UPRNN के भ्रष्ट वित्तीय सलाहकार वीके प्रभाकर 300 करोड़ के साथ डकार गए कर्मचारियों का ​भविष्य

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UPRNN के भ्रष्ट वित्तीय सलाहकार वीके प्रभाकर 300 करोड़ के साथ डकार गए कर्मचारियों का ​भविष्य

Corrupt Financial Adviser Vk Prabhakar Causes Loss Of Rupees 300cr To Uprnn

लखनऊ। उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम (UPRNN) में ​गत सालों में हुए 300 करोड़ के एक घोटाले ने विभाग के सामने 700 करोड़ के वित्तीय संकट के रूप में सिर उठा लिया है। विभाग के चंद अधिकारियों ने वर्ष 2011—12 में प्रदेश सरकार के स्वास्थ, पर्यटन और शिक्षा विभाग के कुछ भवनों के निर्माण के ठेके में 300 करोड़ का घोटाला कर डाला। कागजों में भवनों का निर्माण होता रहा और अधिकारी ठेकेदारों की मिलीभगत से धीरे—धीरे 300 करोड़ डकार गए। घपला इनता बड़ा था कि विभाग के तत्कालीन वित्तीय कंट्रोलर विनोद कुमार प्रभाकर ने 2011—12 की बैलेंस शीट तक बनवाना उचित नहीं समझा। अपनी राजनीतिक पहुंच और घोटाले के धन के बल पर प्रभाकर ने इस घोटाले का दफन रखा। लेकिन जल्द ही वित्तीय लेखे जोखों के दस्तावजे पूरे न होने के कारण यूपीआरएनएन को सरकारी विभागों से काम मिलना बंद हो गया। तब जाकर प्रभाकर की कारगुजारी सामने आई। अब 2017 में सत्ता परिवर्तन के साथ उन तमाम विभागों ने यूपीआरएनएन पर अपने भवनों को हैंडओवर करने के लिए दावा ठोंक दिया है।

पिछले एक महीने से यूपीआरएनएन के एमडी से लेकर विभाग के तमाम जिम्मेदार अफसरों के सामने उन भवनों का निर्माण करवाना चुनौती बन गया है, जिनकी लागत के 300 करोड़ रूपए विभाग के अधिकारी पहले ही डकार चुके हैं। विभागीय अधिकारियों के अनुमान के मुताबिक 2011—12 में 300 करोड़ की लागत वाली बिल्डिंग 2018 तक पूरी होने तक 700 करोड़ की लागत में बनेगी। अब विभाग इतनी बड़ी रकम कहां से लाएगा एक यक्ष प्रश्न बन चुका है।

फिलहाल इस 700 करोड़ की समस्या का हल निकालने के लिए प्रदेश के मुख्य सचिव राजीव कुमार ने एक हाई लेविल कमिटी बनाई है। जिसमें प्रमुखा सचिव लोक निर्माण विभाग को अध्यक्ष बनाया गया है। एमडी यूपीआरएनएन और इंजीनियर इन चीफ को रखा गया है।

वित्तीय कंट्रोलर विनोद कुमार प्रभाकर ने किया पूरा खेल —

विभागीय सूत्रों की माने तो 300 करोड़ के घोटाले के मुख्य सूत्रधार यूपीआरएनएन में 10 साल तक वित्तीय कंट्रोलर रहने के बाद वित्तीय सलाहकार के पद पर आसीन विनोद कुमार प्रभाकर हैं। उन्होंने वाराणसी में शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यटन विभाग से भवनों के निर्माण के लिए मिली 300 करोड़ की रकम को दीक्षित और डीपी सिंह नाम के दो प्रोजेक्ट मैनेजरों की मदद से ठिकाने लगा दिया। वित्त नियंत्रक के रूप में प्रभाकर ने न तो कभी वाराणसी का दौरा किया और न ही कभी प्रोजेक्ट की प्रोग्रेस रिपोर्ट को विश्व​सनियता की जानकारी करने की जहमत उठाई।

आरोप है कि प्रभाकर ने प्रोजेक्ट्स के फंड रिलीज करने के लिए अपना मोटा कमीशन तय कर रखा था। प्रोजेक्ट मैनेजर कागजी रिपोर्ट बनाकर भेज देते थे और प्रभाकरन अपने कमीशन का पैकेट मिलने के बाद अगली किश्त जारी कर देते। नतीजा यह हुआ कि प्रोजेक्ट मैनेजरों ने ठेकेदारों की मिली भगत से पूरी बिल्डिंग कागजों पर खड़ी करके भुगतान कर दिया।

इसी घोटाले के चलते नहीं बनी 2011—12 की बैलेंस शीट —

विनोद कुमार प्रभाकर की सत्ता में पहुंच बहुत ऊंची थी। प्रदेश की सबसे बड़ी निर्माण इकाई का वित्तीय नियंत्रक होने के नाते विभागीय ​भ्रष्टाचार पर लगाम कसना उनकी जिम्मेदारी थी, लेकिन प्रभाकर ने अपनी ताकत को भ्रष्टाचार करने के नए रास्ते बनाने में किया। जब उनका भ्रष्टाचार 300 करोड़ के घोटाले के रूप में सामने आया तो उन्होंने विभाग के खातों की आॅडिट करवाने ठीक नहीं समझा। शायद प्रभाकर जानते थे कि सीए की आॅडिट में 300 करोड़ का घोटाला सामने आ जाएगा। इसीलिए उन्होंने साल 2011—12 की बैलेंस शीट ही नहीं बनने दी।

2011—12 की बैलेंस शीट ने विभाग को पहुंचाया ​नुकसान—

विभागीय कर्मचारियों की माने तो 2011—12 की बैलेंस शीट न होने की वजह से यूपीआरएनएन के कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग का लाभ नहीं मिल पाया। जिस समय राज्य सरकार सातवें वेतन आयोग को लागू करने की प्रक्रिया में थी, उस समय यूपीआरएनएन अपनी वित्तीय स्थिति को स्पष्ट नहीं कर पाया, परिणाम स्वरूप विभाग को सातवें वेतन आयोग का लाभ नहीं मिल पाया।

बैलेंस शीट नहीं तो काम भी नहीं —

जानकारों की माने तो 2011—12 की बैलेंस शीट न होने के कारण यूपीआरएनएन को ब्लैक​ लिस्ट कर दिया गया। जो निर्माण निगम केन्द्र व अन्य राज्यों में बड़े स्तर पर ठेके हासिल करती थी उसे वित्तीय लेखे जोखे पेश न कर पाने के चलते टेंडरिंग का हिस्सा बनने का मौका नहीं बना। जिस वजह से विभाग को वित्तीय स्तर पर बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।

वर्तमान में वित्तीय सलाहकार हैं प्रभाकर —

10 सालों तक यूपीआरएनएन के वित्तीय कंट्रोलर रहे विनोट कुमार प्रभाकर पिछले तीन सालों से वित्तीय सलाहाकार के रूप में पदासीन। अब सवाल उठता है कि जिस विनोद कुमार ने वित्तीय कंट्रोलर के रूप में 300 करोड़ के एक घोटाले को अंजाम देने के बाद कर्मचारियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया और फिर विभाग को बद्नाम करवाने में अहम भूमिका निभाई, उसे वित्तीय सलाहकार बनाने का फैसला किसने लिया। ऐसे अधिकारी को दंडित करने के बजाय पुरस्कृत करने की आवश्यकता किसे महसूस हुई। आखिर इस अधिकारी को भ्रष्टाचार के आरोपों फंसा होने बाद भी अनिवार्य सेवानिवृति क्यों नहीं दी गई?

लखनऊ। उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम (UPRNN) में ​गत सालों में हुए 300 करोड़ के एक घोटाले ने विभाग के सामने 700 करोड़ के वित्तीय संकट के रूप में सिर उठा लिया है। विभाग के चंद अधिकारियों ने वर्ष 2011—12 में प्रदेश सरकार के स्वास्थ, पर्यटन और शिक्षा विभाग के कुछ भवनों के निर्माण के ठेके में 300 करोड़ का घोटाला कर डाला। कागजों में भवनों का निर्माण होता रहा और अधिकारी ठेकेदारों की मिलीभगत से धीरे—धीरे 300 करोड़ डकार…