सावधान! कहीं चीन का नकली हीरा तो नहीं खरीद रहे आप

नई दिल्ली: चीन से आये नकली हीरे भारत के बाजारों में छाने की तैयारियों में हैं। ये असली हीरों के मुकाबले चालीस प्रतिशत तक सस्ते हैं और देखने में बिल्कुल असली हीरों की तरह हैं कि बड़े से बड़ा जौहरी भी धोखा खा जाय लेकिन मुश्किल यह कि यह चाईनीज हीरा बुरे वक्त में आपके काम नहीं आयेगा क्योंकि इसकी रि-सेल वैल्यू जीरो है।

पिछले दो सालों में भारतीय ज्वैलरी मार्केट में डायमण्ड का बाजार तीस से बढ़कर चालीस प्रतिशत तक हो गया है तो अब चीन की बुरी नीयत इस पर पड़ने लगी है। उसने अपनी लैब में ऐसे नकली हीरे तैयार किये जिसकी शक्लसूरत बिल्कुल असली हीरों जैसी तो है लेकिन सीरत नहीं। फिर भी इनकी कीमत असली डायमण्ड की तुलना में चालीस प्रतिशत तक कम होने के कारण इनकी बिक्री जमकर हो रही है। यह बात अलग है कि असली डायमण्ड की तरह इस चायनीज डायमण्ड की कोई री-सेल वैल्यू नहीं हैं। यानि अगर भविष्य में आप इसे बेचकर पैसा हासिल करना चाहें तो आपको कोई मोल नहीं मिलेगा।



खदानों से निकलने वाले असली हीरे के बनने में दस लाख साल तक लग जाते हैं लेकिन चीन सीवीडी तकनीक से हीरे का निर्माण सिर्फ सौ घण्टे में कर लेता है। यही नहीं, अलग-अलग तरह के तत्व मिलाकर मनचाहे रंग का हीरा तैयार किया जा रहा है। जैसे बोरॉन मिलाने से नीला, नाइट्रोजन मिलाने से पीला और एक खास प्रक्रिया से हीरे में नाइट्रोजन वेकेंसी सेंटर बनाने से गुलाबी हीरा बन जाता है। हालाॅकि यह तकनीक सबसे पहले जर्मनी के फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट ने विकसित की थी लेकिन वृहद उत्पादन और मार्केटिंग के मामले में बाजी मारी चीन ने।

वो अब केमिकल वेपर डिपोजिशन यानि सीवीडी तकनीक से हर साल इतने हीरे बना रहा है जितने बनाने में प्रकृति को भी करोड़ों साल लग जायें। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया के मुल्कों में चीन हर रोज दस हजार से अधिक नकली हीरे खपा रहा है। इनका एक बड़ा हिस्सा भारत में भी पहुॅच रहा है। महिलाओं का कहना है कि अगर चीनी हीरा सस्ता हो तो इसे लेने में मुश्किल नहीं है लेकिन इसे कुदरती हीरा बताकर नहीं बेचा जाना चाहिये।

थोड़ी सी सावधानी लोगों को चायनीज डायमण्ड की हेराफेरी से बच सकते हैं। ग्राहकों को डायमण्ड खरीदते वक्त ज्वैलर्स से इण्टरनेशनल जेमोलाॅजिकल इन्स्टीट्यूट द्वारा जारी सर्टिफिकेट की माॅग करनी चाहिये। अगर हीरा असली है तो इसके विवरण में ‘‘ नेचुरल डायमण्ड’’ लिखा होगा जबकि सीवीडी तकनीक से मानवनिर्मित हीरे के लिये ‘‘ग्रोन इन लैबोटी’’ यानि लैब में तैयार लिखा होगा। लेकिन मुश्किल यह कि कई दुकानदार इस लाइन को लेजर तकनीक से हटा देते हैं। इसे लेकर कानपुर की महिलाऐं खासी परेशान है कि धनतेरस वे चाईनीज हीरे को कैसे पहचानेंगी।

भारत में हीरों की खदानें बन्द हुए अर्सा बीत चुका है। अब दक्षिण अफ्रीका कुदरती हीरों की खदानों का बड़ा केन्द्र है। फिर भी डायमण्ड प्रोसेसिंग इण्डस्टी यानि हीरा तराशने के मामले में भारतीय कारीगरों का कोई सानी नहीं। लेकिन जब बात लैब में नकली हीरे तैयार करने की हो तो चीन का कोई सानी नहीं।