राज करने की नीति ही राजनीति है, न नीतीश सही न लालू गलत

Bihar Ki Rajniti Nitish Kumar Sahi Na Lalu Galat

नई दिल्ली। लोकतंत्र हो या राजतंत्र दोनों में राज यानी सत्ता सर्वोपरि है। अब सत्ता पर बैठने और बने रहने के लिए क्या नीति अपनानी है वह राजनीति है। सत्ता पर बने रहने के लिए कोई भी नीति अपनाई जा सकती है। इसमें न कुछ गलत होता है और न ही सही, क्योंकि सत्ता सिर्फ सफलता देखती है न कि सही और गलत। जिसकी नीति सफल होती है वही सत्ता को भोग सकता है। ऐसा ही कुछ नीतीश कुमार ने भी किया है। जिस सूचिता भरी राजनीति का हवाला देकर वह सीएम की कुर्सी से इस्तीफा देकर गए अब उसी सूचिता के नाम पर वह बीजेपी से हाथ मिलाकर दोबारा सीएम की कुर्सी पर कब्जा जमाने में कामयाब नजर होते नजर आ रहे हैं।

बिहार की राजनीति में हो रही उठा पटक को शुद्ध राजनीति कहा जा सकता है। पूरे घटनाक्रम को देखा जाए तो नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच एक ताल मेल नजर आता है। जिसकी शुरूआत 2016 में नोटबंदी के समय जिस तरह से नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के फैसले को सराहने और राष्ट्रपति चुनावों में एनडीए प्रत्याशी रामनाथ कोविंद को उनका समर्थन देने से जोड़कर देखा जाए तो गलत नहीं होगा। शायद यह तालमेल उस समय नहीं था जब नीतीश और नरेन्द्र मोदी दोनों का कद एक मुख्यमंत्री का हुआ करता था। अब नीतीश कुमार यह स्वीकार करते नजर आ रहे हैं कि नरेन्द्र मोदी का कद उनसे बड़ा हो चुका है।

नीतीश के फैसले की बात की जाए तो वह बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव की छवि और उनके बढ़ते कद के आगे वह छोटे पड़ते नजर आ रहे थे। उनकी छवि धूमिल होती नजर आ रही थी। वह उस बंधन को तोड़ना चाहते थे जिसमें वह अपनी छवि को लेकर घुटन महसूस करने के साथ साथ पराधीनता का अनुभव कर रहे थे। उनकी सुशासन बाबू वाली छवि को बट्टा लग रहा था। नीतीश कुमार को अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए ऐसा फैसला लेना मजबूरी थी।

नई दिल्ली। लोकतंत्र हो या राजतंत्र दोनों में राज यानी सत्ता सर्वोपरि है। अब सत्ता पर बैठने और बने रहने के लिए क्या नीति अपनानी है वह राजनीति है। सत्ता पर बने रहने के लिए कोई भी नीति अपनाई जा सकती है। इसमें न कुछ गलत होता है और न ही सही, क्योंकि सत्ता सिर्फ सफलता देखती है न कि सही और गलत। जिसकी नीति सफल होती है वही सत्ता को भोग सकता है। ऐसा ही कुछ नीतीश कुमार ने…