स्मारक घोटाले में कुशवाहा और नसीमुद्दीन के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने की तैयारी में विजिलेंस

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2007 से 2012 तक सत्ता में रही मायावती सरकार के कार्यकाल के दौरान हुए 1400 करोड़ के स्मारक घोटाले में लोकायुक्त की सिफारिश पर 2013 में शुरू हुई विजिलेंस जांच की रिपोर्ट चार साल बाद शासन तक पहुंच गई है। विजिलेंस ने इस घोटाले की शिकायत में मुख्य आरोपी बनाए गए मायावती सरकार के मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकि और बाबू सिंह कुशवाहा के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने के लिए सरकार से अनुमति मांगी है।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक विजिलेंस ने यूपी सरकार से बाबू सिंह कुशवाहा और नसीमुद्दीन सिद्दीकि समेंत कुल 27 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने की अनुमति मांगी है। रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि 2007 से 2011 के बीच यूपी और नोएडा में बने तमाम स्मारकों और उद्यानों के निर्माण के लिए पत्थर की खरीद से लेकर ढ़ुलाई और तराशने के काम में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार किया गया। परियोजना की निगरानी की जिम्मेदारी उठाने वाले अधिकारियों ने पत्थर की खरीद के नाम पर दर्जनों बैठकें की लेकिन किसी भी बैठक में न तो पत्थर की गुणवत्ता को लेकर निर्णय लिए गए और न ही कीमत को लेकर।

लोकायुक्त जांच में नसीमुद्दीन और बाबू सिंह कुशवाहा की भूमिका पर उठे थे सवाल—

मायावती के मुख्यमंत्री रहते ही स्मारक घोटाले ने सिर उठा लिया था। आरटीआई(RTI) के माध्यम से सामने आई जानकारियों के आधार पर लोकायुक्त जस्टिस एनके मेहरोत्रा के सामने स्मारक निर्माण में पत्थर की खरीद फरोख्त में बड़े स्तर पर घोटाले की शिकायत की गई थी। लोकायुक्त के समक्ष की गई शिकायत में कुशवाहा और नसीमुद्दीन समेंत 199 लोगों को आरोपी बनाया गया था।

इन स्मारकों के निर्माण की निगरानी की जिम्मेदारी लोक निर्माण विभाग की इकाई निर्माण निगम कर रही थी, उस समय इस विभाग के मंत्री नसीमुद्दीन हुआ करते थे और पत्थरों के खनन में खनन मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा का पूरा हस्तक्षेप था। चूंकि नसीमुद्दीन और कुशवाहा की संलिप्तता के बिना उनके विभाग के अधिकारियों ने 1400 करोड़ के घोटाले को अंजाम नहीं दे सकते इसी आधार पर दोनों का नाम इस घोटाले से जोड़ा गया था।

लोकायुक्त की सिफारिश को मायावती ने दबाया था—

इस घोटाले की प्राथमिक जांच में लोकायुक्त ने भ्रष्टाचार के आरोपों को सही मानते हुए, सीबीआई जांच की सिफारिश की थी। अपने करीबी नसीमुद्दीन का नाम इस घोटाले में आने के चलते मायावती ने लोकायुक्त की सिफारिश को कई महीनों तक ठंडे बस्ते में डाले रखा। इस दौरान लोकायुक्त ने मुख्यमंत्री कार्यालय को कई बार अपनी सिफारिश पर कार्रवाई करने को लेकर पत्र भी लिखा गया लेकिन मायावती ने कोई कार्रवाई नहीं की।

देखते देखते इस घोटाले को दबाने को लेकर विपक्षी दल मायावती पर हावी भी हुए लेकिन मायावती ने अपनी हठ नहीं छोड़ी। 2012 में यूपी में विधानसभा चुनाव हुए और समाजवादी पार्टी ने माया सरकार के तमाम घोटालों की निष्पक्ष जांच कर दोषियों को जेल भेजने का आश्वासन देकर यूपी की जनता विश्वास जीतकर सत्ता हासिल कर ली।

अखिलेश सरकार में भी लोकायुक्त की सिफारिश पर लंबे समय बाद हुई कार्रवाई—

ऐसा कहा जाता है कि जिस घोटाले के आधार पर अखिलेश यादव ने मायावती पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे, उसी घोटाले को लेकर नसीमुद्दीन और अखिलेश यादव के बीच डील हो गई थी। अखिलेश यादव करीब एक वर्ष तक इस मामले में लोकायुक्त की सिफारिश को दबाए रहे। मीडिया ने भ्रष्टाचार के प्रति अखिलेश सरकार के रवैये और उनके चुनावी वादे की याद दिलाई तो उन्होंने खानापूर्ति के लिए लोकायुक्त की सिफारिश के आधार पर इस घोटाले की विजिलेंस जांच के आदेश कर दिए।

विजिलेंस जांच के आदेश से ही नसीमुद्दीन को मिल गई थी क्लीन चिट—

स्मारक घोटाले की जांच सीबीआई को न देकर विजिलेंस के हवाले करके ही अखिलेश सरकार सवालों के घेरे में आ गई थी। सियासी गलियारों में कहा जाने लगा था कि अखिलेश यादव ने अंदरखाने नसीमुद्दीन से डील कर ली है। इसीलिए अखिलेश यादव ने इतने बड़े घोटाले की जांच सीबीआई को न सौंपकर विजिलेंस जैसे ऐजेंसी को सौंपी है।

क्या योगी सरकार भी विजिलेंस जांच को मानेगी —

इस घोटाले को सामने आए करीब छह साल बीत चुके हैं। इस दौरान यूपी की सत्ता भाजपा के हाथ में हैं और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर योगी आदित्यनाथ बैठे हैं। जिन्हें भ्रष्टाचार और ​भ्रष्टाचारियों का विरोधी माना जाता है। ऐसी परिस्थितियों में हजारों करोड़ के भ्रष्टाचार की एक खोखली रिपोर्ट को यूपी सरकार किस हद तक स्वीकार करती है ये आने वाला समय ही तय करेगा। लेकिन इतना जरूर है कि योगी सरकार से उम्मीद है कि वह अब भी इस घोटाले की जांच नए सिरे से सीबीआई को सौंप सकती है।