्तीफे की मांग पर डंटे रहकर अपना इस्तीफा दे देते हैं तो ऐसी परिस्थिति में राजद और लालू के परिवार दोनों को बड़ा सियासी नुकसान हो सकता है।

उसके बाद बिहार में बनने वाले सियासी समी​करणों में ​नीतीश कुमार का बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाना बिलकुल तय है। जिसके परिणाम स्वरूप वर्तमान में ​प्रदेश सरकार के समर्थन की उम्मीद करने वाली राजद के सामने एक तरफ कुंआ और दूसरी तरफ खाई जैसी स्थिति बन जाएगी।

वहीं लालू के सियासी दांवों से बाकिफ लोगों का मानना है कि वे ऐसी कोई गलती नहीं करेंगे जिससे बिहार की सत्ता उनके हाथ से बेहाथ हो। वह चाहें अपनी किसी बेटी को राजनीति में उतारें या फिर अपनी पार्टी के सभी मंत्रियों का इस्तीफा दिलाकर नीतीश सरकार को बाहरी समर्थन देकर अपनी दरियादिली दिखाएं, दोनों ही तरह ही बातों की संभावनाएं प्रबल होती नजर आ रहीं हैं।

राजद को नीतीश सरकार के मंत्रिमंडल से अलग कर लालू प्रसाद यादव बिहार की राजनीति में धूमिल होती अपनी अपने परिवार की छवि को बचाने की कोशिश करते नजर आएं तो यह बड़ी बात नहीं होगी। उनका यह कदम बिहार में उनके वोटबैंक को भविष्य में मजबूती देगा।