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अग्रिम जमानत का आधार कोरोना से डर से नहीं हो सकता , सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाई कोर्ट का फैसला

किसी भी व्यक्ति को जेल भेजने पर कोरोना से मौत हो सकती है। इसके डर की वजह से अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती है। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत पर फैसला केस की मेरिट के आधार पर किया जाना चाहिए।

By संतोष सिंह 
Updated Date

नई दिल्ली। किसी को जेल भेजने पर कोरोना से मौत हो सकती है। इसकी वजह से अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती है। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत पर फैसला केस की मेरिट के आधार पर किया जाना चाहिए। कोरोना संक्रम्ण होने से मौत के डर के चलते ऐसा नहीं किया जा सकता। बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बीते सप्ताह अपने एक आदेश में कहा था कि जेलों में कैदियों की अधिक संख्या होने और केसों में इजाफे के चलते अग्रिम जमानत दी जा सकती है। हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ यूपी सरकार ने अर्जी दाखिल की थी।

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मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस विनीत सरन और बीआर गवई की बेंच ने कहा कि आपको टिप्पणियों से परेशानी है। यह एकतरफा टिप्पणी थी कि सभी लोगों को अग्रिम बेल दिया जाना चाहिए। हम इस पर नोटिस जारी करेंगे, लेकिन स्टे नहीं लगाएंगे। लेकिन हम इस तरह के एकतरफा बयान पर रोक लगाते हैं। बता दें कि हाई कोर्ट ने 130 मामलों में आरोपी प्रतीक जैन को अग्रिम जमानत दे दी थी। इसके बाद से ही हाई कोर्ट के फैसले को लेकर बहस शुरू हो गई थी। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि जिस तरह से कोरोना के मामलों में तेजी दिख रही है, उससे किसी आरोपी को जेल भेजना उसकी जान के लिए जोखिम भरा हो सकता है।

इसके अलावा पुलिसकर्मियों, जेल कर्मचारियों और अन्य लोगों के लिए भी यह जोखिम भरा हो सकता है। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि ऐसे में आरोपियों को एक निश्चित अवधि के लिए अग्रिम जमानत दी जा सकती है। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के ही एक आदेश का जिक्र किया था। इसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि भारत में जेलें भरी हुई हैं। ऐसे में जेलों में भीड़ को कम किए जाने की जरूरत है। कैदिय़ों और पुलिस कर्मियों की सेहत को ध्यान में रखते हुए ऐसा फैसला लिया जाना चाहिए। चीफ जस्टिस एनवी रमाना की बेंच ने कहा था कि उन सभी कैदियों को जेल से बाहर करना चाहिए, जिन्हें बीते साल बेल या फिर पैरोल मिली है।

हाई कोर्ट ने कहा था कि आरोपी ही मर जाएगा तो कैसे चलेगा ट्रायल?

इसी फैसले का जिक्र करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि हम इस बात से आंखें बंद नहीं कर सकते कि यदि आरोपी जिंदा ही नहीं रहेंगे तो फिर उन पर केस कैसे चल सकेगा? ऐसे में उन्हें महामारी के दौर में जेल में रखने से इस बात के चांस बढ़ जाएंगे कि ट्रायल शुरू होने से पहले ही उनकी मौत हो जाए। बता दें कि यूपी में कोरोना की दूसरी लहर का कहर काफी ज्यादा देखने को मिला है। अब भी सूबे में कोरोना के 77,000 के करीब एक्टिव केस हैं। बीते 24 घंटे में भी राज्य में 4,000 के करीब नए मामले सामने आए हैं।

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