1. हिन्दी समाचार
  2. उत्तर प्रदेश
  3. जन्मदिवस विशेष: बलिया के इस ​लाल ने ब्रिटिश हुकूमत को भारत से उखाड़ने में दिया था अहम योगदान

जन्मदिवस विशेष: बलिया के इस ​लाल ने ब्रिटिश हुकूमत को भारत से उखाड़ने में दिया था अहम योगदान

उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर पर स्थित जिला बलिया है। अगर इस नाम से आप वहां तक नहीं पहुंच पा रहे हैं तो आपको बता दें कि हम बात बागी बलिया की कर रहे हैं। अब तो समझ में आ ही गया होगा। गंगा और घाघरा जैसी नदियां इस जिले को बिहार से अलग करती हैं। जिला के सीमा पर बि​हार के प्रमुख जिले बक्सर,छपरा और शिवान हैं।

By प्रिन्स राज 
Updated Date

Birthday Special This Lal Of Ballia Had Contributed Significantly In Uprooting The British Rule From India

बलिया। उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर पर स्थित जिला बलिया है। अगर इस नाम से आप वहां तक नहीं पहुंच पा रहे हैं तो आपको बता दें कि हम बात बागी बलिया की कर रहे हैं। अब तो समझ में आ ही गया होगा। गंगा और घाघरा जैसी नदियां इस जिले को बिहार से अलग करती हैं। जिला के सीमा पर बि​हार के प्रमुख जिले बक्सर,छपरा और शिवान हैं। इस जिले के नगवा गांव में एक ऐसे व्यक्ति का जन्म हुआ जिसकी वजह से इस जिले को बगावत की धरती कहा जाने लगा हम बात कर रहे हैं मंगल पाण्डेय की एक भारतीय जो स्वतंत्रता सेनानी थे और जिन्होंने 1857 में भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पढ़ें :- जेपी चंद्रशेखर का वो शिष्य जो आज भी थामें हुए है समाजवादी झंडा, नहीं हुए कभी अपनी विचारधारा से विमुख

मंगल पाण्डेय का जन्म भारत में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा नामक गांव में 19 जुलाई 1827 को एक “ब्राह्मण” परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम दिवाकर पांडे था। “ब्राह्मण” होने के बाद भी मंगल पाण्डेय सन् 1849 में 22 साल की उम्र में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में शामिल हो गए। विद्रोह का प्रारम्भ एक बंदूक की वजह से हुआ। सिपाहियों को पैटऱ्न 1853 एनफ़ील्ड बंदूक दी गयीं जो कि ०.577 कैलीबर की बंदूक थी तथा पुरानी और कई दशकों से उपयोग में लायी जा रही ब्राउन बैस के मुकाबले में शक्तिशाली और अचूक थी। नयी बंदूक में गोली दागने की आधुनिक प्रणाली (प्रिकशन कैप) का प्रयोग किया गया था परन्तु बंदूक में गोली भरने की प्रक्रिया पुरानी थी।

नयी एनफ़ील्ड बंदूक भरने के लिये कारतूस को दांतों से काट कर खोलना पड़ता था और उसमे भरे हुए बारुद को बंदूक की नली में भर कर कारतूस को डालना पड़ता था। कारतूस का बाहरी आवरण में चर्बी होती थी जो कि उसे पानी की सीलन से बचाती थी। सिपाहियों के बीच अफ़वाह फ़ैल चुकी थी कि कारतूस में लगी हुई चर्बी सुअर और गाय के मांस से बनायी जाती है। जिससे हिन्दू और मुस्लिम दोनो धर्म के सैनिक उपयोग नहीं करना चाहते थे। इसे उपयोग करने से मना करने वाले पहले व्यक्ति थे मंगल पांडेय। 29 मार्च 1857 को बैरकपुर परेड मैदान कलकत्ता के निकट मंगल पाण्डेय ने रेजीमेण्ट के अफ़सर लेफ़्टीनेण्ट बाग पर हमला कर के उसे घायल कर दिया।

जनरल जान हेएरसेये के अनुसार मंगल पाण्डेय किसी प्रकार के धार्मिक पागलपन में थे जनरल ने जमादार ईश्वरी प्रसाद ने मंगल पांडेय को गिरफ़्तार करने का आदेश दिया पर ज़मीदार ने मना कर दिया। सिवाय एक सिपाही शेख पलटु को छोड़ कर सारी रेजीमेण्ट ने मंगल पाण्डेय को गिरफ़्तार करने से मना कर दिया। मंगल पाण्डेय ने अपने साथियों को खुलेआम विद्रोह करने के लिये कहा पर किसी के ना मानने पर उन्होने अपनी बंदूक से अपनी प्राण लेने का प्रयास किया। परन्तु वे इस प्रयास में केवल घायल हुये। 6 अप्रैल 1857 को मंगल पाण्डेय का कोर्ट मार्शल कर दिया गया और 8 अप्रैल को फ़ांसी दे दी गयी।

मंगल पांडे द्वारा लगायी गयी विद्रोह की यह चिंगारी बुझी नहीं। एक महीने बाद ही 10 मई सन् 1857 को मेरठ की छावनी में बगावत हो गयी। यह विप्लव देखते ही देखते पूरे उत्तरी भारत में फैल गया जिससे अंग्रेजों को स्पष्ट संदेश मिल गया कि अब भारत पर राज्य करना उतना आसान नहीं है जितना वे समझ रहे थे। इसके बाद ही हिन्दुस्तान में चौंतीस हजार सात सौ पैंतीस अंग्रेजी कानून यहाँ की जनता पर लागू किये गये ताकि मंगल पाण्डेय सरीखा कोई सैनिक दोबारा भारतीय शासकों के विरुद्ध बगावत न कर सके। लेकिन बगावत की बीज पड़ चुकि थी जिसे आज नहीं तो कल बरगद सरिखा बड़ा होना ही था। उनके द्वारा किये गये बगावत से उत्पन्न विद्रोह ने ही बलिया को नया नाम ‘बागी बलिया’ दिया।

पढ़ें :- योगी सरकार के एक मंत्री ने कहा, जब तक कोरोना खत्म नहीं हो जाता तब तक नहीं खाउंगा अन्न

 

इन टॉपिक्स पर और पढ़ें:
Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक, यूट्यूब और ट्विटर पर फॉलो करे...
X