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ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था में अव्यवस्थित लॉकडाउन

Disorganized Lockdown In Rural Banking System

By रवि तिवारी 
Updated Date

राष्ट्रीयकृत बैंको की ग्रामीण शाखाओं की कार्यप्राली और लॉकडाउन के नियमों के बीच तालमेल बैठाना चुनौतीपूर्ण है। वहाँ के निवासी मूलभूत तरीके से महामारी और लॉकडाउन के विषय में अल्पज्ञान रखते हैं। उन्हें समझाना एवं नियमानुसार पालन करवाना बहुत मुश्किल है। दूसरी ओर समस्या यह भी है कि कई क्षेत्र में बैंक के परिसर भी काफी छोटे होते है वहाँ ग्राहकों में दूरी बनवा पाना संघर्षशील है।

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वैसे तो बैंक देश की अर्थ्यव्यवस्था की बहुत ही महत्वपूर्ण इकाई है। यह एक प्रकार की ऐसी कड़ी है जो समाज के ज्यादातर तबके को सरकारी आर्थिक योजनाओ से जोड़ने का काम करती है। इसी क्रम को देखते हुए जब देश में महामारी के हालात से निपटने के लिए लॉकडाउन जैसे गंभीर कदम उठाये गए तब कुछ चंद सेवाओं को जारी रखने का फैसला लिया गया जिसमे कि बैंक भी है। यह एक महत्वपूर्ण और जोखिम भरा कदम है। महत्वपूर्ण इसलिए क्यूंकि लॉकडाउन के चलते समाज में आर्थिक तंगी से कोई और मूलभूत सेवा प्रभावित न हो। जोखिम भरा इसलिए हैं क्यूंकि मुद्रा के रूप में नोट और सिक्के सबसे ज्यादा संक्रमित होते है और तो और बैंक में हर प्रकार के ग्राहक आते है तब ये आकलन करना कठिन हो जाता है ग्रामीण शाखा में कार्यरत बैंककर्मी कितने असंक्रमित रहेंगे।

होली के अगले हफ्ते में ही उत्तरप्रदेश के एक कसबे में कोरोना महामारी के टेस्ट में एक व्यापारी, जो कि बाहर देश से आया था, पॉजिटिव मिला। खबर आग की तरह एक ही दिन में पूरे कसबे में फ़ैल गयी। कसबे के सबसे पुराने और बड़े बैंक के सभी कर्मचारी भी इसे लेकर सतर्क हो गए। वहां के ग्राहको में भी थोड़ी हलचल देखने को मिली। तभी पैसे निकालने आये ग्राहकों में एक बुजुर्ग सज्जन ने लाइन में लगने से मना कर दिया। बैंक गार्ड और ड्यूटी पर लगे पुलिसकर्मी से भी वो भिड़ गए। थोड़ा होहल्ला करने के बाद सबसे आखिरी में पेमेंट लिया। तभी केशियर ने उन्हें समझाते हुए बताया कि उनके इस रवैये से लाइन में खड़े लोगों के बीच हड़कंप मच सकता है और तब सबके लिए उस भीड़ को संभालना मुश्किल हो जाता। और तो और पेमेंट में ली गयी ये नोट ज्यादा संक्रमित है इसलिए थोड़ा सावधानी बरते।

इसके उपरांत कुछ दिनों बाद लॉकडाउन घोषित हो गया। गरीबी और रोज़गारी की किल्लत के असर से निपटने के लिए सरकार ने 500, 1000 आदि रूपए, कोविद रहत कोष, सब्सिडी, वजीफा, पैंशन और किसानी वाले पैसे के रूप में जनधन खातों में भेजना शुरू कर दिया। सरकार की तरफ से राहतपूर्ण निर्णय यह था की बैंक में लेन-देन और पैसा ट्रांसफर के अतिरिक्त अन्य कोई काम नहीं होगा। लेकिन उससे भीड़ पर कोई विशेष असर नहीं हुआ बल्कि भीड़ और बढ़ गयी है।

इसके अतिरिक्त भीड़ का स्वरुप भी बदल गया। पहले भीड़ में जो लोग थे वो थोड़े मध्यम वर्ग के थे जो थोड़े समझदार और पढ़े-लिखे थे। पर अब माहौल बिलकुल अलग है, अब जो भीड़ है उसकी प्राथमिकता भी अलग है। यह प्राथमिकताएं उनकी गरीबी ने उनके लिए तय की है। फिलहाल बैंक की शाखाओं के बाहर लम्बी लाइने लगनी शुरू हो गयी खासकर समाज के उन तबको की जिसे भूख और बीमारी के बीच लड़ाई लड़नी पड़ रही है। उसे महामारी का इतना डर नहीं है जितना कि भूख और पालन पोषण का।

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यह बैंककर्मियों के लिए अलग तरह की चुनौती है खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में। चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि उस भीड़ को पैसा मिले और बैंकिंग सेवाओं का लाभ पहुँचाये। सबसे मुश्किल ये है की वो कैसे बिना किसी से संक्रमित होकर बचे रहे। साथ ही साथ ग्राहकों को भी एक दूसरे से संक्रमित होने से बचाये। ग्रामीण क्षेत्र में लोगो के बीच जानकारी का बहुत अभाव है उन्हें बीमारी के बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता सिर्फ बैंक गार्ड ने मुँह पर कपड़ा रखने को कहा तो रख लिया उससे ज्यादा कोई भी सावधानी नहीं।

यह एक मुश्किल स्थिति होती है कि आप उनपर लगातार दूरी बनाये रखने और मुँह पर कपड़ा लगाने का दबाव बना पाए। बैंककर्मी, गार्ड और पुलिस के सहयोग से बैंक के भीतर उनमें दूरी बनवायी जाती है पर हास्यप्रद ये है कि यही ग्राहक पैसा निकालते ही शाखा के बाहर झुण्ड बनाकर घर वापसी करते है या औरते तो खासकर झुण्ड बनाकर बैठ जाती और परपंच करने लगती।

गरीब तबके के लोगों के लिए खाते में पैसा आना उनके लिए कोई त्यौहार जैसा होता है थकी हुई आंखे जगमगाने लगती है। तुरंत निकासी पर्ची भरकर पैसा निकलवाते है। अगर पैसा नहीं आया तो फिर खाते पर जो 100- 200 रूपए होते है उन्हें निकलवाकर घर की जरूरते पूरी करते है। उन्हें संक्रमित असंक्रमित नोटों से फर्क नहीं पड़ता। कई बार वाकई बीमार लोग बैंक पहुंचते है और उनकी एक खासी और छींक शाखा में बैठे समस्तजन के लिए दहशत का विषय हो जाता है। तब लगता है कोई फायदा नहीं इतना मास्क और सैनिटाइज़र की शीशी खाली करने का क्यूंकि कुछ लोगों को अभी भी समझ नहीं आ पाया कि सावधानी कैसे करनी है।

छोटे कस्बों में बैंक की अलग महत्वता होती है वहां लोग पैसा खाते में आने का पता करने और थोड़े से भी पैसे हो वो भी निकालने-जमा करने बैंक पहुंच जाते है। लेकिन कोरोना जैसी महामारी को देखते हुए बैंककर्मी ऐसे बहुत से लोगो को ये करने से मना करते रहे। ये सब देख जब बैंककर्मी ग्राहक से ये पूछते है की ऐसे हालात में वो क्यों रोज-रोज बैंक आते है तो जवाब ये मिलता है कि लॉकडाउन हमारे बच्चो के लिए है कि वो सुरक्षित घर में रहे पर हमे तो रोज़ी रोटी देखनी होती है, अगर भाग्य में मरना है तो मर जायेंगे।

उनकी इन बातों से ऐसा लगता है कि वो कोरोना से बड़ी कोई जंग लड़ रहे हैं। फ़िलहाल लॉकडाउन को एक महीने से ज्यादा हो गया है और कुछ बैंक की शाखाओं से इस महामारी के चलते दुखद सूचना भी मिली है। लेकिन इन सबके बीच ये जानने का अवसर मिलता है कि भूख और गरीबी से बड़ी कोई माहमारी नहीं है।

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इस लेख की लेखिका गुंजन जायसवाल है जो मीडिया शोधार्थी है।

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