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स्मारक घोटाला: नसीमुद्दीन सिद्दकी और बाबू सिंह कुशवाहा के खिलाफ मिले साक्ष्य, शिकंजा कसने की तैयारी में विजिलेंस!

बसपा सरकार के दौरान हुए 1400 करोड़ रुपये के स्मारक घोटाले में तत्कालीन मंत्रियों पर शिकंजा कसने की तैयारी हो गयी है। विजिलेंस को जांच में कई अहम साक्ष्य मिले हैं, जिसके आधार पर उन पर कार्रवाई की जायेगी। सूत्रों की माने तो तत्कालीन दोनों मंत्रियों से जल्द ही पूछताछ भी शुरू होगी।

By मुनेंद्र शर्मा 
Updated Date

Commemorative Scam Evidence Found Against Naseemuddin Siddiqui And Babu Singh Kushwaha Vigilance In Readiness To Crack Down

लखनऊ। बसपा सरकार के दौरान हुए 1400 करोड़ रुपये के स्मारक घोटाले में तत्कालीन मंत्रियों पर शिकंजा कसने की तैयारी हो गयी है। विजिलेंस को जांच में कई अहम साक्ष्य मिले हैं, जिसके आधार पर उन पर कार्रवाई की जायेगी। सूत्रों की माने तो तत्कालीन दोनों मंत्रियों से जल्द ही पूछताछ भी शुरू होगी।

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विजिलेंस की जांच में तत्कालीन मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा और नसीमुद्दीन सिद्दकी के खिलाफ अहम साक्ष्य मिले हैं। दोनों नेताओं को एक जनवरी 2014 को गोमतीनगर थाने में दर्ज एफआईआर में भी नामजद किया गया था।

स्मारक घोटाले में विजिलेंस ने छह प्रमुख आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने और चार आरोपितों की गिरफ्तारी के बाद कई ऐसे अहम साक्ष्य जुटा लिए हैं, जो तत्कालीन मंत्रियों से पूछताछ का आधार बन रहे हैं। दरअसल, स्मारकों के निर्माण से जुड़े सभी अहम फैसलों में इन्हीं दो मंत्रियों की भूमिका रही है।

नसीमुद्दीन सिद्दकी के आवास पर होती ​थी ​मीटिंग
स्मारक निर्माण के लिए निर्माण निमग द्वारा कराए जा रहे कार्यों की समीक्षा तत्कालीन पीडब्ल्यूडी मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी द्वारा की जाती थी। निर्माण कार्य के संबंध में उच्चाधिकारियों की बैठक भी नसीमुद्दीन के आवास पर ही होती थी। इसके अलावा उनके द्वारा निर्माण कार्यों की मॉनिटरिंग भी की जाती थी। इसी तरह बाबू सिंह कुशवाहा के आवास पर भी उच्चाधिकारियों की बैठक होती थी। निर्माण संबंधी जो भी कार्य किए गए, उनमें दोनों मंत्रियों का सक्रिय योगदान था।

घोटालेबाज को मिलता था राजनैतिक संरक्षण
विजिलेंस की जांच में सामने आया कि स्मारक घोटाले में शामिल घोटालेबाजों को राजनैतिक संरक्षण प्राप्त था। इसमें सबसे अहम तत्कालीन संयुक्त निदेश खनन एसए फारुकी हैं। जिनके खिलाफ विजिलेंस ने करीब छह महीने पहले ही चार्जशीट दाखिल की थी। फारुकी 31 दिसंबर 2008 को रिटायर हो गए थे। इसके बाद उन्हें निदेशालय में सलाहकार बना दिया गया। 26 अप्रैल 2011 तक वह सलाहकार के पद पर रहे।
जांच में माना गया है कि उन्हें राजनैतिक प्रभावशाली व्यक्ति का संरक्षण प्राप्त था।

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