सर्जिकल स्ट्राइक की कड़वी सच्चाई ‘‘कैश लेस भारत, प्राण लेस ग़रीब ‘‘

लखनऊ: अभी तक समझा जाता था कि राजनेताओं की पहुँच, बड़े-बड़े विभागों में अफ़सरों आदि तक ही होती है और वह चुटकी बजाते ही कोई भी काम करा सकते हैं बस उनका नाम होना चाहिए किसी भी तरह और पेट भरना चाहिए इस के लिए चाहे उन्हें जानवरों के चारे में ही घोटाला करना पड़े अथवा मज़दूरों की रोटी देने वाली भट्टियों के कोयले में घोटाला करना पड़े जिसको लोग चारा घोटाला एवं कोयला घोटाला के नाम से बुलाते हैं ख़ैर यहाँ हम बात कर रहे हैं कोयले जैसे काले धन की जिसकी दी हुई तारीखों में पता नही कितने काले धन वाले लोग बैंकों में साठ-गांठ बिठा कर काले धान को गुलाबी कर लिया, और ना जाने कितने लोग बिचारे अपने सफ़ेद धन को अपनी रोज़ मर्रा की मज़दूरी छोड़ कर बैंकों की लाईन में लग कर भी ना तो जमा कर पाये और ना ही बदल पाये ना जाने कितनों ने धक्के खाये और ना जाने अब तक कितने खा रहे हैं।

इतना ही नही कुछ ऐसे भी हैं जो धक्कों के साथ लाठियाँ तक खा चुके हैं। मगर कुछ लोग अब भी यह आस लगाये बैठे हैं कि अच्छे दिन आने वाले हैं जबकि सरकार ने मीडिया तक को गुमराह कर के व्यर्थ के मुद्दों, जैसे राम मन्दिर, लव-जिहाद , घर वापसी, गौ-रक्षा, गौं-मांस, सहिष्णुता, असहिष्णुता, शाहरुख़ खान, आमिर खान, सलमान खान, कन्हैया कुमार, भारत माता की जय, वन्दे मातरम्, कश्मीर, सर्जिकल स्ट्राइक, तलाक व पर्सनल लॉ कानून, 500 और 1000 के नोट, इन सभी ऐतिहासिक कारनामों में कई साल से मीडिया को व्यस्त का आम आदमी के बुनियादी सवालों को गायब कर दिया है इस पर भी कहा जा रहा है कि अच्छे दिन आने वाले हैं क्या यही अच्छे दिन ?




क्या सालों में कभी आपने अपने टीवी पर सरकारी शिक्षा के गिरते स्तर पर बहस होती देखी है? क्या कभी आपने ग्रामीण भारत में आज भी हो रहे बाल विवाह की समस्या पर एक्सपर्टस की कोई टीम टीवी पर देखी है ? क्या कभी आपको सड़कों पर भीख मांगने और भूख से बिलखते बच्चों के पीछे लगा कोई मीडिया कैमरा देखा है? क्या कभी आपने नालों फुटपाथों पर ज़िंदगी को कूड़े के ढेर की तरह ढोते हुए लोगों के लिए किसी को चिल्लातें हुए देखा है? क्या कभी आपने बेरोज़गारी की मार झेल रहे नौजवानों के हक़ में किसी को बात करते देखा है ? क्या कभी आपने कुपोषण की शिकार महिलाओं एवं बच्चों के लिए क्या किया जाए जिससे ये कमी दूर हो सके इस पर बात करते हुए सुना है ?

क्या हायर एजूकेशन वाले बच्चों के स्कॉलरशिप के बारे में कोई बहस होते हुए सुना है? जिससे गरीब बच्चों को सहायता मिल सके ? क्या कभी आपने नेताओं के मुंह से जेलों में बंद बेगनाह नौजवानों की रिहाई के बारे में बहस करते सुना है ? मीडिया को व्यर्थ के मुद्दों पर व्यस्त रख कर बहुत बड़े कारनामें किये जा रहे हैं और हमें इसकी भनक तक नही। सर्जिकल स्ट्राइक से जी भर गया हो तो अब नया शगूफा ‘‘समान नागरिक संहिता‘‘ तैयार है । कुछ सप्ताह तीन तलाक़ पर बहस करके अपने राष्ट्रवाद पर इतरा सकते हो तो ठीक है, अगर इस मुद्दे को ज़्यादा न चला सको तो फासीवाद की फेक्ट्री में अगला एपिसोड बनकर तैयार होगा आखिर हम कब तक इन मुद्दों पर चर्चा करते रहेंगें।




आओ बैंकों की तरफ रुख करते हैं जहाँ रिक्शा चला के मज़दूरी आदि करके 400 रूपये कमाने वाले लोग नोट बंदी और छुट्टे पैसों की कमी के चलते और अधिक बेरोज़गारी की मार झेल रहे लोग हफ्तों लाइन मं लग कर भी अपने ही पैसे नही निकाल पा रहे है जिस से वह अपनी रोज़मर्रा की जरूरतों को पूरा कर सकें। जाने कितने छात्र, छात्राओं की फीस जमा नही हो पा रही है ना जाने कितने लोग ऐसे हैं जिन्होने इस तंगी से तंग आ कर अपनी जान दे दी है तो ना जाने कितने ऐसे हैं जिनकी मौत बैंकों की लाईन में लग कर हो गई क्या यही अच्छे दिन हैं? कि गरीब के मेहनत के पैसे भी नही निकल पा रहे है और काले धन वाले के करोड़ों रूपये गुलाबी हो रहे हैं क्या सरकार बता सकती है जब बैंकों में यह एक गुलाबी नोट कई दिन की मज़दूरी छोड़ने के बाद भी आम इन्सान को नही मिल पा रहा है तो सरकार और सरकारी विभागों में पहचान रखने वाले लोगों के पास यह गुलाबी नोट करोड़ों की तादाद में कैसे मिल रहे हैं ? खैर एक बात तो माननी पड़ेगी कि इस समय दुनिया और परलोक दोनों में लाईन लगी हुई है और लोग बैंकों में जाकर कैश लेस और लाईल मेंं लग कर प्राण लेस हो रहे हैं। हाँ सरकार का कहना सच हो रहा है भारत बदल रहा है।

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