मायावती को घेरने के लिए कांशीराम की मृत्यु की सीबीआई जांच की मांग उठाएगी बीजेपी

लखनऊ। बीएसपी के संस्थापक और दलित नेता स्वर्गीय कांशीराम की सियासी विरासत को भुनाती आ रहीं मायावती पर अपने ही गुरू और मार्गदर्शक कांशीराम की हत्या करवाने के आरोप लगते रहे हैं। विगत 10 वर्षों में कांशीराम के ही परिवार के सदस्यों ने कांशीराम की मृत्यु के लिए मायावती पर कई प्रकार के आरोप लगाए, लेकिन हर बार यह आरोप केवल सियासी आरोप बन कर रह गए कुछ दिनों तक चर्चा में रहे और उसके बाद सियासत आगे बढ गई। लेकिन 2017 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या ने कांशीराम की मृत्यु को राजनीतिक षड्यंत्र करार देते हुए इन आरोपों की तह तक जाने के लिए सीबीआई जांच की मांग कर दी है। वह जल्द ही इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलकर सीबीआई जांच की मांग करेंगे।




एक दशक पुराने आरोपों को एकबार फिर हवा में उछालकर बीजेपी मायावती को क्षति पहुंचाने के प्रयास में नजर आ रही है। बीजेपी का पूरा ध्यान बीएसपी के उन कार्यकर्ताओं और वोटरों पर है जो बीएसपी से केवल कांशीराम के विचारों में अपनी आस्था के कारण जुड़े हुए हैं और तीन दशकों से पार्टी को लगातार मजबूत बनाने का काम कर रहे है। बीएसपी का यही कार्यकर्ता उसकी ताकत है। यह एक ऐसा समय है जब बीएसपी अपने कई मठाधीशों के किनारे होने से कमजोर नजर आ रही है। ऐसे नाजुक समय में अगर बीजेपी का यह प्रहार ​ठीक निशाने पर बैठा तो पार्टी के वोटबैंक पर इसका असर 2017 के चुनावों में देखने को जरूर मिल सकता है। मायावती के किचन कैबिनेट के हिस्सा रह चुके कई चहरे इस समय बीजेपी में शामिल हो चुके हैं, जिन्हें बीजेपी इन आरोपों को हवा देने के लिए अपना माध्यम बना सकती है।

यूपी की सियासत के जानकारों की माने तो बीएसपी की नींव रखने वाले कांशीराम की यूपी हरियाणा और पंजाब समेंत कई अन्य प्रदेशों के दलित वोटबैंक पर मजबूत पकड़ रखने वाले राष्ट्रीय नेता थे। इस बात में कोई दोराय नहीं कि बीएसपी की वर्तमान सुप्रीमो उनकी बनाई नेता थी और उनके करीबियों से सबसे काबिल भी। कांशीराम के आशीर्वाद से ही वह 1995 में पहली बार यूपी की सीएम बनी और 1997 में दोबारा, 2001 में उन्होंने मायावती को अपना उत्तराधिकारी भी घोषित कर दिया। मायावती आज भी अपने भाषणों में कांशीराम को अपना गुरू और मार्गदर्शक करार देतीं हैं। लेकिन जिस तरह से 2002 से 2003 तक बीजेपी के गठबंधन वाली सरकार में मायावती ने सीएम रहने के दौरान कांशीराम को दिल का दौरा पड़ने के बाद सक्रिय राजनीति से दूर कर दिया गया वह अपने आप में कई प्रश्न खड़े करता आया है।




उस दौर में बीएसपी के ही बड़े नेता दबी जुबान से मायावती पर कांशीराम को नजरबंद करने के आरोप लगाते रहे। इतना ही नहीं जब मायावती पर इन आरोपों का दवाब ज्यादा बढ़ा तो उन्होंने मीडिया का सहारा लेकर कांशीराम के स्वास्थ्य की दशा को सबके सामने लाने का काम किया। मायावती की तमाम सफाइयों के बावजूद कांशीराम के भाई—बहन ने सार्वजनिक रूप से मायावती पर आरोप लगाए कि उन्हें कांशीराम से मिलने से रोका गया है। इन आरोपों को ताकत तब मिली जब पार्टी के ही कुछ नेता मायावती पर यह आरोप लगाने लगे कि कांशीराम अब अपना उत्तराधिकारी बदलना चाहते हैं। उन्हें लग रहा है कि मायावती उनके मिशन के साथ न्याय नहीं कर रहीं हैं। तमाम आरोपों के बीच मायावती ने न तो कभी दोबारा इन आरोपों पर अपनी सफाई दी और न ही किसी दवाब को अपने ऊपर हावी होने दिया।

9 अक्टूबर 2006 को कांशीराम की मृत्यु के बाद तक कई तरह की कहानियां गढ़ी गई। किसी कहानी में मायावती पर कांशीराम को नजरबंद रखकर मेडिकली ब्रेन डैड करवाने बात थी तो किसी में स्लो प्वाइजन देकर धीरे—धीरे मारने की बात। हालांकि मायावती ने कहानी सुनाने वाली जुबानों पर ताला लगाने की नई तरकीब इजाद की और सोशल इंजीनियरिंग की दम पर 2007 के विधानसभा चुनावों में प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाकर खुद को बीएसपी का सबसे ताकतवर चेहरा बना दिया। 2007 के चुनावों में सामने आई बीएसपी यूपी की सबसे ताकतवर राज​नीतिक पार्टी जरूर बनी, लेकिन मायावती एक नए तेवर वाली और ज्यादा सशक्त राजनेता बन कर उभरीं।