सिंगल पैरेंट के बच्चे होते हैं अलग

आजकल आपने शब्द सुने होंगे सिंगल मदर और सिंगल फादर जिसका मतलब होता है कि मां और बाप दोनों ही भूमिका एक ही व्यक्ति निभा रहा है। सिंगल मदर मां के साथ—साथ पिता के फर्ज भी अदा करती है जबकि सिंगल फादर के मामले में पिता ही मां की भूमिका निभाता है। पश्चिमी देशों में सिंगल पैरेन्ट होना आम बात है, लेकिन पश्चिमी सभ्यता के पीछे चल रहे भारत जैसे विकासशील देशों में भी सिंगल पैरेंट्स की कहानियां सुनने को मिलने लगीं हैं।

दाम्पत्य जीवन में घुटन महसूस कर रहे जोड़े अक्सर तलाक की कगार पर पहुंच कर अपने रास्ते बदल लेते हैं। ऐसे में समस्या खड़ी होती है उनकी संतान के आगे। जिसके सामने चुनौती होती है किसी एक चुनाव की। ऐसी परिस्थितियों में फंसे बच्चे जब सिंगल पैरेंट के साथ बड़े होते हैं तो उनकी जिन्दगी उन आम बच्चों से बिलकुल अलग होती है जिन्हें मां और पिता दोनों का प्यार मिलता है।

बाल मनोचिकित्सक जीन पीएगेट और उनकी टीम द्वारा किए गए सर्वेक्षण में सामने आया है कि जिन बच्चों का पर​वरिश माता या पिता यानी किसी एक पैरेंट के हाथों होती है उनकी मानसिक स्थिति सामान्य बच्चों से बिलकुल अलग होती है। ऐसे बच्चे सामाजिक रूप से घुलना मिलना पसंद नहीं करते, जिसका प्रभाव भविष्य में उनकी प्रोफेशनल जिन्दगी पर पड़ता है।

इस सर्वेक्षण का हिस्सा रहीं लंदन की मनोचिकित्सक सकरी लेमोल के अनुसार किसी भी बच्चे के जीवन में माता और पिता दोनों की अहम भूमिका होती है। बच्चे के पूर्ण विकास के लिए जरूरी है कि उसे अपने माता और पिता दोनों प्यार मिले। किसी भी बच्चे के लिए माता—पिता सपोर्ट सिस्टम की तरह होता है। इसीलिये जब माता और पिता का अलगाव बच्चों की मानसिक स्थिति को बदल कर रख देता है। बच्चे धीरे—धीरे समाज से दूरी बनाना शुरू कर देते हैं।जिसका सीधा असर उसके करियर पर पड़ता है।

लेमोला बताती हैं की इस सर्वेक्षण के लिए 641 लोगों का चुनाव किया। जिनकी उम्र 18 से 66 साल के बीच थी। इनमें से 320 लोगों का पालन पोषण सिंगल पैरेंट के साथ हुआ। जब इन लोगों से पूछा गया कि क्या वे अपने निजी जीवन और प्रोफेशनल लाइफ से संतुष्ट हैं तो अधिकांश का जवाब नहीं यानी असं​तुष्टी के रूप में सामने आया।