यूपी लोकसभा उप चुनाव के बाद नौकरशाही में बदलाव करने के मूड में सीएम योगी

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में मिली हार के बाद यूपी के सचिवालयों में हलचलें तेज हो चलीं हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ अपने वार्चस्व वाली सीट के हाथ से निकलने के बाद इतने आहत हैं कि उन्होंने गुरुवार को अपने तमाम कार्यक्रम रद्द कर शीर्ष नौकरशाहों के साथ कई घंटों तक बैठक की है। इस बैठक में किन विषयों पर चर्चा हुई इस की जानकारी तो नहीं मिली लेकिन नौकरशाही में बड़े उलट…

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में मिली हार के बाद यूपी के सचिवालयों में हलचलें तेज हो चलीं हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ अपने वार्चस्व वाली सीट के हाथ से निकलने के बाद इतने आहत हैं कि उन्होंने गुरुवार को अपने तमाम कार्यक्रम रद्द कर शीर्ष नौकरशाहों के साथ कई घंटों तक बैठक की है। इस बैठक में किन विषयों पर चर्चा हुई इस की जानकारी तो नहीं मिली लेकिन नौकरशाही में बड़े उलट फेर की चर्चा जोरों पर है।

सूत्रों की माने तो सीएम योगी लंबे समय से नौकरशाही में बड़े फेरबदल करने का मन बना चुके थे। इस दौरान होली, इन्वेस्टर्स मीट, लोकसभा उपचुनाव, राज्यसभा चुनाव और बजट सत्र की व्यस्तता के चलते इसमें विलंब होता रहा। बजट सत्र 26 मार्च को पूरा होना है और इसके ठीक बाद योगी सरकार अपने कार्यकाल के एक साल पूरे करने का जश्न मनाने की तैयारी कर रही थी।जिस वजह से सरकार ने फेरबदल की योजना को अप्रैल तक के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया था।

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सीएम योगी से लेकर भाजपा संगठन तक किसी नेता ने ऐसी उम्मीद नहीं की थी कि गोरखपुर और फूलपुर सीट पर पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ेगा। जिस बुरी परिस्थिति की कल्पना की जा रही थी उसमें भाजपा फूलपुर सीट पर हार एक विषय थी, लेकिन मुख्यमंत्री के वार्चस्व वाली गोरखपुर सीट की हार उसके लिए सूरज के पश्चिम से उगने जैसी सूरत थी।

​लोकसभा चुनावों के परिणाम भाजपा और यूपी सरकार की उम्मीद के ​ठीक उलट सामने आए। जिन्हें स्वीकार करना भाजपा खास तौर पर सीएम योगी आदित्यनाथ के लिए खून का घूंट पीने जैसा है।जिस सीट पर वह पिछले 23 सालों से कब्जाए हुए थे, उसके हाथ से जाने का मलाल उनके चेहरे पर स्पष्ट नजर आ रहा है।

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इस हार के बाद सीएम योगी को समझ आने लगा है कि उनकी सरकार और अधिकारियों की कार्यशैली भाजपा के कार्यकर्ताओं को पसंद नहीं आ रही है। उनके अपने ही संसदीय क्षेत्र के कार्यकर्ता उपचुनावों में पार्टी के लिए मतदान करने के लिए बाहर नहीं निकले।​ जिस वजह से हार का सामना करना पड़ा।

प्रतिष्ठा हुई आहत तो याद आए कार्यकर्ता—

गोरखपुर सीट से पूर्व सांसद सीएम योगी आदित्यनाथ और फूलपुर सीट से पूर्व सांसद उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के लिए अपनी छोड़ी सीटों को वापस जीत कर पार्टी की झोली में डालना एक बहुत बड़ी प्रतिष्ठा का सवाल था। सीएम योगी भाजपा के लिए एक ब्रांडेड नेता बनकर उभर रहे हैं, जिन्होंने उत्तर प्रदेश के बाहर पार्टी के लिए गुजरात और त्रिपुरा चुनावों में प्रचार करने के अलावा कर्नाटक और केरल के भी ताबड़तोड़ दौरे किए हैं। वहीं केशव प्रसाद मौर्य की बात की जाए तो उन्हें यूपी भाजपा का सबसे बड़ा रणनीतिकार माना जाता रहा। उनके प्रदेश अध्यक्ष रहते ही भाजपा यूपी चुनाव में अद्वितीय जीत प्राप्त की जिसकी रणनीति तैयार करने का पूरा श्रेय केशव को दिया गया। फूलपुर उपचुनाव में मिली हार ने केशव की प्रतिष्ठा को हिलाकर रख दिया है।

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हार से आहत दोनों ही नेता आत्मचिंतन और हार पर मंथन कर रहे हैं। पार्टी स्तर से जो फीडबैक मिल रहा है, उसमें यही बात सामने आ रही है कि इस उपचुनावों में पार्टी की हार का मुख्य कारण कार्यकर्ताओं की नाराजगी रही। जिसका अनुमान उसी समय लग गया था, जब मतदान का प्रतिशत कम रहा। पार्टी के कार्यकर्ता जोकि मतदाताओं को बूथ तक ले जाने का काम करते हैं और एक एक मतदाता को वोट देने के प्रेरित करते हैं, वे इस चुनाव में उनमें कोई उत्साह देखने को नहीं मिला।

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