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पुण्यतिथि विशेष: वो शख्स जिसकी गजलें सल्तनत के नाम एक बयान होती थीं

By शिव मौर्या 
Updated Date

नई दिल्ली। कहने को तो वो आज के दिन 30 दिसम्बर को इस दुनिया से विदा हो गयें थे। पर आज भी हर सरकार में वो अपनें कविताओं, गजलों के माध्यम से विपक्ष की भूमिका अदा कर रहें हैं। वर्तमान समय में देशवासी मजबूत विपक्ष की राहें तक रहे हैं लेकिन वह कहीं नजर नहीं आ रहा है। देश में किसान आन्दोलन जब अपने चरम सीमा पर है तब वो और प्रासंगिक हो जाते हैं। हम बात कर रहें है, आन्दोलनकारियों की मुखर आवाज, युवा छात्रनेताओं के भाषण में वजन बढ़ा देने वाले, हिन्दुस्तान को देखने लायक तो सही पर हसींन ना मानने वाले, हिन्दी गजलों के नायक दुष्यंत कुमार की। दुष्यंत लिखतें है…

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                             तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं
                         कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं
                          मैं बेपनाह अँधेरों को सुब्ह कैसे कहूँ
                          मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं
                         बहुत मशहूर है आएँ ज़रूर आप यहाँ
                          ये मुल्क देखने लायक़ तो है हसीन नहीं

देश ने इन्दिरा के शासन काल में जब आपातकाल का दंश झेला था इस घटना क्रम के समय को लेकर व सरकार के विरोध में लिखते हुए उन्होने पुरे हिन्दुस्तान को चिथड़ा पहनाने का काम किया था….

 एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है
                         आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है
                         कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए
                         मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है
                         मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ
                         हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है

सरकारों के द्वारा दिये जाने वाले लुभावने प्रस्तावों पर भी वो कड़ा प्रहार करते नजर आते है,

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 कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
                           कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये
                         न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
                        ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये

दुष्यंत ने प्रेम,विरोधाभास समेत तमाम विषयों पर कवितायें लिखी है,जब तक ये धरती रहेगी वो हमारे बीच जिन्दा रहेंगे।

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