जानिए क्यों मनाया जाता है छठ पूजा

नई दिल्ली: पर्वों की माला कहा जाने वाला पांच दिन तक चलने वाला त्यौहार दीपावली सिर्फ भैयादूज तक ही सीमित नहीं है बल्की ये त्योहार छठ तक चलता है। उत्तरप्रदेश और ख़ासकर बिहार में मनाया जाने वाला ये पर्व बेहद अहम है। वैसे तो ये त्यौहार पूरे देश में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। छठ चार दिनों तक चलता है इसलिए पर्व नहीं महा पर्व कहा जाता है।

छठ पूजा की शुरुआत किसने की इसके लिए कई ऐतिहासिक कहानियां प्रचलित हैं। पुराण में छठ पूजा के लिए राजा प्रियंवद की कहानी का उल्लेख किया गया है। उल्लेखनीय है कि राजा प्रियवंद को कोई संतान नहीं थी तब महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियंवद की पत्नी मालिनी को याहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन वो पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ। प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं और उन्होंने राजा से कहा कि क्योंकि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं। उन्होंने राजा को उनकी पूजा करने और दूसरों को पूजा के लिए प्रेरित करने को कहा।




राजा प्रियंवद ने पुत्र की प्राप्ति के कारन ये व्रत किया था और उन्हें व्रत के प्रभाव से पुत्र की प्राप्ति भी हुई। कहा जाता है कि ये पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी दिवस को हुई थी और तभी से हमारे यहां छठ पूजा प्रारम्भ हो गयी। राजा प्रियंवद के अलावा एक कथा भगवान राम-सीता से जुडी है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब राम-सीता 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे तो रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए उन्होंने ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूर्य यज्ञ करने का फैसला लिया। पूजा के लिए उन्होंने मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया । मुग्दल ऋषि ने मां सीता पर गंगा जल छिड़क कर पवित्र किया और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। जिसे सीता जी ने मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।




एक मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। जिसकी शुरुआत सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य की पूजा करके की थी। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे और वो रोज घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही परंपरा प्रचलित है। छठ पर्व के बारे में एक कथा और भी है। इस कथा के मुताबिक जब पांडव अपना सारा राजपाठ जुए में हार गए तब दौपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई थी और पांडवों को अपना राजपाठ वापस मिल गया था। लोक परंपरा के मुताबिक सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई।

आस्था सिंह की रिपोर्ट