इंसाफ की लड़ाई के लिए विचारधारा का तड़का जरूरी है

Does Ideology Matters If Its Comes For Justice

लखनऊ। अखबार की बेस्वाद कवर स्टोरी, समाचार चैनलों पर हर शाम होने वाली बेमतलब की बहस और सोशल मीडिया पर बुद्धिजीवी वर्ग की पोस्ट का स्वाद कब बदल जाए ये किसी को नहीं पता। इन सब को बदलने के लिए तड़का चाहिए होता है, ठीक वैसा जो घर की दाल में अनिवार्य रूप से लगाया तो जाता है, लेकिन ज्यादा मजा होटल की दाल वाला देता है। यहां हम घर की दाल त्रिपुरा के शांतनु भौमिक हत्याकांड और पंजाब में केजे सिंह हत्याकांड को मान सकते हैं और होटल की दाल के तौर पर बेंग्लुरू के गौरी लंकेश हत्याकांड को ले सकते हैं।

इन तीनों हत्याकांड की तुलना आपस में किया जाना बेहद गलत है, लेकिन इसके बावजूद करना पड़ता है क्योंकि बहुत बड़ा और अक्सर चुनिन्दा मुद्दों पर मुखर होने वाला वर्ग इन घटनाओं को चुपचाप तौलने में जुटा है। तो चलिए अब तुलना शुरू करते हैं।

पहला मामला गौरी लंकेश की हत्या का था। दो तीन अपराधी आते हैं और गोली मारकर उन्हें मौत के घाट उतार देते हैं। यह एक दर्दनाक लेकिन एक सामान्य सी नजर आने वाली आपराधिक घटना थी। इसके बाद दूसरा मामला है शांतनु भौमिक के अपहरण और हत्या का है। शांतनु का अपहरण उस समय हुआ जब वह रिर्पोटिंग कर रहा था, यानी अपनी ड्यूटी पर था बतौर पत्रकार। जहां से गायब होने के बाद उसके शरीर को कई बार चा​कुओं से गोदा गया और मरा समझ कर छोड़ दिया गया। तीसरा मामला है केजे सिंह की निर्मम हत्या का। सिंह एक वरिष्ठ पत्रकार थे, शायद अब पत्रकारिता में उतने सक्रिय भी नहीं रहे होंगे। उनकी हत्या उनके अपने घर में की गई और उनके साथ उनकी 90 वर्षीय मां को भी मार दिया गया। हत्यारे 16 बार उनके शरीर को चाकू से गोदते हैं ऐसा पोस्टमार्टम रिपोर्ट के हवाले से एक अखबार की रिपोर्ट में लिखा है।

इन तीन पत्रकारों की हत्या को एक साथ रखकर देखा जाए तो शांतनु भौमिक और केजे सिंह की हत्या की घटना ज्यादा दर्दनाक हैं। शांतनु जिसकी उम्र महज 27 या 28 साल रही होगी को सबसे दर्दनाक तरीके से मौत के घाट उतारा गया। वरिष्ठ पत्रकार केजे सिंह और उनकी वयोवृद्ध मां को मारा जाना कई सवाल खड़े करता है। दिल्ली में बैठकर उच्च श्रेणी के सुविधा भोगी पत्रकार लॉबी के चंद सदस्यों ने इन घटनाओं पर औपचारिक दुख जाहिर किया। जबकि अधिकांश तथाकथित इंटलैक्चुअल अंग्रेजी झाड़ पत्रकारों को इन दोनों घटनाओं में वो मौत नजर नहीं आई, जिसके लिए वे इंसाफ का मोर्चा खोलते और पत्रकारों की सुरक्षा के लिए अपनी आवाज उठाते। ठीक वैसा जो गौरी लंकेश की हत्या के बाद हुआ था।

अगर गौरी लंकेश की हत्या के विरोध में आयोजनों को ध्यान में रखा जाए तो शांतनु और केजे सिंह की हत्या पर भी शोकसभाओं का आयोजन, असहिष्णुता और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमले के विरोध में नारेबाजी, भाषणबाजी जैसा कुछ होना चाहिए था। लेकिन वह सब केवल गौरी लंकेश की हत्या के विरोध तक ही सीमित रखा गया। मानो ब्रां​डेड पत्रकारिता करने वाले लोगों को ​इन दो हत्याओं में न तो पत्रकार नजर आए और न ही पत्रकारों की सुरक्षा का मुद्दा।

दरअसल यहां सारा मसला तड़के का है, शांतनु भौमिक और केजे सिंह की हत्या की बात करें तो यहां वो घर वाला तड़का था जो हमारे देश में रोज होने वाली सैकड़ों हत्या की वारदातों में मिल जाता है। जबकि गौरी लंकेश का हिन्दुत्व​ विरोधी और वामपंथ समर्थक होना उनकी हत्या के बाद इंसाफ की लड़ाई को तेज करने के लिए उत्प्रेरक बन गया। जबकि ऐसी कोई भी पहचान शांतनु या केजे सिंह के नाम के साथ नहीं जुड़ी थी जिसके आधार पर उन्हें किसी विचारधारा विशेष का समर्थक कहा जा सके।

इन घटनाओं को देखने बाद ऐसा प्रतीत होता है कि भारत एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। जहां विचारधाराएं आपस में टकरा रहीं हैं। हर वर्ग के लोगों के बीच एक लकीर खींच रही है। जिसमें आपको तय करना है कि आप किधर रहना चाहते हैं। आप किसका साथ देंगे, किसका विरोध करेंगे, ये आपको एक बार तय करना है। जिसके बाद आपको एक ऐसा चश्मा पहनना पड़ेगा जिससे विरोधी का सच आपको झूठ और अपना झूठ आपको सच नज़र आए। दूसरे शब्दों में विचारधारा तय करेगी क्या सही है और क्या गलत। आप व्यक्तिगत तौर पर सही और गलत के बीच अंतर करने के काबिल नहीं बचेंगे।

लखनऊ। अखबार की बेस्वाद कवर स्टोरी, समाचार चैनलों पर हर शाम होने वाली बेमतलब की बहस और सोशल मीडिया पर बुद्धिजीवी वर्ग की पोस्ट का स्वाद कब बदल जाए ये किसी को नहीं पता। इन सब को बदलने के लिए तड़का चाहिए होता है, ठीक वैसा जो घर की दाल में अनिवार्य रूप से लगाया तो जाता है, लेकिन ज्यादा मजा होटल की दाल वाला देता है। यहां हम घर की दाल त्रिपुरा के शांतनु भौमिक हत्याकांड और पंजाब में…