कर्नल आशुतोष शर्मा को जिस दिन लौटना था घर, उस दिन शहीद होने की मिली ख़बर

Colonel Ashutosh Sharma
कर्नल आशुतोष शर्मा को जिस दिन लौटना था घर, उस दिन शहीद होने की मिली ख़बर

किसी को अपने पिता के लौटने का इंतज़ार था तो किसी को अपने बेटे का। किसी को अपने पति का तो किसी को अपने भाई और दोस्त का। जब आख़ीरी बार बातें हुई थीं तो जल्द लौटने का वादा किया था। घरवाले इंतज़ार में थे। वे लौटे भी। लेकिन तिरंगे में लिपटे हुए। लौटे उस गौरव और सम्मान के साथ जिसे हर देशवासी पाना चाहता है। अपनी मातृभूमि के लिए ख़ुद को क़ुर्बान तक कर देने का गौरव।

Colonel Ashutosh Sharma Had To Return Home The Day He Got The News Of Martyrdom :

आँसुओं के साथ यही गौरव उन पाँचों शहीदों के परिवार के लोगों में है जो जम्मू-कश्मीर के हंदवाड़ा में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हो गए। परिवारों को अपनों को खोने का दुख है तो देश के लिए जान तक न्यौछावर कर देने का गर्व भी। उन सभी परिवारों की अलग-अलग कहानियाँ हैं।

हंदवाड़ा में शहीद हुए 21 राष्ट्रीय राइफ़ल्स के कमांडिंग अफ़सर कर्नल आशुतोष शर्मा (44) की पत्नी पल्लवी शर्मा कहती हैं उनको रविवार को फ़ोन आया, लेकिन उनको इसकी आशंका पहले से ही हो गई थी। उन्होंने कहा, ‘मैं उनसे संपर्क नहीं कर पा रही थी। यूनिट में कॉल किया तो पता चला कि वह कहीं फँसे हुए हैं। किसी के कहीं फँसे होने पर जब इतना अधिक समय गुज़र जाए तो लगता है कि कुछ गड़बड़ है।’ कर्नल शर्मा से उनके बड़े भाई पीयूष और उनकी माँ से आख़िरी बार एक मई को तब बात की थी जब 21 राष्ट्रीय राइफ़ल्स का 26वाँ रेजिंग डे कार्यक्रम था। पल्लवी आख़िरी बार उनसे 28 फ़रवरी को तब मिली थीं जब उन्हें जम्मू के उधमपुर में एक समारोह में बहादुरी के लिए सेना मेडल से सम्मानित किया गया था।

पीयूष यह कहते हुए रो पड़े कि उन्होंने ऐसा नहीं सोचा था कि वह अपने भाई से इस तरह मिलेंगे। उन्होंने कहा, ‘उसने वादा किया था कि वह जल्द ही लौटेगा। वास्तव में वह आ रहा है, लेकिन तिरंगे में लिपटे हुए।’ पीयूष ने कहा कि वह भी सेना में शामिल होना चाहते थे लेकिन घर की मजबूरियों के कारण ऐसा नहीं कर सके। आशुतोष की 12 वर्षीय बेटी कहती हैं कि वह भी अपने पिता की तरह सेना में शामिल होंगी।

किसी को अपने पिता के लौटने का इंतज़ार था तो किसी को अपने बेटे का। किसी को अपने पति का तो किसी को अपने भाई और दोस्त का। जब आख़ीरी बार बातें हुई थीं तो जल्द लौटने का वादा किया था। घरवाले इंतज़ार में थे। वे लौटे भी। लेकिन तिरंगे में लिपटे हुए। लौटे उस गौरव और सम्मान के साथ जिसे हर देशवासी पाना चाहता है। अपनी मातृभूमि के लिए ख़ुद को क़ुर्बान तक कर देने का गौरव। आँसुओं के साथ यही गौरव उन पाँचों शहीदों के परिवार के लोगों में है जो जम्मू-कश्मीर के हंदवाड़ा में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हो गए। परिवारों को अपनों को खोने का दुख है तो देश के लिए जान तक न्यौछावर कर देने का गर्व भी। उन सभी परिवारों की अलग-अलग कहानियाँ हैं। हंदवाड़ा में शहीद हुए 21 राष्ट्रीय राइफ़ल्स के कमांडिंग अफ़सर कर्नल आशुतोष शर्मा (44) की पत्नी पल्लवी शर्मा कहती हैं उनको रविवार को फ़ोन आया, लेकिन उनको इसकी आशंका पहले से ही हो गई थी। उन्होंने कहा, 'मैं उनसे संपर्क नहीं कर पा रही थी। यूनिट में कॉल किया तो पता चला कि वह कहीं फँसे हुए हैं। किसी के कहीं फँसे होने पर जब इतना अधिक समय गुज़र जाए तो लगता है कि कुछ गड़बड़ है।' कर्नल शर्मा से उनके बड़े भाई पीयूष और उनकी माँ से आख़िरी बार एक मई को तब बात की थी जब 21 राष्ट्रीय राइफ़ल्स का 26वाँ रेजिंग डे कार्यक्रम था। पल्लवी आख़िरी बार उनसे 28 फ़रवरी को तब मिली थीं जब उन्हें जम्मू के उधमपुर में एक समारोह में बहादुरी के लिए सेना मेडल से सम्मानित किया गया था। पीयूष यह कहते हुए रो पड़े कि उन्होंने ऐसा नहीं सोचा था कि वह अपने भाई से इस तरह मिलेंगे। उन्होंने कहा, 'उसने वादा किया था कि वह जल्द ही लौटेगा। वास्तव में वह आ रहा है, लेकिन तिरंगे में लिपटे हुए।' पीयूष ने कहा कि वह भी सेना में शामिल होना चाहते थे लेकिन घर की मजबूरियों के कारण ऐसा नहीं कर सके। आशुतोष की 12 वर्षीय बेटी कहती हैं कि वह भी अपने पिता की तरह सेना में शामिल होंगी।