क्या आप जानते हैं डाटा भरने से Pen Drive का वज़न घटता है?

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क्या डाटा के भरते जाने से यूएसबी ड्राइव के वज़न पर भी कुछ असर पड़ता है। इस सवाल के एक नहीं, अलग अलग जवाब मिलते हैं। कोई कहता है कि डाटा से यूएसबी का वज़न कैसे बढ़ सकता है। डाटा तो अंकों से भरा होता है जिसे किलो या ग्राम में कैसे नापा जा सकता है। तो वहीं, ऐसे दावे भी किए जाते हैं जिसके मुताबिक डाटा ट्रांसफर करने से पेन ड्राइव भारी नहीं, हलका महसूस करती है।

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के कम्प्यूटर साइंटिस्ट डॉ पीटर बेंटले के मुताबिक – यूएसबी ड्राइव, फ्लैश मेमरी का इस्तेमाल करती हैं। इसका मतलब है कि हमारे डाटा को 1 और 0 की संख्या में ट्रांसज़िस्टर में स्टोर किया जाता है। जब हम डाटा सेव करते हैं तो बायनरी जीरो ट्रांसज़िस्टर को चार्ज करने से सेट होता है और बायनरी 1 चार्ज हटाने से। चार्ज करने के लिए हम इलेक्ट्रोन्स को एड करते हैं और एक इलेक्ट्रोन्स का वज़न होता है।

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0.00000000000000000000000000091 ग्राम. यानि खाली यूएसबी – जिसमें जीरो ज्यादा होते हैं का वज़न भरी यूएसबी से कहीं ज्यादा होता है (जिसमें 1 और 0 होते हैं)। बेंटले के हिसाब से जब ड्राइव में डाटा बढ़ता है, तो वजन घटता है। हालांकि इस वज़न को नापना काफी मुश्किल है। एक इलेक्ट्रोन का वज़न इतना कम होता है कि आपको धरती की सारी पेन ड्राइव्स इकट्ठा करने के बाद ही पता चल पाएगा कि दरअसल आपकी पेन ड्राइव का वज़न कितना कम हुआ है।

ऊपर दिए गए एक इलेक्ट्रोन के वज़न पर नजर डालें तो एक मिलीग्राम के अतिरिक्त वज़न के लिए भी आपको 100 करोड़ फ्लैश ड्राइव्स चाहिए, जिसमें से हर एक में 1,000,000,000,000,000 एक्स्ट्रा इलेक्ट्रोन्स होना चाहिए। वज़न को महसूस करने के लिए, मान लीजिए 100 ग्राम के लिए आपको 1,000,000,000,000,000,000 फ्लैश ड्राइव्स चाहिए जिसमें अतिरिक्त इलेक्ट्रोन्स भी होने चाहिए।

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क्या डाटा के भरते जाने से यूएसबी ड्राइव के वज़न पर भी कुछ असर पड़ता है। इस सवाल के एक नहीं, अलग अलग जवाब मिलते हैं। कोई कहता है कि डाटा से यूएसबी का वज़न कैसे बढ़ सकता है। डाटा तो अंकों से भरा होता है जिसे किलो या ग्राम में कैसे नापा जा सकता है। तो वहीं, ऐसे दावे भी किए जाते हैं जिसके मुताबिक डाटा ट्रांसफर करने से पेन ड्राइव भारी नहीं, हलका महसूस करती है। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन…
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