सेशन कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट ने रखा बरकरार

मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने यवतमाल के एक सेशन कोर्ट द्वारा वर्ष 2013 में सुनाये गए उस ऐतिहासिक फैसले को कायम रखा है जिसमें एक आरोपी को दोहरी मौत की सजा और दो बार उम्रक़ैद की सजा सुनाई थी। भारतीय इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी व्यक्ति को ऐसी सजा सुनाई गई हो। यवतमाल के सेशन कोर्ट ने यह सजा भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (1) के तहत सुनाई थी जिसे वर्ष 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया गैंगरेप के बाद एक संशोधन कर बनाया गया था।

आपको बता दें कि शत्रुघन मासाराम ने यवतमाल में दो वर्षीय बच्ची का अपहरण कर उसे एक निर्माणाधीन मकान में ले गया था और यसके साथ बालात्कार की घटना को अंजाम दिया था। मासाराम द्वारा दी गई यातनाओं से बच्ची की मौके पर ही मौत हो गई थी। उधर बच्ची को तलाश रहे परिजन घटना स्थल पर पहुँच गए थे और उन्होने मासाराम को वहाँ से भागते हुए देख लिया था। बाद में परिजनों द्वारा बच्ची को अस्पताल ले जाने पर डॉक्टर्स ने उसे मृत घोषित कर दिया था।

इस घटना पर सुनवाई करते हुए यवतमान की सेशन कोर्ट के न्यायाधीश एसी चाफाले ने ने मासाराम को दोहरी मृत्युदंड और दो बार उम्र कैद की सजा सुनाई थी। इस घटना में 13 गवाहों की गवाही भी हुई थी। सेशन कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए मासाराम ने बॉम्बे हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी जिसमें उसने मांग की थी कि उसकी कम उम्र को देखते हुए सजा सुनाने में नरमी बरती जाए। हालांकि हाईकोर्ट ने मासाराम की याचिका को सिरे से खारिज करते हुए इस ऐतिहासिक फैसले को कायम रखा है।  

कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि ऐसे बर्बर अपराध के मामलों में दया या नर्मी की कोई गुंजाइश नहीं हो सकती। कोर्ट ने इस मामले को दुर्लभ किस्म के अपराध की श्रेणी ने रखा। ऐसे अपराधों में कानूनी तौर पर मौत की सजा दी जाती है।