घर में करें यह उपाय, प्रसन्न होंगे पित्तर

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नई दिल्ली| हिन्दू धर्म और वैदिक मान्यताओं के अनुसार अश्विन के घर में करें यह उपाय, प्रसन्न होंगे पित्तर के रूप में पुत्र का पुत्रत्व तभी सार्थक माना जाता है जब वह अपने जीवनकाल में जीवित माता-पिता की सेवा करे और उनके मरणोपरांत उनकी बरसी तथा महालया (पितृपक्ष) में उनका विधिवत श्राद्ध करे। आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अश्विन की अमावस्या तक को पितृपक्ष या महालया पक्ष कहा गया है। तमिलनाडु में इसे आदि अमावसाई, केरल में करिकड़ा वावुबली और महाराष्ट्र में पितृ पंधरवड़ा नाम से जाना जाता है। श्राद्ध का अर्थ अपने देवताओं, पितरों, वंश के प्रति श्रद्धा प्रकट करना होता है।

Do This Remedy At Home Pitara Will Be Happy :

प्रतिदिन खीर बनाकर तैयार कर लें। गाय के गोबर के कंडे को जलाकर पूर्ण प्रज्वलित कर लें। उक्त प्रज्वलित कंडे को शुद्ध स्थान में किसी बर्तन में रखकर, खीर से तीन आहुति दे दें। इसके नजदीक जल का भरा हुआ एक गिलास रख दें अथवा लोटा रख दें। इस द्रव्य को अगले दिन किसी वृक्ष की जड़ में डाल दें। भोजन में से सर्वप्रथम गाय, काले कुत्ते और कौए के लिए ग्रास अलग से निकालकर उन्हें खिला दें| इसके पश्चात ब्राह्मण को भोजन कराएं फिर स्वयं भोजन ग्रहण करें। पश्चात ब्राह्मणों को यथायोग्य दक्षिणा दें।

अब सवाल यह है कि श्राद्ध में गाय और कुत्ते का क्या महत्व है| तो आपको बता दें कि गाय में देवताओं का वास माना गया है, इसलिए गाय का महत्व है। कुत्ता और कौए पितरों के वाहक हैं। पितृपक्ष अशुभ होने से अवशिष्ट खाने वाले को ग्रास देने का विधान है। दोनों में से एक भूमिचर है, दूसरा आकाशचर। चर यानी चलने वाला। दोनों गृहस्थों के निकट और सभी जगह पाए जाने वाले हैं। कुत्ता निकट रहकर सुरक्षा प्रदान करता है और निष्ठावान माना जाता है इसलिए पितृ का प्रतीक है। कौए गृहस्थ और पितृ के बीच श्राद्ध में दिए पिंड और जल के वाहक माने गए हैं।

नई दिल्ली| हिन्दू धर्म और वैदिक मान्यताओं के अनुसार अश्विन के घर में करें यह उपाय, प्रसन्न होंगे पित्तर के रूप में पुत्र का पुत्रत्व तभी सार्थक माना जाता है जब वह अपने जीवनकाल में जीवित माता-पिता की सेवा करे और उनके मरणोपरांत उनकी बरसी तथा महालया (पितृपक्ष) में उनका विधिवत श्राद्ध करे। आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अश्विन की अमावस्या तक को पितृपक्ष या महालया पक्ष कहा गया है। तमिलनाडु में इसे आदि अमावसाई, केरल में करिकड़ा वावुबली और महाराष्ट्र में पितृ पंधरवड़ा नाम से जाना जाता है। श्राद्ध का अर्थ अपने देवताओं, पितरों, वंश के प्रति श्रद्धा प्रकट करना होता है। प्रतिदिन खीर बनाकर तैयार कर लें। गाय के गोबर के कंडे को जलाकर पूर्ण प्रज्वलित कर लें। उक्त प्रज्वलित कंडे को शुद्ध स्थान में किसी बर्तन में रखकर, खीर से तीन आहुति दे दें। इसके नजदीक जल का भरा हुआ एक गिलास रख दें अथवा लोटा रख दें। इस द्रव्य को अगले दिन किसी वृक्ष की जड़ में डाल दें। भोजन में से सर्वप्रथम गाय, काले कुत्ते और कौए के लिए ग्रास अलग से निकालकर उन्हें खिला दें| इसके पश्चात ब्राह्मण को भोजन कराएं फिर स्वयं भोजन ग्रहण करें। पश्चात ब्राह्मणों को यथायोग्य दक्षिणा दें। अब सवाल यह है कि श्राद्ध में गाय और कुत्ते का क्या महत्व है| तो आपको बता दें कि गाय में देवताओं का वास माना गया है, इसलिए गाय का महत्व है। कुत्ता और कौए पितरों के वाहक हैं। पितृपक्ष अशुभ होने से अवशिष्ट खाने वाले को ग्रास देने का विधान है। दोनों में से एक भूमिचर है, दूसरा आकाशचर। चर यानी चलने वाला। दोनों गृहस्थों के निकट और सभी जगह पाए जाने वाले हैं। कुत्ता निकट रहकर सुरक्षा प्रदान करता है और निष्ठावान माना जाता है इसलिए पितृ का प्रतीक है। कौए गृहस्थ और पितृ के बीच श्राद्ध में दिए पिंड और जल के वाहक माने गए हैं।