अपराध की ‘अंधी सुरंग’ में अमेठी का युवा!

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अमेठी। अमेठी नगरी एक ऐसे सुनहरे अतीत का नाम है जिस पर कोई भी बिना गर्व किये नही रह सकता लेकिन संत कबि बाबा पुरषोत्तम दास,जायसी औऱ मीर शाह की जन्मभूमि ही आज मलिन होती सी दिखायी पड़ रही है। अमेठी जनपद एक समय में शांति का गढ़ माना जाता था कहा जाता है कि एक समय था जब सरकारी नुमाईंदे जिनकी अमेठी पदस्थापना होती थी, वह अमेठी में महज छः माह ही बिताने के उपरांत यह सोच लेते थे कि अमेठी में ही बसा जाये, क्योंकि उन्हें लगता था कि अमेठी में आपसी सौहार्द्र, भाईचारा और शांति उनके लंबे जीवन के लिये वाकई सुकून दे सकती है।

Crime In Amethi Uttar Pradesh :

कुछ वरिष्ठ और बुद्धिमान जन बताते है कि नब्बे के दशक के आगाज़ के साथ ही अमेठी में अपराधिक तत्वों ने दस्तक दी अमेठी में अपराध का ग्राफ शनैः शनैः तेज गति से बढ़ता ही चला गया। दरअसल, राजनैतिक संरक्षण के चलते आपराधिक तत्वों के हौसले बुलंदी पर आये और लोगों का जीना मुहाल हो गया।

लगभग इक्कीसवीं सदी के आगाज़ के साथ ही अमेठी में मादक पदार्थ,सट्टा,विशेषकर ड्रग्स तस्करी चढ़कर बोलने लगी जंगलों में जुए की फड़ जमने लगी। गौकशी के लिये गौवंश का निर्यात जोरों पर हुआ, युवा में ड्रग्स के लत ने लोगों के घरों को बर्बाद कर दिया, शराब का प्रचलन जमकर हो गया कुल मिलाकर अमेठी जिले में अमन चैन पूरी तरह समाप्त ही प्रतीत होने लगा।

अमेठी में एक के बाद एक ड्रग्स तस्कर पकड़ाये, पुलिस ने इनकी मश्कें कसीं,फिर भी वर्तमान में नशे की तस्करी चरम पर ही कहा जा रहा है कम समय में ज्यादा पैसा कमाने की चाह में अमेठी के युवा,जुआ सट्टे के मकड़जाल में उलझकर रह गये हैं लंबा समय बीत गया है पर पुलिस इन मामले में मौन ही नजर आ रही है।

वहीं एक बात और भी है कि बिना आग के धुंआ नहीं उठता। हाल ही में जनपद के आलाधिकारियों ने अपने मातहतों को ड्रग्स तस्करी और नशे खिलाफ सख्त कार्यवाही करने के निर्देश दिया। लेकिन निर्देश दिए जाने के बाद भी हालात जस के तस ही नजर आ रहे हैं। ये निर्देश कहीं न कहीं इस बात की चुगली भी करते दिखते हैं कि ड्रग्स तस्करीे के मामले में थाना-चौकी की पुलिस प्रभावी कार्यवाही नहीं कर पा रही है।

वहीं, रोजगार के साधनों के अभाव और खेल प्रतियोगिताओं के न होने से युवाओं का पथ भ्रष्ट होना स्वाभाविक ही है। एक समय था जब साल भर किसी न किसी खेल की स्पर्धाएं हुआ करती थीं, कभी प्रदेश या जनपद स्तर पर तो कभी खेल संगठनों के द्वारा। आज सभी के मौन रहने से युवाओं का रूझान अन्य दिशाओं में भटकना स्वाभाविक ही है।

आखिर क्या वजह है कि इन युवाओं के पालकों को भी इनके भविष्य की चिंता नहीं सता रही है? लगभग एक दशक पहले जब ये बच्चे रहे होंगे तब इनके पालकों ने निश्चित तौर पर यही सोचा होगा कि आगे चलकर ये जिम्मेदार नागरिक बनेंगे, पर आज का परिदृश्य कुछ और ही नजर आ रहा है।

एक जिम्मेदार नागरिक बनने के बजाय इनमें से अधिकांश युवा कम समय में ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की चाहत मन में पालते दिख रहे हैं। इनमें से अधिकांश राजनैतिक तौर पर किसी न किसी को माईबाप बनाये हुए हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि राजनैतिक तौर पर सक्रिय साहेबान भी अमेठी को जंगलराज लाने पर ही आमादा हैं कोई जनसेवक बनने की चाह मन में रख रहा है और कमर में कमरबंद (बेल्ट) के साथ रिवॉल्वर टांगे घूम रहा है तो कोई अवैध कट्टों को खिलौने की तरह उपयोग करने वालों के सिर पर अपना हाथ रखे हुए है।

मोबाईल और इंटरनेट के युग के सकारात्मक परिणाम तो हैं पर युवा पीढ़ी इनके नकारात्मक परिणामों की ओर बढ़ती दिख रही है। माता-पिता की चोरी से युवा वर्ग अपने, न जानने वाले किसी साथी से भी घंटो बतियाते रहते हैं। अंत में यह रिश्ता अवैध शारीरिक संबंधों में तब्दील हो जाता है फिर आरंभ होता है युवती को ब्लेकमेल करने का सिलसिला, अपनी इज्जत को बचाने के चक्कर में किशोरियां तबाह हो जाती हैं ऐसे एक नहीं,अनेकों वाक्ये जनपद की फिजां में तैर रहे हैं।

आज हमें ही सोचना होगा, अमेठी के हर प्रौढ़ और उमर दराज व्यक्ति को सोचना ही होगा कि आखिर क्या वजह है कि युवा पीढ़ी पढ़ाई लिखाई से दूर भागकर हाथ में हथियार उठाने को फैशन मानने लगी है आज समाज को इस दिशा में सोचना अत्यावश्यक है, वरना अमेठी के युवा जिस अंधेरी सुरंग में तेजी से दौड़ लगा रहे हैं, उसका दूसरा मुहाना बंद है इस तरह की दौड़ की परिणिति बीच-बीच में किसी तरह के हत्याकांड के रूप में सामने आये तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

यह वाकई बेहद संवेदनशील मामला है इसके लिये समाज को ही आगे आना होगा। सामाजिक तौर पर ही नैतिक पतन के क्षरण को रोकने की बात होना चाहिये सांसद विधायक सहित सभी जनसेवक और जनसेवक बनने का सपना देखने वालों को भी यह सोचना आवश्यक है कि इस तरह के कारनामो को सियासी प्रश्रय न दिया जाये आखिर उनके बच्चे भी कल जवां होंगे और वे भी इसी परिवेश में ही पलेंगे तब उनका क्या हाल होगा, यह बात भी उन्हें ध्यान में रखना अहम ही है।

रिपोर्ट-राम मिश्रा

अमेठी। अमेठी नगरी एक ऐसे सुनहरे अतीत का नाम है जिस पर कोई भी बिना गर्व किये नही रह सकता लेकिन संत कबि बाबा पुरषोत्तम दास,जायसी औऱ मीर शाह की जन्मभूमि ही आज मलिन होती सी दिखायी पड़ रही है। अमेठी जनपद एक समय में शांति का गढ़ माना जाता था कहा जाता है कि एक समय था जब सरकारी नुमाईंदे जिनकी अमेठी पदस्थापना होती थी, वह अमेठी में महज छः माह ही बिताने के उपरांत यह सोच लेते थे कि अमेठी में ही बसा जाये, क्योंकि उन्हें लगता था कि अमेठी में आपसी सौहार्द्र, भाईचारा और शांति उनके लंबे जीवन के लिये वाकई सुकून दे सकती है।कुछ वरिष्ठ और बुद्धिमान जन बताते है कि नब्बे के दशक के आगाज़ के साथ ही अमेठी में अपराधिक तत्वों ने दस्तक दी अमेठी में अपराध का ग्राफ शनैः शनैः तेज गति से बढ़ता ही चला गया। दरअसल, राजनैतिक संरक्षण के चलते आपराधिक तत्वों के हौसले बुलंदी पर आये और लोगों का जीना मुहाल हो गया।लगभग इक्कीसवीं सदी के आगाज़ के साथ ही अमेठी में मादक पदार्थ,सट्टा,विशेषकर ड्रग्स तस्करी चढ़कर बोलने लगी जंगलों में जुए की फड़ जमने लगी। गौकशी के लिये गौवंश का निर्यात जोरों पर हुआ, युवा में ड्रग्स के लत ने लोगों के घरों को बर्बाद कर दिया, शराब का प्रचलन जमकर हो गया कुल मिलाकर अमेठी जिले में अमन चैन पूरी तरह समाप्त ही प्रतीत होने लगा।अमेठी में एक के बाद एक ड्रग्स तस्कर पकड़ाये, पुलिस ने इनकी मश्कें कसीं,फिर भी वर्तमान में नशे की तस्करी चरम पर ही कहा जा रहा है कम समय में ज्यादा पैसा कमाने की चाह में अमेठी के युवा,जुआ सट्टे के मकड़जाल में उलझकर रह गये हैं लंबा समय बीत गया है पर पुलिस इन मामले में मौन ही नजर आ रही है।वहीं एक बात और भी है कि बिना आग के धुंआ नहीं उठता। हाल ही में जनपद के आलाधिकारियों ने अपने मातहतों को ड्रग्स तस्करी और नशे खिलाफ सख्त कार्यवाही करने के निर्देश दिया। लेकिन निर्देश दिए जाने के बाद भी हालात जस के तस ही नजर आ रहे हैं। ये निर्देश कहीं न कहीं इस बात की चुगली भी करते दिखते हैं कि ड्रग्स तस्करीे के मामले में थाना-चौकी की पुलिस प्रभावी कार्यवाही नहीं कर पा रही है।वहीं, रोजगार के साधनों के अभाव और खेल प्रतियोगिताओं के न होने से युवाओं का पथ भ्रष्ट होना स्वाभाविक ही है। एक समय था जब साल भर किसी न किसी खेल की स्पर्धाएं हुआ करती थीं, कभी प्रदेश या जनपद स्तर पर तो कभी खेल संगठनों के द्वारा। आज सभी के मौन रहने से युवाओं का रूझान अन्य दिशाओं में भटकना स्वाभाविक ही है।आखिर क्या वजह है कि इन युवाओं के पालकों को भी इनके भविष्य की चिंता नहीं सता रही है? लगभग एक दशक पहले जब ये बच्चे रहे होंगे तब इनके पालकों ने निश्चित तौर पर यही सोचा होगा कि आगे चलकर ये जिम्मेदार नागरिक बनेंगे, पर आज का परिदृश्य कुछ और ही नजर आ रहा है।एक जिम्मेदार नागरिक बनने के बजाय इनमें से अधिकांश युवा कम समय में ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की चाहत मन में पालते दिख रहे हैं। इनमें से अधिकांश राजनैतिक तौर पर किसी न किसी को माईबाप बनाये हुए हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि राजनैतिक तौर पर सक्रिय साहेबान भी अमेठी को जंगलराज लाने पर ही आमादा हैं कोई जनसेवक बनने की चाह मन में रख रहा है और कमर में कमरबंद (बेल्ट) के साथ रिवॉल्वर टांगे घूम रहा है तो कोई अवैध कट्टों को खिलौने की तरह उपयोग करने वालों के सिर पर अपना हाथ रखे हुए है।मोबाईल और इंटरनेट के युग के सकारात्मक परिणाम तो हैं पर युवा पीढ़ी इनके नकारात्मक परिणामों की ओर बढ़ती दिख रही है। माता-पिता की चोरी से युवा वर्ग अपने, न जानने वाले किसी साथी से भी घंटो बतियाते रहते हैं। अंत में यह रिश्ता अवैध शारीरिक संबंधों में तब्दील हो जाता है फिर आरंभ होता है युवती को ब्लेकमेल करने का सिलसिला, अपनी इज्जत को बचाने के चक्कर में किशोरियां तबाह हो जाती हैं ऐसे एक नहीं,अनेकों वाक्ये जनपद की फिजां में तैर रहे हैं।आज हमें ही सोचना होगा, अमेठी के हर प्रौढ़ और उमर दराज व्यक्ति को सोचना ही होगा कि आखिर क्या वजह है कि युवा पीढ़ी पढ़ाई लिखाई से दूर भागकर हाथ में हथियार उठाने को फैशन मानने लगी है आज समाज को इस दिशा में सोचना अत्यावश्यक है, वरना अमेठी के युवा जिस अंधेरी सुरंग में तेजी से दौड़ लगा रहे हैं, उसका दूसरा मुहाना बंद है इस तरह की दौड़ की परिणिति बीच-बीच में किसी तरह के हत्याकांड के रूप में सामने आये तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये।यह वाकई बेहद संवेदनशील मामला है इसके लिये समाज को ही आगे आना होगा। सामाजिक तौर पर ही नैतिक पतन के क्षरण को रोकने की बात होना चाहिये सांसद विधायक सहित सभी जनसेवक और जनसेवक बनने का सपना देखने वालों को भी यह सोचना आवश्यक है कि इस तरह के कारनामो को सियासी प्रश्रय न दिया जाये आखिर उनके बच्चे भी कल जवां होंगे और वे भी इसी परिवेश में ही पलेंगे तब उनका क्या हाल होगा, यह बात भी उन्हें ध्यान में रखना अहम ही है।रिपोर्ट-राम मिश्रा