कालापानी विवाद पर बोले CM त्रिवेंद्र सिंह रावत, कहा- एक इंच जमीन नहीं देंगे

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कालापानी विवाद पर बोले CM त्रिवेंद्र सिंह रावत, कहा- एक इंच जमीन नहीं देंगे

नई दिल्ली। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कुमाऊं के कालापानी को लेकर चल रहे विवाद पर कहा है कि भारत के हिस्से भारत में ही रहेंगे। कालापानी को लेकर नेपाल की जो प्रतिक्रिया आ रही है, वह उसकी संस्कृति से मेल नहीं खाती है। नेपाल, भारत का मित्र राष्ट्र है। उम्मीद है कि यह मसला बातचीत से सुलझा लिया जाएगा।

Cm Trivendra Singh Rawat Spoke On The Kalapani Dispute Said Will Not Give An Inch Of Land :

मुख्यमंत्री ने नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली के बयान पर प्रतिक्रिया दी, जिसमें उन्होंने कालापानी से भारत के सैनिकों को हटाने की बात कही थी। नेपाल के प्रधानमंत्री का आरोप है कि उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित कालापानी पर भारत ने अतिक्रमण किया है। केंद्र सरकार के हाल ही में जारी देश के नए मानचित्र में कालापानी को भारत का हिस्सा दर्शाया है।

इसके बाद नेपाल सरकार लगातार इसका विरोध कर रही है। नेपाल के प्रधानमंत्री ने सोमवार को इस विवादित मसले पर दिए बयान में भारत सरकार को तुरंत क्षेत्र खाली कर अपने सैनिकों को वापस बुलाने को कहा है। इसको लेकर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि जो बातें उठ रही हैं, उन्हें बातचीत के माध्यम से हल कर लिया जाएगा।

नेपाल भारत का मित्र राष्ट्र है, इसलिए बातचीत से मसला हल किया जा सकता है। उन्होंने नेपाल की कार्यसंस्कृति पर भी सवाल उठाया कि नेपाल की कार्यसंस्कृति इस तरह की नहीं है कि वह इस तरह से बात करे।

कालापानी पर क्या है विवाद?

उत्तराखंड राज्य की सीमा का 80.5 किलोमीटर हिस्सा नेपाल से लगता है, वहीं 344 किलोमीटर का हिस्सा चीन से लगा है। उत्तराखंड के पिथौड़ागढ़ ज़िले में 35 वर्ग किलोमीटर की ज़मीन है जो कालापानी कहलाता है। यह दरअसल काली नदी का उद्गम स्थल है। भारत ने इस हिस्से को अपने नक्शे में दिखाया है।

बीबीसी के मुताबिक 1816 में ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच सुगौली संधि हुई थी। तब काली नदी को पश्चिमी सीमा पर ईस्ट इंडिया और नेपाल के बीच रेखांकित किया गया था। 1962 में भारत और चीन में युद्ध हुआ तो भारतीय सेना ने कालापानी में चौकी बनाई।

वहीं नेपाल सरकार का दावा है कि 1961 के भारत-चीन युद्ध से पहले नेपाल ने यहां जनगणना करवाई थी। तब भारत ने कोई आपत्ति नहीं की थी। नेपाल के मुताबिक कालापानी में भारत की मौजूदगी सुगौली संधि का उल्लंघन है।

   

नई दिल्ली। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कुमाऊं के कालापानी को लेकर चल रहे विवाद पर कहा है कि भारत के हिस्से भारत में ही रहेंगे। कालापानी को लेकर नेपाल की जो प्रतिक्रिया आ रही है, वह उसकी संस्कृति से मेल नहीं खाती है। नेपाल, भारत का मित्र राष्ट्र है। उम्मीद है कि यह मसला बातचीत से सुलझा लिया जाएगा। मुख्यमंत्री ने नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली के बयान पर प्रतिक्रिया दी, जिसमें उन्होंने कालापानी से भारत के सैनिकों को हटाने की बात कही थी। नेपाल के प्रधानमंत्री का आरोप है कि उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित कालापानी पर भारत ने अतिक्रमण किया है। केंद्र सरकार के हाल ही में जारी देश के नए मानचित्र में कालापानी को भारत का हिस्सा दर्शाया है। इसके बाद नेपाल सरकार लगातार इसका विरोध कर रही है। नेपाल के प्रधानमंत्री ने सोमवार को इस विवादित मसले पर दिए बयान में भारत सरकार को तुरंत क्षेत्र खाली कर अपने सैनिकों को वापस बुलाने को कहा है। इसको लेकर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि जो बातें उठ रही हैं, उन्हें बातचीत के माध्यम से हल कर लिया जाएगा। नेपाल भारत का मित्र राष्ट्र है, इसलिए बातचीत से मसला हल किया जा सकता है। उन्होंने नेपाल की कार्यसंस्कृति पर भी सवाल उठाया कि नेपाल की कार्यसंस्कृति इस तरह की नहीं है कि वह इस तरह से बात करे। कालापानी पर क्या है विवाद? उत्तराखंड राज्य की सीमा का 80.5 किलोमीटर हिस्सा नेपाल से लगता है, वहीं 344 किलोमीटर का हिस्सा चीन से लगा है। उत्तराखंड के पिथौड़ागढ़ ज़िले में 35 वर्ग किलोमीटर की ज़मीन है जो कालापानी कहलाता है। यह दरअसल काली नदी का उद्गम स्थल है। भारत ने इस हिस्से को अपने नक्शे में दिखाया है। बीबीसी के मुताबिक 1816 में ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच सुगौली संधि हुई थी। तब काली नदी को पश्चिमी सीमा पर ईस्ट इंडिया और नेपाल के बीच रेखांकित किया गया था। 1962 में भारत और चीन में युद्ध हुआ तो भारतीय सेना ने कालापानी में चौकी बनाई। वहीं नेपाल सरकार का दावा है कि 1961 के भारत-चीन युद्ध से पहले नेपाल ने यहां जनगणना करवाई थी। तब भारत ने कोई आपत्ति नहीं की थी। नेपाल के मुताबिक कालापानी में भारत की मौजूदगी सुगौली संधि का उल्लंघन है।