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आखिर क्यों किया जाता है पिंडदान, इसके बाद ही क्यों मिलती है मृत आत्माओं को शांति…

By आराधना शर्मा 
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Dead Souls Get Peace Only After Performing Pindadan

लखनऊ: बिहार की राजधानी पटना से करीब 104 किलोमीटर दूर स्थित गया ना सिर्फ हिंदुओं के पिंड दान के लिए मशहूर है बल्कि बौद्ध धर्म के अनुयायी भी देश-विदेश से यहां आते हैं। मान्यताओं के अनुसार गया में ही गौतम बुद्ध को ज्ञान मिला था।

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जबकि हिंदू धर्म के लोग गया को मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति का पावन स्थल मानते हैं। यही वजह है कि अपने मृत परिजनों की आत्मा की शांति लिए ज्यादातर हिंदू धर्म के लोग गया आते हैं।

साथ ही साथ यहां पर उनके लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। लेकिन हर इंसान मरने के बाद गया में ही अपना पिंडदान क्यों चाहता है इसका उल्लेख हमारे धार्मिक ग्रंथों में किया गया है।

गरुड़ पुराण में गया तीर्थ का वर्णन

गया तीर्थ को लेकर गरुड़ पुराण में जो उल्लेख मिलता है उसके अनुसार मृतकों के लिए गया में श्राद्ध करने मात्र से ही वो संसार सागर से मुक्त होकर भगवान विष्णु की कृपा से उत्तम लोक में जाते हैं।

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मान्यता है कि यहां पिंडदान करने मात्र से व्यक्ति की सात पीढ़ी और एक सौ कुल का उद्धार हो जाता है। गया तीर्थ के महत्व को भगवान राम ने भी स्वीकार किया है।

वायु पुराण के अनुसार मकर संक्रांति और ग्रहण के समय जो श्राद्ध और पिण्डदान किया जाता है वह श्राद्ध करने वाले और मृत व्यक्ति दोनों के लिए ही कल्याणकारी और उत्तम लोकों में स्थान दिलाने वाला होता है।

सीता ने गया में किया था राजा दशरथ का पिंडदान

वाल्मिकी रामायण के अनुसार वनवास के दौरान भगवान राम,लक्ष्मण और सीता पितृ पक्ष में श्राद्ध करने के लिए गया धाम पहुंचे और इसके लिए आवश्यक सामग्री इकट्ठा करने के लिए राम और लक्ष्मण नगर की ओर चल दिए।

जबकि सीताजी गया धाम में फल्गू नदी के किराने दोनों के वापस लौटने का इंतजार कर रही थीं। पिंडदान का समय निकला जा रहा था तभी राजा दशरथ की आत्मा ने पिंडदान की मांग कर दी।

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समय को हाथ से निकलता देख सीता जी ने फल्गू नदी के साथ वटवृक्ष, केतकी के फूल और गाय को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर स्वर्गीय राजा दशरथ के निमित्त पिंडदान दे दिया।

लेकिन श्रीराम और लक्ष्मण जब वापस लौटे तो सीता ने पिंडदान की बात बताई जिसके बाद श्रीराम ने सीता से इसका प्रमाण मांगा। सीता जी ने जब फल्गू नदी, गाय और केतकी के फूल से गवाही देने के लिए कहा तो तीनों अपनी बात से मुकर गए, सिर्फ वटवृक्ष ने ही सीता के पक्ष में गवाही दी।

जिसके बाद सीता जी ने दशरथ का ध्यान करके उनसे ही गवाही देने की प्रार्थना की। सीताजी की प्रार्थना सुनकर स्वयं दशरथ जी की आत्मा ने यह घोषणा की कि सीता ने ही उन्हें पिंडदान दिया।

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